राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास . कछोशिया का महाराज था ) ने फ़साद किया । अंत में कोटा के दीवान झाला ज़ालिमसिंह (झालावाड़ राज्य का संस्थापक) ने उनके इस झगड़े को मिटाकर उन दोनों को कोटे में बुला लिया और वहां जागीर दिलवाई, किन्तु बलदेवसिंह ने अपना आचरण ठीक न रखा, इसलिए वह जागीर जाती रही । बलदेवसिंह का पुत्र भौमसिंह¹ था। वह अपनी रिश्तेदारी के सबब प्रतापगढ़ राज्य में चला गया । जहां अनघोरा और रोजवानी नामक दो गांव उसको जागीर में मिले । महारावत दलपतसिंह फ़तहगढ़वालों का भानजा था, इस कारण उसने भौमसिंह की जागीर में और भी वृद्धि की तथा उसे वि० सं० १६१२ श्रावण सुदि ७ (ई० स० १८५५ ता० २० अगस्त) को नानणा तथा खड़ियाखेड़ी नामक दो गांव और वि० सं० १६१६ ज्येष्ठ वदि ११ (ई० स० १८६२ ता० २४ मई) को कंथार गांव जागीर में दिये । भौमसिंह के हिम्मतसिंह, ज़ालिमसिंह और धनपतसिंह नामक तीन पुत्र हुए । उनमें से ज़ालिमसिंह को हिम्मतसिंह ने मार डाला, जिससे वह (हिम्मतसिंह) अपने पिता की संपत्ति से वंचित रहा और धनपतिसिंह पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ । तदनन्तर तेजसिंह और मोहनसिंह ढोस और अनघोरा के स्वामी हुए । मोहनसिंह का पुत्र प्रतापसिंह, वहां का वर्तमान सरदार है । वरखेड़ी धमोतर के ठाकुर गोपालदास का सब से छोटा पुत्र पूरा था । पूरा के पांचवे वंशधर अक्षयसिंह² को महारावत सालिमसिंह ने वि० सं० १८२१ (ई० स० १७६४) के लगभग मंडावरा गांव जागीर में दिया था । ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] भौमसिंह [ २ ] धनपतिसिंह [ ३ ] तेजसिंह [ ४ ] मोहनसिंह और [ ५ ] प्रतापसिंह । ( २ ) वंशक्रम—[ १ ] अक्षयसिंह [ २ ] हरिसिंह [ ३ ] संग्रामसिंह [ ४ ] रत्नसिंह [ ५ ] भवानीसिंह [ ६ ] लालसिंह और [ ७ ] तेजसिंह ।