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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मृत्यु होने पर उसका छोटा भाई स्वरूपसिंह पणवावा का स्वामी हुआ। स्वरूपसिंह का पुत्र शंभूसिंह वहां का वर्तमान सरदार है और उसकी उपाधि "ठाकुर” है। धनेसरी मेवाड़ में बाठरड़ा ठिकाने के सारंगदेवोत (सीसोदिया) रावत दलेलसिंह का छोटा भाई गुमानसिंह' था, जो महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में प्रतापगढ़ चला गया। उसको उक्त महारावत ने मगरा ज़िले में रामपुरिया तथा धारचाखेड़ी गांव दिये। गुमानसिंह योग का ज्ञाता और अच्छा कवि था। उपर्युक्त गांव पहाड़ियों में होने के कारण आय पर्याप्त न होने से उसको महारावत ने फिर धनेसरी गांव जागीर में प्रदान किया। गुमानसिंह की योग्यता से प्रसन्न होकर महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६५१ (ई० स० १८४४) में उसे देवलिया में भूमि-सहित मन्नाभट्ट की बावड़ी और हवेली प्रदान की तथा स्वर्ण का पाद-भूषण पहिनने के अतिरिक्त ताज़ीम की प्रतिष्ठा भी दी। गुमानसिंह ने योग संबंधी कई पुस्तकों की रचना तथा रामगीता एवं भगवद्गीता पर टीकाएं भी की थीं। वि० सं० १६७१ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १८१५ ता० २२ फ़रवरी) को गुमानसिंह का ७१ वर्ष की आयु में देहांत हुआ। उसके पीछे उसका पुत्र गोविंदसिंह धनेसरी का स्वामी हुआ, जिसका पुत्र हरिसिंह वहां का वर्तमान सरदार है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है। डोराणा इस ठिकाने के सरदार सोनगरा चौहान हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। (१) वंशक्रम - [ १ ] गुमानसिंह [ २ ] गोविंदसिंह और [ ३ ] हरिसिंह।