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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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देवद ३७७

जोगीदास के पुत्र नाथूसिंह के समय उसकी जागीर के गांव खालसा हो गये। उनमें से नागदी गांव उस (नाथूसिंह) के छोटे भाई देवकर्ण के पौत्र गुमानसिंह को वापस मिला। तदनन्तर तख़्तसिंह, तेजसिंह, जोरावरसिंह और भैरवसिंह क्रमशः नागदी के स्वामी हुए। भैरवसिंह के पुत्र बख़्तावरसिंह को महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान प्रदान किया। बख़्तावरसिंह का पुत्र सरदारसिंह वहां का वर्तमान सरदार है।

देवद

कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का छोटा पुत्र दौलतसिंह महारावत सालिमसिंह की सेवा में रहता था। उसको वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में उक्त महारावत ने देवद गांव जागीर में प्रदान किया। प्रतापगढ़ के महाजनों तथा व्यापारियों के अप्रसन्न होकर मंदसोर चले जाने पर दौलतसिंह का तृतीय वंशधर खुम्माणसिंह उनको महारावत सामंतसिंह की आज्ञानुसार समझाकर पुनः प्रतापगढ़ ला रहा था। उस समय मार्ग में राजपुरिया गांव के पास मंदसोर के सूबेदार से झगड़ा हुआ, जिसमें वह मारा गया। महारावत दलपतसिंह ने खुम्माणसिंह के पौत्र शत्रुसाल (छत्रसाल) के छोटे पुत्र रणजीतसिंह को गांव आंबावा का खेड़ा जागीर में प्रदान किया था; परंतु रणजीतसिंह निःसंतान मर गया, जिससे वह गांव ज़ब्त हो गया। फिर महारावत उदयसिंह ने उक्त गांव रणजीतसिंह के छोटे भाई बलवन्तसिंह को प्रदान किया। बलवन्तसिंह का पुत्र भीमसिंह हुआ, जिसे महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान दिया। उसका पुत्र भारतसिंह वहां का वर्तमान सरदार है, जो अभी नाबालिग़ है।

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