राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 450, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंपणणावा ३७६
महारावत उदयसिंह के समय मंडावरा के स्वामी के छोटे पुत्र अर्जुनसिंह¹ को वि० सं० १६२७ (ई० स० १८७०) में ओढ़ां तथा खेड़ा गांव जागीर में मिले। फिर वि० सं० १६३२ (ई० स० १८७५) में छायाण गांव भी उक्त महारावत ने उसे प्रदान किया। इसके दो वर्ष बाद उक्त महारावत ने नारदा और दांतराकुंड गांव अर्जुनसिंह को दिये तथा सब गांवों के खिराज में से महारावत ने ३१३ रुपये माफ़ कर दिये। अर्जुनसिंह ने मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के बीच सीतामाता की सीमा संबंधी झगड़े में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से मोतमिद होकर अच्छी सेवा की थी, जिससे महारावत की उसपर कृपा बढ़ती ही रही और उसने उसे जागीर के साथ ही ताज़ीम का संम्मान भी दिया । अर्जुनसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र मोतीसिंह छायाण का ठाकुर हुआ, जिसको महारावत रघुनाथसिंह ने सीधेरथा गांव प्रदान किया। वह छायाण का वर्तमान सरदार है और उसकी उपाधि "ठाकुर" है।
पणणावा
मांतला के ठाकुर प्रतापसिंह के छोटे पुत्र मानसिंह² को महारावत उदयसिंह ने पणणावा गांव जागीर में दिया और वि० सं० १६३६ (ई० स० १८८२) में उसको स्वर्ण का पाद-भूषण पहिनने का सम्मान भी दिया। मानसिंह वि० सं० १६५१ (ई० स० १८४८) में भूतपूर्व महारावत उदयसिंह की राणी फूलकुंवरी (सैलानावाली) और महारावत रघुनाथसिंह की सेमलियावाली राणी केसरकुंवरी के साथ तीर्थ-यात्रा के प्रबंध के लिये गया था। मार्ग में मथुरा में उस (मानसिंह) की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र उदयसिंह हुआ, जिसको महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६५३ (ई० स० १८६६) में ताज़ीम का सम्मान दिया। उदयसिंह की निःसंतान
(१) वंशक्रम—[१] अर्जुनसिंह और [२] मोतीसिंह। (२) वंशक्रम—[१] मानसिंह [२] उदयसिंह [३] स्वरूपसिंह और [४] शंभुसिंह।