राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कुवेरसिंह वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७३२ ) में धमोतर का स्वामी हुआ; किंतु कुवेरसिंह के हाथ से धमोतर निकल गया और वहां उसका पितृव्य कल्याणसिंह (फ़तहसिंह का छोटा भाई ) अधिकार कर बैठा, जिसकी वि० सं० १८०० ( ई० स० १७४३ ) में मृत्यु हुई। तदनंतर नाथूराम, हरिसिंह, मोहकमसिंह और रोड़सिंह क्रमशः धमोतर के ठाकुर हुए। रोड़सिंह का वि० सं० १६०५ ( ई० स० १८४८) में देहांत हुआ। उसके तीन पुत्र हमीरसिंह, गंभीरसिंह, और भवानीसिंह हुए। ठाकुर हमीरसिंह की बहिन गुलाबकुंवरी का विवाह अहमदनगर- ( ईडर राज्य ) के स्वामी महाराज तख्तसिंह के साथ हुआ था, जिसके उदर से जसवंतसिंह का जन्म हुआ। इस वैवाहिक सम्बन्ध के कारण तख्तसिंह ने महाराजा मानसिंह की मृत्यु हो जाने पर ( वि० सं० १६०० = ई० स० १८४३ में ) जोधपुर की गद्दी पर बैठने के बाद हमीरसिंह के छोटे भाई गंभीरसिंह को बुला लिया और जागीर में झालामंड का ठिकाना दिया । जोधपुर का स्वामी होने के पीछे भी वि० सं० १६०३ (ई० स० १८४६) में तख्तसिंह का एक विवाह ठाकुर हमीरसिंह के कुटुंबी लक्ष्मणसिंह१ की पुत्री उदयकुंवरी के साथ हुआ था। फिर तख्तसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके कुंवर जसवन्तसिंह ने जोधपुर राज्य का स्वामी होने पर अपने मामा हमीरसिंह को जोधपुर बुलाकर ताज़ीम, बांहपसाव, एक चंवर और पालकी- ( पीनस ) में बैठने की प्रतिष्ठा देकर अपने दाहिने पार्श्व में बैठने का सम्मान दिया । हमीरसिंह निःसंतान था, इसलिए उसके छोटे भाई गंभीरसिंह का पुत्र केसरीसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ । केसरीसिंह के दो पुत्र हिंदूसिंह और पृथ्वीसिंह हुए, जिनमें से हिंदूसिंह वि० सं० १६५० ( १ ) लक्ष्मणसिंह धमोतर के ठाकुर हरिसिंह के छोटे पुत्र वीरमदेव का बेटा था। उस (लक्ष्मणसिंह) की पौत्री और दलेलसिंह की पुत्री प्रतापकुंवरी का विवाह जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह के पुत्र बहादुरसिंह के साथ वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) में हुआ था। इस प्रसङ्ग से महाराजा जसवन्तसिंह ने वि० सं० १६३३ (ई० स० १८७६) में उसको भी पैर में स्वर्णाभूषण पहिनने की प्रतिष्ठा दी थी।