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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 534 में से

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बरडिया ३७१ सलूंबर (मेवाड़) के स्वामी रावत किशनदास का छोटा पुत्र भामा था, जिसको उदयपुर राज्य की तरफ़ से खोड़ीप की जागीर मिली थी । भामा का पुत्र मनोहरदास था, जिसको देवलिया के स्वामी महारावत प्रतापसिंह ने सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर दी । मनोहरदास का पुत्र लालसिंह हुआ । लालसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अजबसिंह हुआ । उसका पुत्र शिवसिंह पिता की विद्यमानता में गुज़र गया, इसलिए शिवसिंह का पुत्र कुशलसिंह, अजबसिंह के पीछे बरडिया का स्वामी बना । तदनन्तर सामंतसिंह, जगतसिंह, मोहकमसिंह, चिमनसिंह और लालसिंह (दूसरा) क्रमशः वरडिया के ठाकुर हुए । लालसिंह (दूसरा) की वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र सामंतसिंह (दूसरा) वरडिया का स्वामी हुआ, परंतु उसके संतान न थी, अतएव उसने अपने भतीजे दौलतसिंह को, जो [६] लालसिंह (दूसरा) [१०] सामंतसिंह (दूसरा) और (११) दौलतसिंह । राजपूताना और अजमेर की लिस्ट ऑव् रूलिंग प्रिंसेज़, चीफ्स ऐंड लीडिंग परसो- नेजिज़ (ई० स० १६३१ का संस्करण) में तथा अन्य कुछ स्थलों पर महारावत विक्रमसिंह- (बीका) के छोटे पुत्र किशनदास के बेटे जेठसिंह का मेवाड़ के सलूंबर के स्वामी की गोद जाना और इस प्रसङ्ग से किशनदास के अन्य पुत्रों का भी सलूंबर में जाकर रहना तथा जेठसिंह के भाई जामा (भामा) के पुत्र मनोहरदास को महारावत प्रतापसिंह का सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर देने का उल्लेख है, जो विश्वसनीय नहीं है । "वीरविनोद" आदि में इस ठिकाने के सरदार को स्पष्ट शब्दों में चूंडावत लिखा है, जिसका अर्थ चूंड़ा का वंशधर होता है । सलूंबर ठिकाने की ख्यात में बरडिया के सरदार का मूलपुरुष भामा दिया है और उसको सलूंबर के रावत कृष्णदास का आठवां पुत्र बतलाया है तथा सेलारपुरे का ठिकाना वरडियावालों की छोटी शाखा में होना लिखा है। बरडियावालों का जो ऐतिहासिक हाल प्रतापगढ़ राज्य के द्वारा हमें प्राप्त हुआ उसमें भी सलूंबर के रावत कृष्णदास के छोटे पुत्र भामा को उसका मूलपुरुष लिखा है। उपर्युक्त पुस्तकों का यह कथन कि प्रतापगढ़ के स्वामी विक्रमसिंह (बीका) के बेटे किशनदास का पुत्र जेठसिंह (जेतसिंह) सलूंबर गोद गया, संभव नहीं हो सकता; क्योंकि रावत चूंड़ा के वंशधरों में कई व्यक्ति मौजूद होते हुए जैतसिंह का दूर की शाखा देवलिया के राजवंश से गोद जाना विपरीत बात है ।

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