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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३८४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में एक बाग़ और बावड़ी बनवाई, जिसकी महारावत गोपालसिंह के समय वि० सं० १७८८ माघ सुदि ६ (ई० स० १७३२ ता० २१ जनवरी) को प्रतिष्ठा होने का उपर्युक्त बावड़ी की प्रशस्ति में उल्लेख है। चन्द्रभाण और उसके पुत्र सुन्दर की सेवाओं से प्रसन्न होकर महारावत गोपालसिंह ने उनको डोराणा गांव जागीर में दिया। फिर वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने सुन्दर को चरखेड़ी गांव और साढ़े चारसौ बीघा भूमि प्रदान की तथा निम्नलिखित परवाना कर दिया— “तुम्हारे घर का शरणा पलता है, जो साबित है। देवलिया राज्य में दरवार के समय तुम्हारे पीछे अन्य मुत्सद्दी बैठेंगे। उदयपुर के दरबार में जाना होगा तो वहां तुम्हारी बैठक साबित है।” सुंदर के इस समय कई वंशधर विद्यमान हैं, जो विभिन्न पदों पर रहकर प्रतापगढ़ राज्य की सेवा कर रहे हैं। उपर्युक्त वंश का पाडलिया लसण महारावत पृथ्वीसिंह के समय राज्य के उच्च पद पर कार्य करता था। उसको उक्त महारावत ने आसावता [लसण के पुत्र कपूर के वंशज] गांव दिया था। महारावत गोपालसिंह ने उसपर और भी कृपा प्रकटकर उसको अपना मंत्री बनाया तथा वि० सं० १७६६ आश्विन वदि ३ (ई० स० १७४२ ता० ६ सितम्बर) को थड़ा गांव दिया। लसण का पुत्र कपूरचंद था, जिसको उस (लसण) के पीछे महारावत ने अपना मंत्री बनाया तथा वि० सं० १८११ मार्गशीर्ष बदि ५ (ई० स० १७५४ ता० ५ नवम्बर) को उक्त महारावत ने उसको मोहेड़ा गांव देकर देवासला गांव का खिराज लेने का स्वत्व भी प्रदान किया। महारावत गोपालसिंह और उसके कुंवर सालिमसिंह के बीच मनो- मालिन्य रहता था, जिससे कुंवर राज्य से बाहर रहता था। गोपालसिंह की मृत्यु के समय कुछ सरदारों ने सालिमसिंह को राज्य से वंचितकर स्वार्थ-साधन करना चाहा। उस समय मंत्री कपूरचंद ने उसके इस कार्य का तीव्र विरोध किया और सालिमसिंह को राजगद्दी पर बिठलाया।