राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पुत्र जोधसिंह और पूरा¹ हुए । उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (प्रथम) के समय देवलिया के महारावत जसवन्तसिंह को कुंवर महासिंह-सहित उक्त महाराणा ने अपनी सेना भेज चंपा बाग में मरवा डाला और देवलिया पर भी सेना भेज अधिकार कर लिया। उस समय जोधसिंह महारावत जसवंतसिंह के दूसरे पुत्र हरिसिंह को लेकर बादशाह शाहजहां के दरबार में गया और महारावत का देवलिया आदि पर अधिकार कराने में प्रयत्न- शील रहा । फिर बादशाह ने सेना भेजकर महारावत हरिसिंह का देवलिया पर अधिकार करा दिया। जोधसिंह की वि० सं० १७०३ (ई० स० १६४६) में मृत्यु हुई² । तदनंतर उसका पुत्र जोगीदास धमोतर का स्वामी हुआ। उसने धमोतर में लक्ष्मीनारायण का मंदिर और गढ़ में महल आदि बनवाये । उसका छोटा भाई भोगीदास था, जिसने देवलिया में एक बावड़ी बनवाई, जो भोगीदास की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध है³ । जोगीदास का पुत्र जसकरण⁴ और पौत्र पृथ्वीराज हुआ । पृथ्वी- (१) पूरा के नाम से पूरावत शाखा चली। प्रतापगढ़ राज्य में इस समय पूरावतों का जाजली का ठिकाना प्रथम वर्ग में और बरखेड़ी द्वितीय वर्ग में है, जिनका उल्लेख आगे किया जायगा । (२) धमोतर में तालाब के किनारे ठाकुर जोधसिंह का स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७०३ शाके १५६८ मार्गशीर्ष सुदि २ (ई० स० १६४६ ता० २६ नवम्बर) को उसका देहान्त होने और उसके साथ उसकी राठोड़ पत्नी के सती होने का उल्लेख है । (३) कल्याण कवि-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य से ठाकुर जोगीदास का महारावत हरिसिंह का समकालीन होना प्रकट है। उक्त प्रशस्ति में उस- (जोगीदास) के छोटे भाई भोगीदास की धार्मिकता आदि का वर्णन है। देवलिया में भोगीदास की बनवाई हुई बावड़ी के समीप उसका स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर उस (भोगीदास) की वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ (ई० स० १६७९ ता० १६ जून) को मृत्यु होने का उल्लेख है । (४) ठाकुर जसकरण का भी उपर्युक्त "प्रताप-प्रशस्ति" में वर्णन है और उसमें उसको महारावत प्रतापसिंह का सामन्त बतलाते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है।