राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
बरडिया ३७१ सलूंबर (मेवाड़) के स्वामी रावत किशनदास का छोटा पुत्र भामा था, जिसको उदयपुर राज्य की तरफ़ से खोड़ीप की जागीर मिली थी । भामा का पुत्र मनोहरदास था, जिसको देवलिया के स्वामी महारावत प्रतापसिंह ने सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर दी । मनोहरदास का पुत्र लालसिंह हुआ । लालसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अजबसिंह हुआ । उसका पुत्र शिवसिंह पिता की विद्यमानता में गुज़र गया, इसलिए शिवसिंह का पुत्र कुशलसिंह, अजबसिंह के पीछे बरडिया का स्वामी बना । तदनन्तर सामंतसिंह, जगतसिंह, मोहकमसिंह, चिमनसिंह और लालसिंह (दूसरा) क्रमशः वरडिया के ठाकुर हुए । लालसिंह (दूसरा) की वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र सामंतसिंह (दूसरा) वरडिया का स्वामी हुआ, परंतु उसके संतान न थी, अतएव उसने अपने भतीजे दौलतसिंह को, जो [६] लालसिंह (दूसरा) [१०] सामंतसिंह (दूसरा) और (११) दौलतसिंह । राजपूताना और अजमेर की लिस्ट ऑव् रूलिंग प्रिंसेज़, चीफ्स ऐंड लीडिंग परसो- नेजिज़ (ई० स० १६३१ का संस्करण) में तथा अन्य कुछ स्थलों पर महारावत विक्रमसिंह- (बीका) के छोटे पुत्र किशनदास के बेटे जेठसिंह का मेवाड़ के सलूंबर के स्वामी की गोद जाना और इस प्रसङ्ग से किशनदास के अन्य पुत्रों का भी सलूंबर में जाकर रहना तथा जेठसिंह के भाई जामा (भामा) के पुत्र मनोहरदास को महारावत प्रतापसिंह का सलूंबर से अपने साथ ले जाकर वरडिया की जागीर देने का उल्लेख है, जो विश्वसनीय नहीं है । "वीरविनोद" आदि में इस ठिकाने के सरदार को स्पष्ट शब्दों में चूंडावत लिखा है, जिसका अर्थ चूंड़ा का वंशधर होता है । सलूंबर ठिकाने की ख्यात में बरडिया के सरदार का मूलपुरुष भामा दिया है और उसको सलूंबर के रावत कृष्णदास का आठवां पुत्र बतलाया है तथा सेलारपुरे का ठिकाना वरडियावालों की छोटी शाखा में होना लिखा है। बरडियावालों का जो ऐतिहासिक हाल प्रतापगढ़ राज्य के द्वारा हमें प्राप्त हुआ उसमें भी सलूंबर के रावत कृष्णदास के छोटे पुत्र भामा को उसका मूलपुरुष लिखा है। उपर्युक्त पुस्तकों का यह कथन कि प्रतापगढ़ के स्वामी विक्रमसिंह (बीका) के बेटे किशनदास का पुत्र जेठसिंह (जेतसिंह) सलूंबर गोद गया, संभव नहीं हो सकता; क्योंकि रावत चूंड़ा के वंशधरों में कई व्यक्ति मौजूद होते हुए जैतसिंह का दूर की शाखा देवलिया के राजवंश से गोद जाना विपरीत बात है ।
३७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास फ़ौजसिंह का पुत्र था, गोद लिया । वि० सं० १६७० ( ई० स० १६१३) में सामंतसिंह का देहांत होने पर दौलतसिंह घरडिया का सरदार बना, जो वहां का वर्तमान ठाकुर है। उसके दो पुत्र भगवतसिंह और प्रह्लादसिंह हैं। बोड़ी-साखथली बोड़ी-साखथली के सरदार महारावत बाघसिंह के पुत्र खान के वंशधर हैं¹ और उनकी उपाधि "ठाकुर" है । खान का पुत्र दुर्गादास अपने बेटों सहित महारावत भानुसिंह के साथ जीरण में मारा गया । फिर महारावत सिंहा ने दुर्गादास के पौत्र रणछोड़दास को बोड़ी-साखथली की जागीर प्रदान की । रणछोड़दास के पीछे अजबसिंह, गोपालसिंह, किशनसिंह और हरिसिंह क्रमशः वहां के ठाकुर हुए। हरिसिंह का पुत्र रतनसिंह तथा पौत्र छत्रसाल (शत्रुसाल) था। छत्रसाल के निःसंतान होने से ठिकाना राज्याधिकार में चला गया, परन्तु महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६४८( ई० स० १८६१) में उस- (छत्रसाल) के चाचा सूरजमल के पुत्र बलवंतसिंह (जो वहां का वर्तमान सरदार है) को प्रदानकर उसको वहां का सरदार बनाया । फिर उसने उसको प्रथम वर्ग के सरदारों में दाख़िल किया एवं वि० सं० १६७७ वैशाख वदि १४ ( ई० स० १६२० ता० १७ अप्रेल) को उसे दीवानी तथा फ़ौजदारी के मुक़दमे करने के अधिकार भी दे दिये। उसके पांच पुत्र—भैरवसिंह, बहादुरसिंह, नाहरसिंह, शेरसिंह और पर्वतसिंह—हैं। जाजली इस ठिकाने के स्वामी महारावत सूरजमल के छोटे पुत्र सहसमल के पौत्र गोपालदास (धमोतर का स्वामी) के छोटे पुत्र पूरा के वंशधर (१) वंशक्रम - [ १ ] खान [ २ ] दुर्गादास [ ३ ] ईश्वरदास [ ४ ] रणछोड़दास [ ५ ] अजबसिंह [ ६ ] गोपालसिंह [ ७ ] किशनसिंह [ ८ ] हरिसिंह [ ६ ] रतनसिंह [ १० ] छत्रसाल और [ ११ ] बलवंतसिंह ।
अनघोरा ३७३
हैं' और पूरा के नाम से उसकी सन्तान पूरावत कहलाती है। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। पूरा का पुत्र सुंदर और उसका बाघसिंह हुआ, जिसको देवलिया राज्य की तरफ़ से बिलेसरी की जागीर मिली। बाघसिंह का बेटा अजबसिंह और उसका माधवसिंह हुआ। उस (माधवसिंह) के दो पुत्र जोरावरसिंह और जगतसिंह हुए। उनमें से जोरावरसिंह का बिलेसरी पर स्वत्व रहा और जगतसिंह को जाजली की नवीन जागीर दी गई। जगतसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र तेजसिंह हुआ। उसके पीछे गुलाबसिंह, भैरवसिंह और बलवन्तसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। बलवन्तसिंह का पुत्र रघुनाथसिंह वहां का वर्तमान ठाकुर है। उसने अजमेर के मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में उस (रघुनाथसिंह)- को प्रथम वर्ग के सरदारों में दाख़िल किया है।
द्वितीय वर्ग के सरदार
अनघोरा
अनघोरा के महाराज जोधा राठोड़ हैं। किशनगढ़ के महाराजा बहादुरसिंह के छोटे पुत्र बाघसिंह को फ़तहगढ़ की जागीर मिली। बाघसिंह के चार बेटे थे। उनमें से दूसरे बलदेवसिंह को भाई-बंट में ढोस गांव और सदापुरा की भोम मिली। बलदेवसिंह के छोटे भाई किशोरसिंह के, जो जोरावरपुरे का स्वामी था, निःसंतान मर जाने पर झगड़ा खड़ा हो गया। बलदेवसिंह के बड़े भाई चांदसिंह ने किशोरसिंह के ठिकाने पर अपने छोटे बेटे गोपालसिंह को नियत कर दिया। इसपर बलदेवसिंह और उसके तीसरे भाई भीमसिंह (जो
( १ ) वंशक्रम—[ १ ] पूरा [ २ ] सुन्दर [ ३ ] बाघसिंह [ ४ ] अजबसिंह [ ५ ] माधवसिंह, [ ६ ] जगतसिंह [ ७ ] तेजसिंह [ ८ ] गुलाबसिंह [ ६ ] भैरवसिंह [ १० ] बलवन्तसिंह और [ ११ ] रघुनाथसिंह।
३७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास . कछोशिया का महाराज था ) ने फ़साद किया । अंत में कोटा के दीवान झाला ज़ालिमसिंह (झालावाड़ राज्य का संस्थापक) ने उनके इस झगड़े को मिटाकर उन दोनों को कोटे में बुला लिया और वहां जागीर दिलवाई, किन्तु बलदेवसिंह ने अपना आचरण ठीक न रखा, इसलिए वह जागीर जाती रही । बलदेवसिंह का पुत्र भौमसिंह¹ था। वह अपनी रिश्तेदारी के सबब प्रतापगढ़ राज्य में चला गया । जहां अनघोरा और रोजवानी नामक दो गांव उसको जागीर में मिले । महारावत दलपतसिंह फ़तहगढ़वालों का भानजा था, इस कारण उसने भौमसिंह की जागीर में और भी वृद्धि की तथा उसे वि० सं० १६१२ श्रावण सुदि ७ (ई० स० १८५५ ता० २० अगस्त) को नानणा तथा खड़ियाखेड़ी नामक दो गांव और वि० सं० १६१६ ज्येष्ठ वदि ११ (ई० स० १८६२ ता० २४ मई) को कंथार गांव जागीर में दिये । भौमसिंह के हिम्मतसिंह, ज़ालिमसिंह और धनपतसिंह नामक तीन पुत्र हुए । उनमें से ज़ालिमसिंह को हिम्मतसिंह ने मार डाला, जिससे वह (हिम्मतसिंह) अपने पिता की संपत्ति से वंचित रहा और धनपतिसिंह पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ । तदनन्तर तेजसिंह और मोहनसिंह ढोस और अनघोरा के स्वामी हुए । मोहनसिंह का पुत्र प्रतापसिंह, वहां का वर्तमान सरदार है । वरखेड़ी धमोतर के ठाकुर गोपालदास का सब से छोटा पुत्र पूरा था । पूरा के पांचवे वंशधर अक्षयसिंह² को महारावत सालिमसिंह ने वि० सं० १८२१ (ई० स० १७६४) के लगभग मंडावरा गांव जागीर में दिया था । ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] भौमसिंह [ २ ] धनपतिसिंह [ ३ ] तेजसिंह [ ४ ] मोहनसिंह और [ ५ ] प्रतापसिंह । ( २ ) वंशक्रम—[ १ ] अक्षयसिंह [ २ ] हरिसिंह [ ३ ] संग्रामसिंह [ ४ ] रत्नसिंह [ ५ ] भवानीसिंह [ ६ ] लालसिंह और [ ७ ] तेजसिंह ।
बरखेड़ी ३७५ अक्षयसिंह ने वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) में रायपुर के ठाकुर गुमानसिंह को देवलिया के राजमहलों में मार डाला और रायपुर पर अधिकार कर लिया। वि० सं० १८५१ (ई० स० १७९४) में वह (अक्षयसिंह) अपने पुत्र हरिसिंह के साथ दशहरे के अवसर पर देवलिया में नौकरी के लिए गया उस समय महारावत की हस्तिशाला का एक हाथी मदमत्त होकर सरदारों के ढेरों की तरफ़ गया। इसपर अक्षयसिंह ने आत्मरक्षार्थ गोली चलाई, जिससे वह हाथी मर गया। इस घटना से महारावत सामन्तसिंह उस (अक्षयसिंह) से अप्रसन्न हो गया। वह अवसर उपयुक्त देख रायपुर के ठाकुर दलसिंह ने अपने पिता गुमानसिंह का बदला लेने की भावना से प्रेरित होकर महारावत की आज्ञा से रायपुर पर चढ़ाई कर पूरावतों का संहार किया और वहां पीछा अपना अधिकार स्थिर किया। उस समय हरिसिंह का पुत्र संग्रामसिंह गुप्त रूप से वहां से निकाल दिया गया था, जो बच गया। फिर संग्रामसिंह देवलिया राज्य से निकलकर वागड़ में जा रहा। तदनन्तर वह वहां से अपने बहनोई, मूल- थान (मालवा) के स्वामी महाराज सवाईसिंह के पास चला गया। कुछ वर्ष पीछे सवाईसिंह की मृत्यु होने पर उस (सवाईसिंह) का पुत्र दलपत- सिंह मूलथान का स्वामी हुआ, जिसकी आयु कम होने से सारा काम संग्रामसिंह चलाता था। उन दिनों सीमा-सम्बन्धी झगड़े के कारण बखत- गढ़ (मालवा) के कामदार भूराखां ने पांचसौ आदमियों की भीड़-भाड़ लेकर मूलथान पर चढ़ाई कर दी, उस समय संग्रामसिंह ने वीरतापूर्वक बखतगढ़वालों का मुक़ाबला कर भूराखां का सिर काट लिया, जिसपर मूलथान के स्वामी दलपतसिंह ने संग्रामसिंह को संदला जागीर में प्रदान किया। संग्रामसिंह के पुत्र रतनसिंह¹ को महारावत रघुनाथसिंह ने (१) ठाकुर रतनसिंह के छोटे भाई हिम्मतसिंह और प्रतापसिंह थे। हिम्मत- सिंह का पुत्र प्रह्लादसिंह और पौत्र मोतीसिंह हुआ, जिसकी निःसन्तान मृत्यु हुई। प्रतापसिंह का पुत्र तख़्तसिंह और चार पौत्र खुशहालसिंह, सालिमसिंह, मदनसिंह और गोवर्धनसिंह हुए। उनमें से मदनसिंह का जन्म वि० सं० १९५६ फाल्गुन वदि ७
३७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० १९४८ (ई० स० १८६१) में वरखेड़ी गांव जागीर में प्रदानकर ताज़ीम का सम्मान दिया। रत्नसिंह के पीछे भवानीसिंह और लालसिंह क्रमशः वहां के सरदार हुए। लालसिंह का पुत्र तेजसिंह वहां का वर्तमान सरदार है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है। नागदी महारावत सिंहा का छोटा पुत्र जगन्नाथसिंह¹ था, जिसको प्रतापगढ़ के महारावत की तरफ़ से खरखड़ा, मोवाई, देघाला, नागदी और मोहेड़ा नामक पांच गांव जागीर में मिले थे। जगन्नाथसिंह का पुत्र जोगीदास था, जिसने खरखड़े में एक छोटा मन्दिर और तालाब बनवाया। (ई० स० १९०० ता० २१ फ़रवरी) को हुआ। बाल्यकाल से ही प्रतिभाशाली होने से सरस्वती की मदनसिंह पर कृपा हुई और वह अंग्रेज़ी भाषा की परीक्षाओं में सम्मान- पूर्वक उत्तीर्ण होता रहा। वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी की एम० ए०, तथा एल-एल० बी० की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। उसकी पढ़ाई का संपूर्ण व्यय महारावत रघुनाथसिंह ने दिया। मदनसिंह की योग्यता और कार्य-कुशलता का परिचय- पाकर मेयो कालेज अजमेर के अधिकारियों ने उसको उच्च ग्रेड में अपने यहां के कालेज में सीनियर अध्यापक नियत किया। चरित्रवान और अनुभवी होने के कारण वह भिणाय (अजमेर) के बालक राजा कल्याणसिंह का अभिभावक (गार्डियन) भी बनाया गया। फलतः उपर्युक्त भिणाय के स्वामी की शिक्षा-दीक्षा सब उसकी देख-रेख में हुई। ई० स० १९३४ (वि० सं० १९६१) में राजा कल्याणसिंह की मेयो कालेज की शिक्षा समाप्त होने पर ठाकुर मदनसिंह इस दायित्व से मुक्त हुआ। तदनन्तर उसको जयपुर के वर्तमान महाराजा साहब ने मेयो कालेज, अजमेर से (जुलाई ई० स० १९४० में) मांगकर अपने यहां के "मान नोबुल्स स्कूल" का प्रिंसिपल नियत किया है। प्रतापगढ़ राज्य के राजपूत सरदारों में उपर्युक्त मदनसिंह का शिक्षा के लिए विशिष्ट स्थान है और वही पहला व्यक्ति है, जिसने सम्मान के साथ विश्वविद्यालय की उच्च परीक्षाएं पास की हैं। वह गंभीर और विनयशील पुरुष है। (१) वंशक्रम—[१] जगन्नाथसिंह [२] जोगीदास [३] नाथूसिंह [४] गुमानसिंह [५] तख़्तसिंह [६] तेजसिंह [७] जोरावरसिंह [८] भैरवसिंह [९] बख़्रावरसिंह और [१०] सरदारसिंह।
देवद ३७७
जोगीदास के पुत्र नाथूसिंह के समय उसकी जागीर के गांव खालसा हो गये। उनमें से नागदी गांव उस (नाथूसिंह) के छोटे भाई देवकर्ण के पौत्र गुमानसिंह को वापस मिला। तदनन्तर तख़्तसिंह, तेजसिंह, जोरावरसिंह और भैरवसिंह क्रमशः नागदी के स्वामी हुए। भैरवसिंह के पुत्र बख़्तावरसिंह को महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान प्रदान किया। बख़्तावरसिंह का पुत्र सरदारसिंह वहां का वर्तमान सरदार है।
देवद
कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का छोटा पुत्र दौलतसिंह महारावत सालिमसिंह की सेवा में रहता था। उसको वि० सं० १८१३ (ई० स० १७५६) में उक्त महारावत ने देवद गांव जागीर में प्रदान किया। प्रतापगढ़ के महाजनों तथा व्यापारियों के अप्रसन्न होकर मंदसोर चले जाने पर दौलतसिंह का तृतीय वंशधर खुम्माणसिंह उनको महारावत सामंतसिंह की आज्ञानुसार समझाकर पुनः प्रतापगढ़ ला रहा था। उस समय मार्ग में राजपुरिया गांव के पास मंदसोर के सूबेदार से झगड़ा हुआ, जिसमें वह मारा गया। महारावत दलपतसिंह ने खुम्माणसिंह के पौत्र शत्रुसाल (छत्रसाल) के छोटे पुत्र रणजीतसिंह को गांव आंबावा का खेड़ा जागीर में प्रदान किया था; परंतु रणजीतसिंह निःसंतान मर गया, जिससे वह गांव ज़ब्त हो गया। फिर महारावत उदयसिंह ने उक्त गांव रणजीतसिंह के छोटे भाई बलवन्तसिंह को प्रदान किया। बलवन्तसिंह का पुत्र भीमसिंह हुआ, जिसे महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१४) में ताज़ीम का सम्मान दिया। उसका पुत्र भारतसिंह वहां का वर्तमान सरदार है, जो अभी नाबालिग़ है।
४८
३७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घड़ा सेलारपुरा बरडिया के सरदार चूंडावत मनोहरदास का एक पुत्र गजसिंह था, जो उदयपुर की सेना से लड़कर मारा गया था । उस (गजसिंह) को महारावत प्रतापसिंह ने कोलवी गांव जागीर में दिया था, जो पीछे से राज्य के अधिकार में चला गया । गजसिंह के चतुर्थ वंशधर बाघसिंह को प्रतापगढ़ राज्य की ओर से संभवतः महारावत गोपालसिंह के समय घड़ा सेलारपुरा जागीर में मिला, जो उसके वंशजों के अधिकार में है । महारावत गोपालसिंह और उसके कुंवर सालिमसिंह के बीच विरोध रहता था, इस कारण से सालिमसिंह अपने पिता से अप्रसन्न होकर चला गया । उस समय बाघसिंह के वंशधर शार्दूलसिंह ने कुंवर का साथ दिया । इससे प्रसन्न होकर सालिमसिंह ने महारावत होने पर उस (शार्दूलसिंह)- को चीरावाली और मनोहरगढ़ नामक दो गांव जागीर में दिये, जो पीछे से ज़ब्त हो गये । शार्दूलसिंह का वंशधर विशनसिंह, महारावत दलपतसिंह और उदयसिंह का पूर्ण अनुग्रह-पात्र था । उसको महारावत दलपतसिंह ने वि० सं० १९१६ (ई० स० १८६२) में घड़ा सेलारपुरा की नवीन सनद कर दी । विशनसिंह मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के सीमा संबंधी झगड़े में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से मोतमिद बनाकर भेजा गया था । महारावत रघुनाथसिंह के समय वि० सं० १९७१ (ई० स० १९१४) में उस- (महारावत) की रौप्य जयन्ती के अवसर पर उपर्युक्त विशनसिंह के पुत्र गंभीरसिंह को ताज़ीम का सम्मान मिला । गंभीरसिंह का पुत्र बख्तावर- सिंह वहां का वर्तमान सरदार है । छायण (सीधेरचा) छायण के ठाकुर झाला राजपूत हैं और मंडावरा की छोटी शाखा में हैं ।
पणणावा ३७६
महारावत उदयसिंह के समय मंडावरा के स्वामी के छोटे पुत्र अर्जुनसिंह¹ को वि० सं० १६२७ (ई० स० १८७०) में ओढ़ां तथा खेड़ा गांव जागीर में मिले। फिर वि० सं० १६३२ (ई० स० १८७५) में छायाण गांव भी उक्त महारावत ने उसे प्रदान किया। इसके दो वर्ष बाद उक्त महारावत ने नारदा और दांतराकुंड गांव अर्जुनसिंह को दिये तथा सब गांवों के खिराज में से महारावत ने ३१३ रुपये माफ़ कर दिये। अर्जुनसिंह ने मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के बीच सीतामाता की सीमा संबंधी झगड़े में प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से मोतमिद होकर अच्छी सेवा की थी, जिससे महारावत की उसपर कृपा बढ़ती ही रही और उसने उसे जागीर के साथ ही ताज़ीम का संम्मान भी दिया । अर्जुनसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र मोतीसिंह छायाण का ठाकुर हुआ, जिसको महारावत रघुनाथसिंह ने सीधेरथा गांव प्रदान किया। वह छायाण का वर्तमान सरदार है और उसकी उपाधि "ठाकुर" है।
पणणावा
मांतला के ठाकुर प्रतापसिंह के छोटे पुत्र मानसिंह² को महारावत उदयसिंह ने पणणावा गांव जागीर में दिया और वि० सं० १६३६ (ई० स० १८८२) में उसको स्वर्ण का पाद-भूषण पहिनने का सम्मान भी दिया। मानसिंह वि० सं० १६५१ (ई० स० १८४८) में भूतपूर्व महारावत उदयसिंह की राणी फूलकुंवरी (सैलानावाली) और महारावत रघुनाथसिंह की सेमलियावाली राणी केसरकुंवरी के साथ तीर्थ-यात्रा के प्रबंध के लिये गया था। मार्ग में मथुरा में उस (मानसिंह) की मृत्यु हो गई। उसका पुत्र उदयसिंह हुआ, जिसको महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६५३ (ई० स० १८६६) में ताज़ीम का सम्मान दिया। उदयसिंह की निःसंतान
(१) वंशक्रम—[१] अर्जुनसिंह और [२] मोतीसिंह। (२) वंशक्रम—[१] मानसिंह [२] उदयसिंह [३] स्वरूपसिंह और [४] शंभुसिंह।
३८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मृत्यु होने पर उसका छोटा भाई स्वरूपसिंह पणवावा का स्वामी हुआ। स्वरूपसिंह का पुत्र शंभूसिंह वहां का वर्तमान सरदार है और उसकी उपाधि "ठाकुर” है। धनेसरी मेवाड़ में बाठरड़ा ठिकाने के सारंगदेवोत (सीसोदिया) रावत दलेलसिंह का छोटा भाई गुमानसिंह' था, जो महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में प्रतापगढ़ चला गया। उसको उक्त महारावत ने मगरा ज़िले में रामपुरिया तथा धारचाखेड़ी गांव दिये। गुमानसिंह योग का ज्ञाता और अच्छा कवि था। उपर्युक्त गांव पहाड़ियों में होने के कारण आय पर्याप्त न होने से उसको महारावत ने फिर धनेसरी गांव जागीर में प्रदान किया। गुमानसिंह की योग्यता से प्रसन्न होकर महारावत रघुनाथसिंह ने वि० सं० १६५१ (ई० स० १८४४) में उसे देवलिया में भूमि-सहित मन्नाभट्ट की बावड़ी और हवेली प्रदान की तथा स्वर्ण का पाद-भूषण पहिनने के अतिरिक्त ताज़ीम की प्रतिष्ठा भी दी। गुमानसिंह ने योग संबंधी कई पुस्तकों की रचना तथा रामगीता एवं भगवद्गीता पर टीकाएं भी की थीं। वि० सं० १६७१ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १८१५ ता० २२ फ़रवरी) को गुमानसिंह का ७१ वर्ष की आयु में देहांत हुआ। उसके पीछे उसका पुत्र गोविंदसिंह धनेसरी का स्वामी हुआ, जिसका पुत्र हरिसिंह वहां का वर्तमान सरदार है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है। डोराणा इस ठिकाने के सरदार सोनगरा चौहान हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। (१) वंशक्रम - [ १ ] गुमानसिंह [ २ ] गोविंदसिंह और [ ३ ] हरिसिंह।
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८१ महारावत उदयसिंह का प्रथम विवाह वि० सं० १६१७ ( ई० स० १८६०) में नामली (रतलाम राज्य) के सोनगरा चौहान ठाकुर तख्तसिंह की पुत्री स्वरूपकुंवरी के साथ हुआ था। इस प्रसङ्ग से तख्तसिंह का छोटा पुत्र बखतावरसिंह उक्त महारावत के पास चला गया, जिसपर उसने वि० सं० १६४० (ई० स० १८८३) में डोराणा और जसवन्तपुरा नामक दो गांव उसे जागीर में दिये। बखतावरसिंह भाषा का अच्छा कवि था। वहां का वर्तमान सरदार दलपतसिंह है। प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ++++卐++++ देश-रक्षा में राजपूत सरदारों की जैसी सेवाएं हैं, वैसी ही राजनैतिक क्षेत्र में मन्त्री-वर्ग और कर्मचारियों की सेवाएं भी खास महत्त्व रखती हैं। जिस राज्य में मन्त्री-वर्ग तथा कर्मचारी योग्य, ईमानदार तथा अनुभवी होते हैं उस राज्य में आंतरिक विप्लव कम होते हैं और सुख-समृद्धि का विकास होता है। इतिहास के अभाव में विभिन्न राज्यों के कर्मचारियों की सेवाओं का पता पूरा-पूरा नहीं चलता। यदि शोध किया जाय तो बहुत कुछ ऐसे साधन भी मिलेंगे, जिनसे उनके द्वारा होनेवाली सेवाओं पर अच्छा प्रकाश पड़ सके। प्रतापगढ़ राज्य के मन्त्रीवर्ग में भी समय-समय पर उल्लेखनीय व्यक्ति हो गये हैं, जिन्होंने इस राज्य की रक्षा और उन्नति के लिए अच्छी सेवाएं की हैं; परंतु भारतीयों में इतिहास-संरक्षण की भावना कम होने से उनकी सेवाएं भी बहुधा अज्ञात ही हैं। इस राज्य के मंत्रियों में अधिकतर वैश्य समुदाय की ही प्रधानता रही है और अन्य की कम। वैश्यों में भी दिगंबर सम्प्रदाय की बहुलता होने से वे ही समय-समय पर मंत्री-पद पर नियत किये जाते थे, जिनका चुनाव किसी खास परिपाटी अथवा गुणों के आधार पर नहीं, अपितु बहुधा वंशपरंपरा अथवा राजा की कृपा
· ३८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
और खास सेवाओं को दृष्टि में रखकर किया जाता था । यद्यपि समय के परिवर्त्तन से अब देशी राज्यों में यह प्रथा मिटती जाती है और प्रतापगढ़ में स्वर्गीय महारावत रघुनाथसिंह के राज्यकाल से ही मंत्री-वर्ग में बाहरी आदमियों को स्थान मिलने लगा है तथापि किसी न किसी अंश में दायित्वपूर्ण पदों पर वंशपरंपरा के अनुसार वहां के निवासियों की ही नियुक्ति होती है । इस राज्य के पहले के प्रायः सब मंत्री दिगंबर सम्प्रदाय के हूंबड़ जाति के व्यक्ति हुए हैं । बागड़ के पूर्व-निवासी होने से साधारण बोलचाल में वे भी बागड़िया हूंबड़ कहलाते हैं । व्यवसाय-प्रधान जाति होने से हूंबड़ों की गणना वणिकों में होती है । पहले उनका बागड़ ( डूंगरपुर और बांसवाड़ा ) राज्य में निवास था और वे बहुत सम्पन्न थे । महारावत विक्रमसिंह के कांठल जाकर वहां अपना स्थायी निवास बनाने के बाद देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की आबादी बढ़ने लगी । फिर उक्त महारावत के क्रमानुयायियों ने बागड़िया वैश्यों को कई प्रकार की रियायतें देकर कांठल बुलवाकर वहां आबाद किया । धीरे-धीरे उन्होंने वहां व्यापार बढ़ाकर बहुत कुछ उन्नति की । उनमें से कुछ ने अपनी कारगुज़ारी और सदा- चरण से राज्य के विश्वसनीय पदों को प्राप्त किया । अमात्य-पद और नरेश के अन्तःपुर के प्रबंध के अतिरिक्त राज्य का प्राचीन दफ़्तर भी हूंबड़ जाति के व्यक्तियों के अधिकार में ही रहा । वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी में, जब कि कई पुराने राज्य बिगड़े, प्रतापगढ़ राज्य का अक्षुण्ण रहना वहां के मंत्री और राजकर्मचारियों की योग्यता का ही परिणाम है । यही नहीं उन्होंने इस राज्य को सुसमृद्ध बनाने का भी समय-समय पर प्रयत्न किया और लोकोपकार की भावनाओं से प्रेरित होकर देवालय, बाग, बावड़ियां आदि भी बनवाईं ।
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८३ वर्षावत हूंबड़ों की वर्षावंत शाखा का मूल पुरुष वर्षाशाह, महारावत हरिसिंह के समय उसका मन्त्री था, ऐसा उस समय के शिलालेखों, दान- शाह वर्षा और उसके वंशज पत्रों एवं पुस्तकों से पाया जाता है। प्रसिद्ध है कि वर्षा ने उक्त महारावत की आज्ञानुसार बागड़ के सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) क़स्बे से लगभग एक सहस्र हूंबड़-कुटुम्बों को लाकर कांठल में आबाद किया था। धार्मिक भावना से प्रेरित होकर उस (वर्षाशाह) ने देवलिया में दिगम्बर सम्प्रदाय का जैन मंदिर बनवाना आरम्भ किया था, जो पीछे से पूर्ण हुआ और बड़ा मन्दिर कहलाता है। उपर्युक्त मन्दिर की प्रतिष्ठा वर्षा के पुत्र वर्द्धमान और पौत्र दयाल ने वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) को की। वर्द्धमान और उसका लघु भ्राता उदयभान महारावत प्रतापसिंह के समय में भी मंत्री का काम करते थे, जिनका उल्लेख उक्त महारावत के वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ (ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी) के पाटणया गांव के दानपत्र और उसके समय बने हुए "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य में भी है। उदयभान थोड़े ही समय तक मंत्री रहा, परंतु वर्द्धमान महारावत पृथ्वीसिंह के राज्य समय तक प्रधान मंत्री के पद पर विद्यमान था। पाडलियों का घराना यह घराना भी हूंबड़ जाति का है। इस वंश का पाडलिया जीवराज सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) का निवासी था। वह भी अन्य हूंबड़ों के साथ बागड़ से जाकर देवलिया में आबाद पाडलिया चंद्रभाण और सुंदर हुआ। उनमें प्रमुख होने से आगे जाकर प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से उसके वंशधर 'नगरसेठ' की पदवी से सम्मानित हुए। पाडलिया चंद्रभाण महारावत गोपालसिंह के समय मंत्री रहा था। उसने दस सहस्र रुपये व्यय कर देवलिया
३८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में एक बाग़ और बावड़ी बनवाई, जिसकी महारावत गोपालसिंह के समय वि० सं० १७८८ माघ सुदि ६ (ई० स० १७३२ ता० २१ जनवरी) को प्रतिष्ठा होने का उपर्युक्त बावड़ी की प्रशस्ति में उल्लेख है। चन्द्रभाण और उसके पुत्र सुन्दर की सेवाओं से प्रसन्न होकर महारावत गोपालसिंह ने उनको डोराणा गांव जागीर में दिया। फिर वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने सुन्दर को चरखेड़ी गांव और साढ़े चारसौ बीघा भूमि प्रदान की तथा निम्नलिखित परवाना कर दिया— “तुम्हारे घर का शरणा पलता है, जो साबित है। देवलिया राज्य में दरवार के समय तुम्हारे पीछे अन्य मुत्सद्दी बैठेंगे। उदयपुर के दरबार में जाना होगा तो वहां तुम्हारी बैठक साबित है।” सुंदर के इस समय कई वंशधर विद्यमान हैं, जो विभिन्न पदों पर रहकर प्रतापगढ़ राज्य की सेवा कर रहे हैं। उपर्युक्त वंश का पाडलिया लसण महारावत पृथ्वीसिंह के समय राज्य के उच्च पद पर कार्य करता था। उसको उक्त महारावत ने आसावता [लसण के पुत्र कपूर के वंशज] गांव दिया था। महारावत गोपालसिंह ने उसपर और भी कृपा प्रकटकर उसको अपना मंत्री बनाया तथा वि० सं० १७६६ आश्विन वदि ३ (ई० स० १७४२ ता० ६ सितम्बर) को थड़ा गांव दिया। लसण का पुत्र कपूरचंद था, जिसको उस (लसण) के पीछे महारावत ने अपना मंत्री बनाया तथा वि० सं० १८११ मार्गशीर्ष बदि ५ (ई० स० १७५४ ता० ५ नवम्बर) को उक्त महारावत ने उसको मोहेड़ा गांव देकर देवासला गांव का खिराज लेने का स्वत्व भी प्रदान किया। महारावत गोपालसिंह और उसके कुंवर सालिमसिंह के बीच मनो- मालिन्य रहता था, जिससे कुंवर राज्य से बाहर रहता था। गोपालसिंह की मृत्यु के समय कुछ सरदारों ने सालिमसिंह को राज्य से वंचितकर स्वार्थ-साधन करना चाहा। उस समय मंत्री कपूरचंद ने उसके इस कार्य का तीव्र विरोध किया और सालिमसिंह को राजगद्दी पर बिठलाया।
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८५ उसकी इस सेवा से प्रसन्न होकर सालिमसिंह ने उसको मंत्री-पद पर स्थिर रखा और वि० सं० १८१६ ( ई० स० १७६२ ) में मोटी अलवेली नामक गांव जागीर में प्रदान किया। फिर कपूरचंद ने धमोतर और झांतला के सरदारों का उत्पात मिटाकर शांति स्थापित की । वि० सं० १८३१ ( ई० स० १७७४ ) में महारावत सालिमसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर सामन्तसिंह सात वर्ष की आयु में राज्यासन पर बैठा । उस समय शासन-कार्य राजमाता कुन्दनकुंवरी अपने भ्राता सरदारसिंह, मंत्री कपूरचंद, राघव बख़्शी तथा शाह गुमान के परामर्श से चलाती थी। इस परामर्शदात्री समिति में मन्त्री कपूरचंद प्रमुख था, क्योंकि वह तीन पीढ़ी से मंत्री-पद का कार्य ईमानदारी से करता चला आ रहा था, जिससे उसका अनुभव बढ़ा हुआ था। महारावत की बाल्यावस्था होने के कारण राज्य में क्षति होना स्वाभाविक था, किंतु राजमाता और उसके परामर्श- दाताओं की सावधानी के कारण कोई हानि नहीं हुई । इसका प्रभाव महारावत सामंतसिंह पर अच्छा पड़ा और उसने राज्य-मुद्रा में उक्त मंत्री का नाम भी खुदवाया । उन दिनों देश में चारों तरफ़ महान क्रांति हो रही थी। मरहटों का प्रताप घट रहा था, फिर भी उनकी कुछ शक्ति शेष होने से होल्कर, सिंधिया आदि की भारत के देशी- राज्यों पर धाक जमी हुई थी और संगठन का अभाव होने से राजपूताना के नरेश उनसे जमकर मुक़ाबला करने का साहस न रखते थे । प्रतापगढ़ राज्य का खिराज, जो होल्कर सरकार को दिया जाता था, इतना अधिक था कि राज्य उसको देने में सर्वथा असमर्थ । इसलिए खिराज की रक़म चढ़ जाया करती थी और नियमित रूप से नहीं दी जाती थी, जिसकी वसूली के लिए होल्कर की सेना जाकर समय-समय पर घेरा डाल देती थी । उसके घेरे को उठाने के लिए मंत्री-वर्ग को सदा अपने प्राणों का भय बना रहता था और राज्य को भरपूर द्रव्य देना पड़ता था । महारावत सामन्तसिंह के राज्य-काल में भी ऐसे कई अवसर आये। राज्य से मिलनेवाले तत्कालीन पत्रादि से पता चलता है कि उस समय ४६
३८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
मन्त्री कपूरचंद और महारावत के मामा सरदारसिंह पर ही खिराज चुकाने का भार था और वे होल्कर सरकार का तक़ाज़ा होने पर किसी प्रकार रक़म आदि देकर राज्य को बरबादी से बचाते थे । वि० सं० १८३५ (ई० स० १७७८) में मंत्री कपूरचंद ने अपने सजातीय बंधुओं के साथ उदयपुर राज्य के जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ धुलेव में जाकर ऋषभदेव की यात्रा की । उस समय उस संघ में १४०० स्त्री, पुरुष और बाल-बच्चे थे । उसके साथ सशस्त्र सवार, पैदल, नक़ारा, निशान, मियाना, पालकी, छड़ी आदि लवाज़मा था और कुल संख्या चार हज़ार मनुष्यों तक पहुंच गई थी । इस यात्रा के समय संघ-सहित कपूरचंद डूंगरपुर भी गया और गैबसागर तालाब की पाल पर श्रीनाथजी के मंदिर के पास ठहरा । उसने वहां के तत्कालीन नरेश महारावल शिवसिंह की सेवा में संघ-सहित उपस्थित होकर नज़र-न्योछावर की । महारावल ने भी उसका सम्मान किया और मार्गशीर्ष वदि १२ (ता० १५ नवम्बर) रविवार को अपने राज्यवर्ती सागवाड़ा के पुराने निवासी इस वणिक समुदाय के, जो अपने को डूंगरपुर राज्य की भी प्रजा समझते थे, डेरों पर गया । इस यात्रा में उस (कपूरचंद) ने पचीस सहस्र रुपया व्यय किया था । उसने वागड़ और आसपास के रहनेवाले दिगम्बर जैन हूंवड़ों के प्रत्येक व्यक्ति को भोजन कराया और प्रति गृह एक-एक रुपया और नारियल बांटा । कपूरचंद की मृत्यु वि० सं० १८३७ (ई० स० १७८०) में हुई। तब महारावत ने उसके पुत्र शिवलाल (शिवजी) को अपना मंत्री नियतकर राजमुद्रा में उसका नाम खुदवाया । कुछ काल पीछे शिवलाल ने मतभेद होने से राजकार्य में हानि होने की संभावना देख अपने पद का परित्याग करने का विचार स्थिर किया और यात्रा के लिए आज्ञा प्राप्तकर देवलिया से प्रस्थान किया । उस समय उदयपुर के महाराणा भीमसिंह, ईडर के राजा गंभीरसिंह, झाबुआ के राजा भीमसिंह, मंदसोर के सूबेदार खांडेराव वल्लाल तथा डूंगरपुर के महारावल आदि ने अपने यहां आकर स्थायी रूप से निवास करने के लिए उसके पास परवाने
भिजवाये; परंतु वह वहां नहीं गया और वि० सं० १८५६ (ई० स० १८०२ में रघुनाथद्वारे की प्रतिष्ठा के समय महारावत के बुलाने पर पीछा देवलियां गया, जहां थोड़े दिनों बाद वह बंदी कर लिया गया। उन्हीं दिनों होल्कर सरकार की ओर से चढ़े हुए खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य पर पूरी ताकीद हुई और होल्कर की सेना ने राजधानी को आकर घेर लिया। तब महारावत ने शिवलाल के पुत्र प्रतापचंद को ओल में सौंप दिया। अनन्तर रुपये चुकाकर शिवलाल ने अपने पुत्र को होल्कर सरकार की ओल से छुड़ाया। वि० सं० १८६५ (ई० स० १८०८) के लगभग उस (शिवलाल) की मृत्यु हुई। राज्य की ऐसी स्थिति देख उस समय प्रतापगढ़-निवासी राज्य- सेवा में योग देने की अपेक्षा विमुख रहने में ही अपना कल्याण समझते थे, जिससे राज्य को बड़ी हानि हुई । उन दिनों अंग्रेज़-सरकार के साथ महारावत ने संधि करली थी, जिससे बाहरी आक्रमणों से तो राज्य बच गया, परंतु महारावत की सरल प्रकृति का अनुचित लाभ उठाकर कुंवर दीपसिंह ने अपना अधिकार बहुत कुछ बढ़ा लिया और एक प्रकार से महारावत को राजकार्य से बिल्कुल बेदख़ल कर दिया। यही नहीं, उसने महारावत के विश्वासपात्र व्यक्ति-यति हेमराज, ओंकार पाडलिया, गब्बा हलकारा आदि के प्राण हरण किये, जिसपर महारावत और कुंवर के बीच पूरा विरोध हो गया। अंग्रेज़ सरकार ने इस विरोध को न बढ़ने देने के लिए कुंवर को नियन्त्रण में रखने का यत्न किया; परंतु कुंवर दीपसिंह ने न माना और उत्पात करना जारी रखा। इसपर अंग्रेज़-सरकार ने सेना भेज कुंवर को बंदी कर लिया और वह अचेरे की गढ़ी में सरकारी निरीक्षण में रक्खा गया। पुत्र-मोह से द्रवित होकर वृद्ध महारावत ने अंग्रेज़ सरकार से प्रार्थना कर कुंवर को छुड़ाने का उपक्रम किया, किंतु दीपसिंह की आयु ने अधिक साथ न दिया और देवलिया जाकर अपने पिता के चरण-स्पर्श कर अपना अपराध क्षमा कराने के पूर्व ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
३८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस बिगड़ी हुई दशा में मंत्री-पद को ग्रहणकर वहां की स्थिति को सुधारने के लिए महारावत, अंग्रेज़ सरकार तथा भंवर केसरीसिंह- (महारावत सामन्तसिंह का पौत्र और दीपसिंह का पुत्र) ने शिवजी के पुत्र नवलचंद को ही उपयुक्त समझा। महारावत और उसके ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह के विश्वास दिलाने पर वि० सं० १८८० (ई० स० १८२३) में उसने मंत्री-पद स्वीकार किया। नवलचंद ने आय-व्यय का हिसाब प्रति- वर्ष महारावत के सम्मुख उपस्थित कर रसीद ले लेने का क्रम जारी किया। वृद्धावस्था के कारण सामन्तसिंह पिछले वर्षों में राजकार्य अपने ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह को सौंपकर अधिकतर ईश्वरभक्ति में समय बिताने लगा। नवलचंद ने उक्त भंवर को भी प्रसन्न रक्खा और वह दीपसिंह को भी छुड़ाने में प्रयत्नशील रहा। केसरीसिंह का छोटा भाई दलपतसिंह डूंगरपुर के महारावल जसवन्तसिंह के दत्तक गया, इस कारण वह वहां के राजनैतिक कार्यों में भाग लेता था, जिससे दलपतसिंह ने उसको डूंगरपुर राज्य की तरफ़ से एक गांव जागीर में दिया। उसकी कार्यशैली से पोलिटिकल अफ़सर भी प्रसन्न थे और राज्य की आय में क्षति न होकर दिन-दिन वृद्धि ही हुई। नवलचंद की मृत्यु के बाद उसका भाई भोजराज महारावत दलपतसिंह के समय वि० सं० १९०७ (ई० स० १८५०) में खासगीवाले जड़ावचंद के साथ प्रधानमंत्री बनाया गया, परंतु व्यापार में बाधा पड़ने से कुछ मास बाद ही उसने इस पद का परित्याग कर दिया। नवलचंद का ज्येष्ठ पुत्र जोधराज था। उसका पुत्र हंसराज प्रतापगढ़ में रहकर उस तरफ़ के इलाक़े का सारा काम-काज करता था। उस (हंसराज) का चाचा जोधकरण (नवलचंद का छोटा पुत्र) महारावत का पूर्ण विश्वासभाजन होने के अतिरिक्त प्रबंध-कुशल व्यक्ति था। सिपाही-विद्रोह के समय उसने भी अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। महारावत दलपतसिंह ने दोनों चाचा-भतीजों की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें नवीन जागीर प्रदान की और जब वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६)
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८६ में मंत्री का पद रिक्त हुआ तो जोधकरण को खासगीवाले निहालचंद के स्थान पर नियत किया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में महारावत दलपतसिंह का स्वर्गवास होने पर उसका कुंवर महाराजकुमार उदयसिंह सोलह वर्ष की आयु में सिंहासनारूढ़ हुआ। अंग्रेज़-सरकार ने जोधकरण की उत्तम कार्यशैली का परिचय पाकर उस समय शासन-कार्य चलाने के लिए वहां रिजेंसी कौंसिल नियत करना उचित न समझा और सारा राज्य-भार जोधकरण को सौंपकर महारावत को संपूर्ण राज्याधिकार दे दिये। वि० सं० १६२३ (ई० स० १८६६) में बांसवाड़ा राज्य ने बोरी-रीछड़ी गांव के सीमा संबंधी झगड़े के कारण प्रतापगढ़ राज्य के थाने पर आक्रमण किया। उस समय जोधकरण ने योग्यतापूर्वक इस मामले को पोलिटिकल-एजेंट के पास उपस्थित किया, जिससे बांसवाड़ा राज्य की ज्यादती सिद्ध होकर यथोचित न्याय हुआ। उसने राज्य के आय-व्यय का हिसाब वर्ष की समाप्ति पर महारावत के सामने पेश कर रसीद लेने का तरीक़ा बनाया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में जब वह राज्यकार्य के लिए उदयपुर गया था, तब वहां के महाराणा शंभुसिंह ने अपने दरबार में उसको बैठने का सम्मान दिया, जैसा कि पहले शिवजी और नवलचंद को प्राप्त था। उसने प्रथम बार वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) और दूसरी बार वि० सं० १६३४ से १६३७ तक मंत्री का कार्य किया था। जोधकरण का पुत्र कानजी कई वर्ष तक सहकारी मंत्री (नायब दीवान) रहा। जब वह वि० सं० १६५२ (ई० स० १८६५) में उदयपुर भेजा गया, तब वहां के महाराणा फ़तहसिंह ने उसको भी अपने दरबार में बैठने का सम्मान प्रदान किया। वि० सं० १६५४ (ई० स० १८६७) में राजकुमारी वल्लभकुंवरी का विवाह बीकानेर के महाराजा सर गंगासिंहजी से हुआ, उस समय उस (कानजी) ने अच्छी कारगुजारी बतलाई, जिससे प्रसन्न होकर उक्त महारावत ने हंसराज और कानजी को नई जागीरें दीं। हंसराज का बड़ा पुत्र पन्नालाल और छोटा मन्नालाल हुआ। पन्नालाल कचहरी खासगी, टकसाल आदि का कई वर्ष तक हाकिम रहा।
३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उसका पौत्र अमृतलाल (पूनमचंद का पुत्र) इस समय हिसाब दफ़्तर का हाकिम है। मन्नालाल वि० सं० १६६१ (ई० स० १६०५) में महाराजकुमार मानसिंह का कामदार नियत हुआ। फिर वह महकमा खास में असिस्टेन्ट सेक्रेटरी बनाया गया। महारावत रघुनाथसिंह और महाराजकुमार मानसिंह का पूरा विश्वासपात्र होने से वह फिर कचहरी खासगी (गृह-विभाग) का अफ़सर बनाया गया। तब से अब तक वह उक्त पद पर कार्य कर रहा है। महारावत रघुनाथसिंह उसकी सलाह को मानता था। उसी प्रकार वर्त- मान महारावत सर रामसिंहजी भी उसकी हितपूर्ण सलाह को मानते हैं। उक्त महारावतजी ने वि० सं० १६८७ (ई० स० १६३०) में जागीर के एवज़ में उससे जो सेवा ली जाती थी, वह माफ़ कर दी है। उसका ज्येष्ठ पुत्र किशनलाल, बी० ए०, एल्-एल्० बी० ध्रांगधरा में फ़र्स्ट क्लास मैजिस्ट्रेट है। उपर्युक्त पाडलिया लसण का एक पुत्र हरचंद था, जिसका पांचवां वंशधर रतनलाल, महारावत उदयसिंह के पिछले राज्यसमय में प्रतापगढ़ [पार्श्व-टिप्पणी: लसण के दूसरे पुत्र हरचंद के वंशधर] राज्य का मंत्री बना। उसने महारावत रघुनाथसिंह की गद्दीनशीनी से लगाकर पिछले समय तक भली प्रकार से सेवा की। मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के सीमा सम्बन्धी झगड़े में भी उसने अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई। महारावत उदयसिंह की निःसंतान मृत्यु होने पर अचलावदा के ठाकुर ने उज्र किया, उस समय रतनलाल ने उसको समझाकर झगड़ा आगे न बढ़ने दिया। उसकी इस सेवा को महारावत रघुनाथसिंह भी मानता रहा। उक्त महारावत के समय प्रथम बार वि० सं० १६४६ (ई० स० १८६२) तक दूसरी बार वि० सं० १६५३ से ५५ (ई० स० १८६६ से ६८) तक और तीसरी बार महाराजकुमार मानसिंह के देहावसान के पीछे कुछ वर्षों तक वह मंत्री- पद पर रहा था। उसका पुत्र माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० है। उसने वि० सं० १६७७ (ई० स० १६२०) में सालिमगढ़ गांव के सीमा संबंधी झगड़े में अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। वह कई वर्ष तक हिसाब दफ़्तर का हाकिम और राजसभा का सदस्य रहा। वर्तमान