राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबरखेड़ी ३७५ अक्षयसिंह ने वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) में रायपुर के ठाकुर गुमानसिंह को देवलिया के राजमहलों में मार डाला और रायपुर पर अधिकार कर लिया। वि० सं० १८५१ (ई० स० १७९४) में वह (अक्षयसिंह) अपने पुत्र हरिसिंह के साथ दशहरे के अवसर पर देवलिया में नौकरी के लिए गया उस समय महारावत की हस्तिशाला का एक हाथी मदमत्त होकर सरदारों के ढेरों की तरफ़ गया। इसपर अक्षयसिंह ने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई, जिससे वह हाथी मर गया। इस घटना से महारावत सामन्तसिंह उस (अक्षयसिंह) से अप्रसन्न हो गया। वह अवसर उपयुक्त देख रायपुर के ठाकुर दलसिंह ने अपने पिता गुमानसिंह का बदला लेने की भावना से प्रेरित होकर महारावत की आज्ञा से रायपुर पर चढ़ाई कर पूरावतों का संहार किया और वहां पीछा अपना अधिकार स्थिर किया। उस समय हरिसिंह का पुत्र संग्रामसिंह गुप्त रूप से वहां से निकाल दिया गया था, जो बच गया। फिर संग्रामसिंह देवलिया राज्य से निकलकर वागड़ में जा रहा। तदनन्तर वह वहां से अपने बहनोई, मूल- थान (मालवा) के स्वामी महाराज सवाईसिंह के पास चला गया। कुछ वर्ष पीछे सवाईसिंह की मृत्यु होने पर उस (सवाईसिंह) का पुत्र दलपत- सिंह मूलथान का स्वामी हुआ, जिसकी आयु कम होने से सारा काम संग्रामसिंह चलाता था। उन दिनों सीमा-सम्बन्धी झगड़े के कारण बखत- गढ़ (मालवा) के कामदार भूराखां ने पांचसौ आदमियों की भीड़-भाड़ लेकर मूलथान पर चढ़ाई कर दी, उस समय संग्रामसिंह ने वीरतापूर्वक बखतगढ़वालों का मुक़ाबला कर भूराखां का सिर काट लिया, जिसपर मूलथान के स्वामी दलपतसिंह ने संग्रामसिंह को संदला जागीर में प्रदान किया। संग्रामसिंह के पुत्र रतनसिंह¹ को महारावत रघुनाथसिंह ने (१) ठाकुर रतनसिंह के छोटे भाई हिम्मतसिंह और प्रतापसिंह थे। हिम्मत- सिंह का पुत्र प्रह्लादसिंह और पौत्र मोतीसिंह हुआ, जिसकी निःसन्तान मृत्यु हुई। प्रतापसिंह का पुत्र तख़्तसिंह और चार पौत्र खुशहालसिंह, सालिमसिंह, मदनसिंह और गोवर्धनसिंह हुए। उनमें से मदनसिंह का जन्म वि० सं० १९५६ फाल्गुन वदि ७