भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 456

प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८५ उसकी इस सेवा से प्रसन्न होकर सालिमसिंह ने उसको मंत्री-पद पर स्थिर रखा और वि० सं० १८१६ ( ई० स० १७६२ ) में मोटी अलवेली नामक गांव जागीर में प्रदान किया। फिर कपूरचंद ने धमोतर और झांतला के सरदारों का उत्पात मिटाकर शांति स्थापित की । वि० सं० १८३१ ( ई० स० १७७४ ) में महारावत सालिमसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर सामन्तसिंह सात वर्ष की आयु में राज्यासन पर बैठा । उस समय शासन-कार्य राजमाता कुन्दनकुंवरी अपने भ्राता सरदारसिंह, मंत्री कपूरचंद, राघव बख़्शी तथा शाह गुमान के परामर्श से चलाती थी। इस परामर्शदात्री समिति में मन्त्री कपूरचंद प्रमुख था, क्योंकि वह तीन पीढ़ी से मंत्री-पद का कार्य ईमानदारी से करता चला आ रहा था, जिससे उसका अनुभव बढ़ा हुआ था। महारावत की बाल्यावस्था होने के कारण राज्य में क्षति होना स्वाभाविक था, किंतु राजमाता और उसके परामर्श- दाताओं की सावधानी के कारण कोई हानि नहीं हुई । इसका प्रभाव महारावत सामंतसिंह पर अच्छा पड़ा और उसने राज्य-मुद्रा में उक्त मंत्री का नाम भी खुदवाया । उन दिनों देश में चारों तरफ़ महान क्रांति हो रही थी। मरहटों का प्रताप घट रहा था, फिर भी उनकी कुछ शक्ति शेष होने से होल्कर, सिंधिया आदि की भारत के देशी- राज्यों पर धाक जमी हुई थी और संगठन का अभाव होने से राजपूताना के नरेश उनसे जमकर मुक़ाबला करने का साहस न रखते थे । प्रतापगढ़ राज्य का खिराज, जो होल्कर सरकार को दिया जाता था, इतना अधिक था कि राज्य उसको देने में सर्वथा असमर्थ । इसलिए खिराज की रक़म चढ़ जाया करती थी और नियमित रूप से नहीं दी जाती थी, जिसकी वसूली के लिए होल्कर की सेना जाकर समय-समय पर घेरा डाल देती थी । उसके घेरे को उठाने के लिए मंत्री-वर्ग को सदा अपने प्राणों का भय बना रहता था और राज्य को भरपूर द्रव्य देना पड़ता था । महारावत सामन्तसिंह के राज्य-काल में भी ऐसे कई अवसर आये। राज्य से मिलनेवाले तत्कालीन पत्रादि से पता चलता है कि उस समय ४६