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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 534 में से

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भिजवाये; परंतु वह वहां नहीं गया और वि० सं० १८५६ (ई० स० १८०२ में रघुनाथद्वारे की प्रतिष्ठा के समय महारावत के बुलाने पर पीछा देवलियां गया, जहां थोड़े दिनों बाद वह बंदी कर लिया गया। उन्हीं दिनों होल्कर सरकार की ओर से चढ़े हुए खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य पर पूरी ताकीद हुई और होल्कर की सेना ने राजधानी को आकर घेर लिया। तब महारावत ने शिवलाल के पुत्र प्रतापचंद को ओल में सौंप दिया। अनन्तर रुपये चुकाकर शिवलाल ने अपने पुत्र को होल्कर सरकार की ओल से छुड़ाया। वि० सं० १८६५ (ई० स० १८०८) के लगभग उस (शिवलाल) की मृत्यु हुई। राज्य की ऐसी स्थिति देख उस समय प्रतापगढ़-निवासी राज्य- सेवा में योग देने की अपेक्षा विमुख रहने में ही अपना कल्याण समझते थे, जिससे राज्य को बड़ी हानि हुई । उन दिनों अंग्रेज़-सरकार के साथ महारावत ने संधि करली थी, जिससे बाहरी आक्रमणों से तो राज्य बच गया, परंतु महारावत की सरल प्रकृति का अनुचित लाभ उठाकर कुंवर दीपसिंह ने अपना अधिकार बहुत कुछ बढ़ा लिया और एक प्रकार से महारावत को राजकार्य से बिल्कुल बेदख़ल कर दिया। यही नहीं, उसने महारावत के विश्वासपात्र व्यक्ति-यति हेमराज, ओंकार पाडलिया, गब्बा हलकारा आदि के प्राण हरण किये, जिसपर महारावत और कुंवर के बीच पूरा विरोध हो गया। अंग्रेज़ सरकार ने इस विरोध को न बढ़ने देने के लिए कुंवर को नियन्त्रण में रखने का यत्न किया; परंतु कुंवर दीपसिंह ने न माना और उत्पात करना जारी रखा। इसपर अंग्रेज़-सरकार ने सेना भेज कुंवर को बंदी कर लिया और वह अचेरे की गढ़ी में सरकारी निरीक्षण में रक्खा गया। पुत्र-मोह से द्रवित होकर वृद्ध महारावत ने अंग्रेज़ सरकार से प्रार्थना कर कुंवर को छुड़ाने का उपक्रम किया, किंतु दीपसिंह की आयु ने अधिक साथ न दिया और देवलिया जाकर अपने पिता के चरण-स्पर्श कर अपना अपराध क्षमा कराने के पूर्व ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।