राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस बिगड़ी हुई दशा में मंत्री-पद को ग्रहणकर वहां की स्थिति को सुधारने के लिए महारावत, अंग्रेज़ सरकार तथा भंवर केसरीसिंह- (महारावत सामन्तसिंह का पौत्र और दीपसिंह का पुत्र) ने शिवजी के पुत्र नवलचंद को ही उपयुक्त समझा। महारावत और उसके ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह के विश्वास दिलाने पर वि० सं० १८८० (ई० स० १८२३) में उसने मंत्री-पद स्वीकार किया। नवलचंद ने आय-व्यय का हिसाब प्रति- वर्ष महारावत के सम्मुख उपस्थित कर रसीद ले लेने का क्रम जारी किया। वृद्धावस्था के कारण सामन्तसिंह पिछले वर्षों में राजकार्य अपने ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह को सौंपकर अधिकतर ईश्वरभक्ति में समय बिताने लगा। नवलचंद ने उक्त भंवर को भी प्रसन्न रक्खा और वह दीपसिंह को भी छुड़ाने में प्रयत्नशील रहा। केसरीसिंह का छोटा भाई दलपतसिंह डूंगरपुर के महारावल जसवन्तसिंह के दत्तक गया, इस कारण वह वहां के राजनैतिक कार्यों में भाग लेता था, जिससे दलपतसिंह ने उसको डूंगरपुर राज्य की तरफ़ से एक गांव जागीर में दिया। उसकी कार्यशैली से पोलिटिकल अफ़सर भी प्रसन्न थे और राज्य की आय में क्षति न होकर दिन-दिन वृद्धि ही हुई। नवलचंद की मृत्यु के बाद उसका भाई भोजराज महारावत दलपतसिंह के समय वि० सं० १९०७ (ई० स० १८५०) में खासगीवाले जड़ावचंद के साथ प्रधानमंत्री बनाया गया, परंतु व्यापार में बाधा पड़ने से कुछ मास बाद ही उसने इस पद का परित्याग कर दिया। नवलचंद का ज्येष्ठ पुत्र जोधराज था। उसका पुत्र हंसराज प्रतापगढ़ में रहकर उस तरफ़ के इलाक़े का सारा काम-काज करता था। उस (हंसराज) का चाचा जोधकरण (नवलचंद का छोटा पुत्र) महारावत का पूर्ण विश्वासभाजन होने के अतिरिक्त प्रबंध-कुशल व्यक्ति था। सिपाही-विद्रोह के समय उसने भी अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। महारावत दलपतसिंह ने दोनों चाचा-भतीजों की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें नवीन जागीर प्रदान की और जब वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६)