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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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अनघोरा ३७३

हैं' और पूरा के नाम से उसकी सन्तान पूरावत कहलाती है। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। पूरा का पुत्र सुंदर और उसका बाघसिंह हुआ, जिसको देवलिया राज्य की तरफ़ से बिलेसरी की जागीर मिली। बाघसिंह का बेटा अजबसिंह और उसका माधवसिंह हुआ। उस (माधवसिंह) के दो पुत्र जोरावरसिंह और जगतसिंह हुए। उनमें से जोरावरसिंह का बिलेसरी पर स्वत्व रहा और जगतसिंह को जाजली की नवीन जागीर दी गई। जगतसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र तेजसिंह हुआ। उसके पीछे गुलाबसिंह, भैरवसिंह और बलवन्तसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। बलवन्तसिंह का पुत्र रघुनाथसिंह वहां का वर्तमान ठाकुर है। उसने अजमेर के मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में उस (रघुनाथसिंह)- को प्रथम वर्ग के सरदारों में दाख़िल किया है।

द्वितीय वर्ग के सरदार

अनघोरा

अनघोरा के महाराज जोधा राठोड़ हैं। किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह के छोटे पुत्र बाघसिंह को फ़तहगढ़ की जागीर मिली। बाघसिंह के चार बेटे थे। उनमें से दूसरे बलदेवसिंह को भाई-बंट में ढोस गांव और सदापुरा की भोम मिली। बलदेवसिंह के छोटे भाई किशोरसिंह के, जो जोरावरपुरे का स्वामी था, निःसंतान मर जाने पर झगड़ा खड़ा हो गया। बलदेवसिंह के बड़े भाई चांदसिंह ने किशोरसिंह के ठिकाने पर अपने छोटे बेटे गोपालसिंह को नियत कर दिया। इसपर बलदेवसिंह और उसके तीसरे भाई भीमसिंह (जो


( १ ) वंशक्रम—[ १ ] पूरा [ २ ] सुन्दर [ ३ ] बाघसिंह [ ४ ] अजबसिंह [ ५ ] माधवसिंह, [ ६ ] जगतसिंह [ ७ ] तेजसिंह [ ८ ] गुलाबसिंह [ ६ ] भैरवसिंह [ १० ] बलवन्तसिंह और [ ११ ] रघुनाथसिंह।