राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० १९४८ (ई० स० १८६१) में वरखेड़ी गांव जागीर में प्रदानकर ताज़ीम का सम्मान दिया। रत्नसिंह के पीछे भवानीसिंह और लालसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। लालसिंह का पुत्र तेजसिंह वहां का वर्तमान सरदार है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है। नागदी महारावत सिंहा का छोटा पुत्र जगन्नाथसिंह¹ था, जिसको प्रतापगढ़ के महारावत की तरफ़ से खरखड़ा, मोवाई, देघाला, नागदी और मोहेड़ा नामक पांच गांव जागीर में मिले थे। जगन्नाथसिंह का पुत्र जोगीदास था, जिसने खरखड़े में एक छोटा मन्दिर और तालाब बनवाया। (ई० स० १९०० ता० २१ फ़रवरी) को हुआ। बाल्यकाल से ही प्रतिभाशाली होने से सरस्वती की मदनसिंह पर कृपा हुई और वह अंग्रेज़ी भाषा की परीक्षाओं में सम्मान- पूर्वक उत्तीर्ण होता रहा। वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी की एम० ए०, तथा एल-एल० बी० की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। उसकी पढ़ाई का संपूर्ण व्यय महारावत रघुनाथसिंह ने दिया। मदनसिंह की योग्यता और कार्य-कुशलता का परिचय- पाकर मेयो कालेज अजमेर के अधिकारियों ने उसको उच्च ग्रेड में अपने यहां के कालेज में सीनियर अध्यापक नियत किया। चरित्रवान और अनुभवी होने के कारण वह भिणाय (अजमेर) के बालक राजा कल्याणसिंह का अभिभावक (गार्डियन) भी बनाया गया। फलतः उपर्युक्त भिणाय के स्वामी की शिक्षा-दीक्षा सब उसकी देख-रेख में हुई। ई० स० १९३४ (वि० सं० १९६१) में राजा कल्याणसिंह की मेयो कालेज की शिक्षा समाप्त होने पर ठाकुर मदनसिंह इस दायित्व से मुक्त हुआ। तदनन्तर उसको जयपुर के वर्तमान महाराजा साहब ने मेयो कालेज, अजमेर से (जुलाई ई० स० १९४० में) मांगकर अपने यहां के "मान नोबुल्स स्कूल" का प्रिंसिपल नियत किया है। प्रतापगढ़ राज्य के राजपूत सरदारों में उपर्युक्त मदनसिंह का शिक्षा के लिए विशिष्ट स्थान है और वही पहला व्यक्ति है, जिसने सम्मान के साथ विश्वविद्यालय की उच्च परीक्षाएं पास की हैं। वह गंभीर और विनयशील पुरुष है। (१) वंशक्रम—[१] जगन्नाथसिंह [२] जोगीदास [३] नाथूसिंह [४] गुमानसिंह [५] तख़्तसिंह [६] तेजसिंह [७] जोरावरसिंह [८] भैरवसिंह [९] बख़्रावरसिंह और [१०] सरदारसिंह।