राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
व्यापार में भी उन्नति हुई। वह सिपाही-विद्रोह के समय तक अपने पद पर बना रहा और उसने अंग्रेज़-सरकार के प्रति उस कठिन समय में भी वफ़ादारी में अन्तर न आने दिया। वि० सं० १९१४ (ई० स० १८५७) में जड़ायचंद की मृत्यु होने पर उसका पुत्र शाह निहालचंद मंत्री हुआ, जिसने वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६) तक इस पद का कार्य किया और ग़दर के अवसर पर बागी सरदार क़ासिमखां आदि के मुकाबले के समय उसने सदैव महारावत के साथ रहकर अच्छा कार्य किया। निहालचंद के छोटे भाई कस्तूरचंद और कपूरचंद थे। वे खासगी का काम पूर्ववत् करते रहे। महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १९३३ (ई० स० १८७६) में वहां के काश्तकार इलाक़ा छोड़कर चले गये, तब महारावत ने अपने विश्वासपात्र सेवक कपूरचंद को काश्तकारों को समझा- कर पीछा लाने का हुक्म दिया। इसपर उसने अपने भतीजे नंदलाल- सहित गांवों में जा काश्तकारों को समझाकर पीछा आबाद किया। वि० सं० १९३६ (ई० स० १८७६) में उक्त महारावत के अन्तःपुर की ड्योढ़ी की निगरानी का सारा काम पूरे अख्तियार-सहित कपूरचंद को सौंपा गया और उसकी उत्तम सेवाओं के एवज़ में वि० सं० १९४५ (ई० स० १८८८) में उसकी जागीर का आधा खिराज माफ़ कर दिया गया। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८८६) में महारावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत हो गया। उस समय अरनोद के महाराज रघुनाथसिंह को राजगद्दी पर बिठलाने में शाह कपूरचंद ने पूर्ण यत्न किया। कपूरचंद का पुत्र अमृतलाल भी अन्तःपुर की ड्योढ़ी का प्रबंधकर्ता था और उसके सुपुर्द राज्य के मुहाफ़िज़ख़ाने एवं कारखानें जात की निगरानी का कार्य बहुत वर्षों तक रहा। कपूरचंद का तीसरा पुत्र जोधकरण, बी० ए० था। प्रतापगढ़ राज्य में वही सर्वप्रथम व्यक्ति था, जिसने अंग्रेज़ी में बी० ए० तक की उच्च परीक्षा अपने ही साहस से पास की। फिर वह महारावत रघुनाथसिंह का प्राइवेट सेक्रेटरी नियत हुआ। वि० सं० १९५६ (ई० स० १८६६) के भयंकर अकाल