राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३६१ महारावतजी ने उसको नायब दीवान बनाया। फिर शाह चुन्नीलाल शराफ़ के अलग होने पर जब दीवान की जगह खाली हुई तो वह स्थानापन्न दीवान नियत हुआ और वि० सं० १९९६ (ई० स० १९३९) के प्रारंभ तक उक्त पद का कार्य करता रहा और उससे महारावत और वहां के निवासी संतुष्ट रहे। इस समय वह प्रतापगढ़ राज्य का नायब दीवान है और सुचारु रूप से अपना कार्य कर रहा है। खासगीवालों का घराना महारावत के गृह-विभाग (अन्तःपुर) का प्रबंध और निजी कार्य करनेवाले व्यक्ति इस राज्य में खासगीवाले कर्मचारी कहलाते हैं। इस पद का कार्य पूर्ण विश्वासपात्र व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं सौंपा जाता। उनके सुपुर्द राज्य के अन्य उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य भी रक्खे जाते हैं। इस खानदान के व्यक्ति भी हूंबड़ जाति के महाजन हैं और उनका अल्ल तलाटी है। इस वंश के शाह जड़ावचंद को महारावत सामंतसिंह ने वि० सं० १८७० (ई० स० १८१३) में अपना पूरा विश्वासपात्र समझ कर खासगी के महकमे में नियत किया। उसने समय-समय पर उक्त महारावत की अच्छी सेवा कर पूर्ण स्वामीभक्ति दिखलाई। मरहटों के उपद्रवों तथा अन्य कई झमेलों से देश की स्थिति संभलने नहीं पाई थी कि ऐसे समय में वि० सं० १८४० (ई० स० १८३३) में प्रतापगढ़ राज्य में दुर्भिक्ष हो गया। उस समय भी जड़ावचंद ने राज्य की अच्छी सेवा की, जिससे महारावत ने प्रसन्न होकर उसकी जागीर में वृद्धि की। उक्त महारावत के पिछले समय में उसका पौत्र दलपतसिंह डूंगरपुर में भी रहा करता था, जिससे राज्य में अधिक सुधार नहीं हो सकता था। इस- लिए महारावत सामंतसिंह का परलोकवास होने पर दलपतसिंह ने राजगद्दी पर बैठते ही जड़ावचंद को वि० सं० १९०० (ई० स० १८४३) में अपना मंत्री बनाया। उसने अपने स्वामी की इच्छानुसार शासन-कार्य योग्यता- पूर्वक चलाया, जिससे राज्य की आय बढ़ी, कई नये गांव बसे और