राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८६ में मंत्री का पद रिक्त हुआ तो जोधकरण को खासगीवाले निहालचंद के स्थान पर नियत किया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में महारावत दलपतसिंह का स्वर्गवास होने पर उसका कुंवर महाराजकुमार उदयसिंह सोलह वर्ष की आयु में सिंहासनारूढ़ हुआ। अंग्रेज़-सरकार ने जोधकरण की उत्तम कार्यशैली का परिचय पाकर उस समय शासन-कार्य चलाने के लिए वहां रिजेंसी कौंसिल नियत करना उचित न समझा और सारा राज्य-भार जोधकरण को सौंपकर महारावत को संपूर्ण राज्याधिकार दे दिये। वि० सं० १६२३ (ई० स० १८६६) में बांसवाड़ा राज्य ने बोरी-रीछड़ी गांव के सीमा संबंधी झगड़े के कारण प्रतापगढ़ राज्य के थाने पर आक्रमण किया। उस समय जोधकरण ने योग्यतापूर्वक इस मामले को पोलिटिकल-एजेंट के पास उपस्थित किया, जिससे बांसवाड़ा राज्य की ज्यादती सिद्ध होकर यथोचित न्याय हुआ। उसने राज्य के आय-व्यय का हिसाब वर्ष की समाप्ति पर महारावत के सामने पेश कर रसीद लेने का तरीक़ा बनाया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में जब वह राज्यकार्य के लिए उदयपुर गया था, तब वहां के महाराणा शंभुसिंह ने अपने दरबार में उसको बैठने का सम्मान दिया, जैसा कि पहले शिवजी और नवलचंद को प्राप्त था। उसने प्रथम बार वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) और दूसरी बार वि० सं० १६३४ से १६३७ तक मंत्री का कार्य किया था। जोधकरण का पुत्र कानजी कई वर्ष तक सहकारी मंत्री (नायब दीवान) रहा। जब वह वि० सं० १६५२ (ई० स० १८६५) में उदयपुर भेजा गया, तब वहां के महाराणा फ़तहसिंह ने उसको भी अपने दरबार में बैठने का सम्मान प्रदान किया। वि० सं० १६५४ (ई० स० १८६७) में राजकुमारी वल्लभकुंवरी का विवाह बीकानेर के महाराजा सर गंगासिंहजी से हुआ, उस समय उस (कानजी) ने अच्छी कारगुजारी बतलाई, जिससे प्रसन्न होकर उक्त महारावत ने हंसराज और कानजी को नई जागीरें दीं। हंसराज का बड़ा पुत्र पन्नालाल और छोटा मन्नालाल हुआ। पन्नालाल कचहरी खासगी, टकसाल आदि का कई वर्ष तक हाकिम रहा।