भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 449

३७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घड़ा सेलारपुरा बरडिया के सरदार चूंडावत मनोहरदास का एक पुत्र गजसिंह था, जो उदयपुर की सेना से लड़कर मारा गया था । उस (गजसिंह) को महारावत प्रतापसिंह ने कोलवी गांव जागीर में दिया था, जो पीछे से राज्य के अधिकार में चला गया । गजसिंह के चतुर्थ वंशधर बाघसिंह को प्रतापगढ़ राज्य की ओर से संभवतः महारावत गोपालसिंह के समय घड़ा सेलारपुरा जागीर में मिला, जो उसके वंशजों के अधिकार में है । महारावत गोपालसिंह और उसके कुंवर सालिमसिंह के बीच विरोध रहता था, इस कारण से सालिमसिंह अपने पिता से अप्रसन्न होकर चला गया । उस समय बाघसिंह के वंशधर शार्दूलसिंह ने कुंवर का साथ दिया । इससे प्रसन्न होकर सालिमसिंह ने महारावत होने पर उस (शार्दूलसिंह)- को चीरावाली और मनोहरगढ़ नामक दो गांव जागीर में दिये, जो पीछे से ज़ब्त हो गये । शार्दूलसिंह का वंशधर विशनसिंह, महारावत दलपतसिंह और उदयसिंह का पूर्ण अनुग्रह-पात्र था । उसको महारावत दलपतसिंह ने वि० सं० १९१६ (ई० स० १८६२) में घड़ा सेलारपुरा की नवीन सनद कर दी । विशनसिंह मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के सीमा संबंधी झगड़े में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से मोतमिद बनाकर भेजा गया था । महारावत रघुनाथसिंह के समय वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) में उस- (महारावत) की रौप्य जयन्ती के अवसर पर उपर्युक्त विशनसिंह के पुत्र गंभीरसिंह को ताज़ीम का सम्मान मिला । गंभीरसिंह का पुत्र बख्तावर- सिंह वहां का वर्तमान सरदार है । छायण (सीधेरचा) छायण के ठाकुर झाला राजपूत हैं और मंडावरा की छोटी शाखा में हैं ।