राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उसका पौत्र अमृतलाल (पूनमचंद का पुत्र) इस समय हिसाब दफ़्तर का हाकिम है। मन्नालाल वि० सं० १६६१ (ई० स० १६०५) में महाराजकुमार मानसिंह का कामदार नियत हुआ। फिर वह महकमा खास में असिस्टेन्ट सेक्रेटरी बनाया गया। महारावत रघुनाथसिंह और महाराजकुमार मानसिंह का पूरा विश्वासपात्र होने से वह फिर कचहरी खासगी (गृह-विभाग) का अफ़सर बनाया गया। तब से अब तक वह उक्त पद पर कार्य कर रहा है। महारावत रघुनाथसिंह उसकी सलाह को मानता था। उसी प्रकार वर्त- मान महारावत सर रामसिंहजी भी उसकी हितपूर्ण सलाह को मानते हैं। उक्त महारावतजी ने वि० सं० १६८७ (ई० स० १६३०) में जागीर के एवज़ में उससे जो सेवा ली जाती थी, वह माफ़ कर दी है। उसका ज्येष्ठ पुत्र किशनलाल, बी० ए०, एल्-एल्० बी० ध्रांगधरा में फ़र्स्ट क्लास मैजिस्ट्रेट है। उपर्युक्त पाडलिया लसण का एक पुत्र हरचंद था, जिसका पांचवां वंशधर रतनलाल, महारावत उदयसिंह के पिछले राज्यसमय में प्रतापगढ़ [पार्श्व-टिप्पणी: लसण के दूसरे पुत्र हरचंद के वंशधर] राज्य का मंत्री बना। उसने महारावत रघुनाथसिंह की गद्दीनशीनी से लगाकर पिछले समय तक भली प्रकार से सेवा की। मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के सीमा सम्बन्धी झगड़े में भी उसने अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई। महारावत उदयसिंह की निःसंतान मृत्यु होने पर अचलावदा के ठाकुर ने उज्र किया, उस समय रतनलाल ने उसको समझाकर झगड़ा आगे न बढ़ने दिया। उसकी इस सेवा को महारावत रघुनाथसिंह भी मानता रहा। उक्त महारावत के समय प्रथम बार वि० सं० १६४६ (ई० स० १८६२) तक दूसरी बार वि० सं० १६५३ से ५५ (ई० स० १८६६ से ६८) तक और तीसरी बार महाराजकुमार मानसिंह के देहावसान के पीछे कुछ वर्षों तक वह मंत्री- पद पर रहा था। उसका पुत्र माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० है। उसने वि० सं० १६७७ (ई० स० १६२०) में सालिमगढ़ गांव के सीमा संबंधी झगड़े में अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। वह कई वर्ष तक हिसाब दफ़्तर का हाकिम और राजसभा का सदस्य रहा। वर्तमान