राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 457, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
मन्त्री कपूरचंद और महारावत के मामा सरदारसिंह पर ही खिराज चुकाने का भार था और वे होल्कर सरकार का तक़ाज़ा होने पर किसी प्रकार रक़म आदि देकर राज्य को बरबादी से बचाते थे । वि० सं० १८३५ (ई० स० १७७८) में मंत्री कपूरचंद ने अपने सजातीय बंधुओं के साथ उदयपुर राज्य के जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ धुलेव में जाकर ऋषभदेव की यात्रा की । उस समय उस संघ में १४०० स्त्री, पुरुष और बाल-बच्चे थे । उसके साथ सशस्त्र सवार, पैदल, नक़ारा, निशान, मियाना, पालकी, छड़ी आदि लवाज़मा था और कुल संख्या चार हज़ार मनुष्यों तक पहुंच गई थी । इस यात्रा के समय संघ-सहित कपूरचंद डूंगरपुर भी गया और गैबसागर तालाब की पाल पर श्रीनाथजी के मंदिर के पास ठहरा । उसने वहां के तत्कालीन नरेश महारावल शिवसिंह की सेवा में संघ-सहित उपस्थित होकर नज़र-न्योछावर की । महारावल ने भी उसका सम्मान किया और मार्गशीर्ष वदि १२ (ता० १५ नवम्बर) रविवार को अपने राज्यवर्ती सागवाड़ा के पुराने निवासी इस वणिक समुदाय के, जो अपने को डूंगरपुर राज्य की भी प्रजा समझते थे, डेरों पर गया । इस यात्रा में उस (कपूरचंद) ने पचीस सहस्र रुपया व्यय किया था । उसने वागड़ और आसपास के रहनेवाले दिगम्बर जैन हूंवड़ों के प्रत्येक व्यक्ति को भोजन कराया और प्रति गृह एक-एक रुपया और नारियल बांटा । कपूरचंद की मृत्यु वि० सं० १८३७ (ई० स० १७८०) में हुई। तब महारावत ने उसके पुत्र शिवलाल (शिवजी) को अपना मंत्री नियतकर राजमुद्रा में उसका नाम खुदवाया । कुछ काल पीछे शिवलाल ने मतभेद होने से राजकार्य में हानि होने की संभावना देख अपने पद का परित्याग करने का विचार स्थिर किया और यात्रा के लिए आज्ञा प्राप्तकर देवलिया से प्रस्थान किया । उस समय उदयपुर के महाराणा भीमसिंह, ईडर के राजा गंभीरसिंह, झाबुआ के राजा भीमसिंह, मंदसोर के सूबेदार खांडेराव वल्लाल तथा डूंगरपुर के महारावल आदि ने अपने यहां आकर स्थायी रूप से निवास करने के लिए उसके पास परवाने