राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८५ उसकी इस सेवा से प्रसन्न होकर सालिमसिंह ने उसको मंत्री-पद पर स्थिर रखा और वि० सं० १८१६ ( ई० स० १७६२ ) में मोटी अलवेली नामक गांव जागीर में प्रदान किया। फिर कपूरचंद ने धमोतर और झांतला के सरदारों का उत्पात मिटाकर शांति स्थापित की । वि० सं० १८३१ ( ई० स० १७७४ ) में महारावत सालिमसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर सामन्तसिंह सात वर्ष की आयु में राज्यासन पर बैठा । उस समय शासन-कार्य राजमाता कुन्दनकुंवरी अपने भ्राता सरदारसिंह, मंत्री कपूरचंद, राघव बख़्शी तथा शाह गुमान के परामर्श से चलाती थी। इस परामर्शदात्री समिति में मन्त्री कपूरचंद प्रमुख था, क्योंकि वह तीन पीढ़ी से मंत्री-पद का कार्य ईमानदारी से करता चला आ रहा था, जिससे उसका अनुभव बढ़ा हुआ था। महारावत की बाल्यावस्था होने के कारण राज्य में क्षति होना स्वाभाविक था, किंतु राजमाता और उसके परामर्श- दाताओं की सावधानी के कारण कोई हानि नहीं हुई । इसका प्रभाव महारावत सामंतसिंह पर अच्छा पड़ा और उसने राज्य-मुद्रा में उक्त मंत्री का नाम भी खुदवाया । उन दिनों देश में चारों तरफ़ महान क्रांति हो रही थी। मरहटों का प्रताप घट रहा था, फिर भी उनकी कुछ शक्ति शेष होने से होल्कर, सिंधिया आदि की भारत के देशी- राज्यों पर धाक जमी हुई थी और संगठन का अभाव होने से राजपूताना के नरेश उनसे जमकर मुक़ाबला करने का साहस न रखते थे । प्रतापगढ़ राज्य का खिराज, जो होल्कर सरकार को दिया जाता था, इतना अधिक था कि राज्य उसको देने में सर्वथा असमर्थ । इसलिए खिराज की रक़म चढ़ जाया करती थी और नियमित रूप से नहीं दी जाती थी, जिसकी वसूली के लिए होल्कर की सेना जाकर समय-समय पर घेरा डाल देती थी । उसके घेरे को उठाने के लिए मंत्री-वर्ग को सदा अपने प्राणों का भय बना रहता था और राज्य को भरपूर द्रव्य देना पड़ता था । महारावत सामन्तसिंह के राज्य-काल में भी ऐसे कई अवसर आये। राज्य से मिलनेवाले तत्कालीन पत्रादि से पता चलता है कि उस समय ४६
३८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
मन्त्री कपूरचंद और महारावत के मामा सरदारसिंह पर ही खिराज चुकाने का भार था और वे होल्कर सरकार का तक़ाज़ा होने पर किसी प्रकार रक़म आदि देकर राज्य को बरबादी से बचाते थे । वि० सं० १८३५ (ई० स० १७७८) में मंत्री कपूरचंद ने अपने सजातीय बंधुओं के साथ उदयपुर राज्य के जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ धुलेव में जाकर ऋषभदेव की यात्रा की । उस समय उस संघ में १४०० स्त्री, पुरुष और बाल-बच्चे थे । उसके साथ सशस्त्र सवार, पैदल, नक़ारा, निशान, मियाना, पालकी, छड़ी आदि लवाज़मा था और कुल संख्या चार हज़ार मनुष्यों तक पहुंच गई थी । इस यात्रा के समय संघ-सहित कपूरचंद डूंगरपुर भी गया और गैबसागर तालाब की पाल पर श्रीनाथजी के मंदिर के पास ठहरा । उसने वहां के तत्कालीन नरेश महारावल शिवसिंह की सेवा में संघ-सहित उपस्थित होकर नज़र-न्योछावर की । महारावल ने भी उसका सम्मान किया और मार्गशीर्ष वदि १२ (ता० १५ नवम्बर) रविवार को अपने राज्यवर्ती सागवाड़ा के पुराने निवासी इस वणिक समुदाय के, जो अपने को डूंगरपुर राज्य की भी प्रजा समझते थे, डेरों पर गया । इस यात्रा में उस (कपूरचंद) ने पचीस सहस्र रुपया व्यय किया था । उसने वागड़ और आसपास के रहनेवाले दिगम्बर जैन हूंवड़ों के प्रत्येक व्यक्ति को भोजन कराया और प्रति गृह एक-एक रुपया और नारियल बांटा । कपूरचंद की मृत्यु वि० सं० १८३७ (ई० स० १७८०) में हुई। तब महारावत ने उसके पुत्र शिवलाल (शिवजी) को अपना मंत्री नियतकर राजमुद्रा में उसका नाम खुदवाया । कुछ काल पीछे शिवलाल ने मतभेद होने से राजकार्य में हानि होने की संभावना देख अपने पद का परित्याग करने का विचार स्थिर किया और यात्रा के लिए आज्ञा प्राप्तकर देवलिया से प्रस्थान किया । उस समय उदयपुर के महाराणा भीमसिंह, ईडर के राजा गंभीरसिंह, झाबुआ के राजा भीमसिंह, मंदसोर के सूबेदार खांडेराव वल्लाल तथा डूंगरपुर के महारावल आदि ने अपने यहां आकर स्थायी रूप से निवास करने के लिए उसके पास परवाने
भिजवाये; परंतु वह वहां नहीं गया और वि० सं० १८५६ (ई० स० १८०२ में रघुनाथद्वारे की प्रतिष्ठा के समय महारावत के बुलाने पर पीछा देवलियां गया, जहां थोड़े दिनों बाद वह बंदी कर लिया गया। उन्हीं दिनों होल्कर सरकार की ओर से चढ़े हुए खिराज की वसूली के लिए प्रतापगढ़ राज्य पर पूरी ताकीद हुई और होल्कर की सेना ने राजधानी को आकर घेर लिया। तब महारावत ने शिवलाल के पुत्र प्रतापचंद को ओल में सौंप दिया। अनन्तर रुपये चुकाकर शिवलाल ने अपने पुत्र को होल्कर सरकार की ओल से छुड़ाया। वि० सं० १८६५ (ई० स० १८०८) के लगभग उस (शिवलाल) की मृत्यु हुई। राज्य की ऐसी स्थिति देख उस समय प्रतापगढ़-निवासी राज्य- सेवा में योग देने की अपेक्षा विमुख रहने में ही अपना कल्याण समझते थे, जिससे राज्य को बड़ी हानि हुई । उन दिनों अंग्रेज़-सरकार के साथ महारावत ने संधि करली थी, जिससे बाहरी आक्रमणों से तो राज्य बच गया, परंतु महारावत की सरल प्रकृति का अनुचित लाभ उठाकर कुंवर दीपसिंह ने अपना अधिकार बहुत कुछ बढ़ा लिया और एक प्रकार से महारावत को राजकार्य से बिल्कुल बेदख़ल कर दिया। यही नहीं, उसने महारावत के विश्वासपात्र व्यक्ति-यति हेमराज, ओंकार पाडलिया, गब्बा हलकारा आदि के प्राण हरण किये, जिसपर महारावत और कुंवर के बीच पूरा विरोध हो गया। अंग्रेज़ सरकार ने इस विरोध को न बढ़ने देने के लिए कुंवर को नियन्त्रण में रखने का यत्न किया; परंतु कुंवर दीपसिंह ने न माना और उत्पात करना जारी रखा। इसपर अंग्रेज़-सरकार ने सेना भेज कुंवर को बंदी कर लिया और वह अचेरे की गढ़ी में सरकारी निरीक्षण में रक्खा गया। पुत्र-मोह से द्रवित होकर वृद्ध महारावत ने अंग्रेज़ सरकार से प्रार्थना कर कुंवर को छुड़ाने का उपक्रम किया, किंतु दीपसिंह की आयु ने अधिक साथ न दिया और देवलिया जाकर अपने पिता के चरण-स्पर्श कर अपना अपराध क्षमा कराने के पूर्व ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
३८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस बिगड़ी हुई दशा में मंत्री-पद को ग्रहणकर वहां की स्थिति को सुधारने के लिए महारावत, अंग्रेज़ सरकार तथा भंवर केसरीसिंह- (महारावत सामन्तसिंह का पौत्र और दीपसिंह का पुत्र) ने शिवजी के पुत्र नवलचंद को ही उपयुक्त समझा। महारावत और उसके ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह के विश्वास दिलाने पर वि० सं० १८८० (ई० स० १८२३) में उसने मंत्री-पद स्वीकार किया। नवलचंद ने आय-व्यय का हिसाब प्रति- वर्ष महारावत के सम्मुख उपस्थित कर रसीद ले लेने का क्रम जारी किया। वृद्धावस्था के कारण सामन्तसिंह पिछले वर्षों में राजकार्य अपने ज्येष्ठ पौत्र केसरीसिंह को सौंपकर अधिकतर ईश्वरभक्ति में समय बिताने लगा। नवलचंद ने उक्त भंवर को भी प्रसन्न रक्खा और वह दीपसिंह को भी छुड़ाने में प्रयत्नशील रहा। केसरीसिंह का छोटा भाई दलपतसिंह डूंगरपुर के महारावल जसवन्तसिंह के दत्तक गया, इस कारण वह वहां के राजनैतिक कार्यों में भाग लेता था, जिससे दलपतसिंह ने उसको डूंगरपुर राज्य की तरफ़ से एक गांव जागीर में दिया। उसकी कार्यशैली से पोलिटिकल अफ़सर भी प्रसन्न थे और राज्य की आय में क्षति न होकर दिन-दिन वृद्धि ही हुई। नवलचंद की मृत्यु के बाद उसका भाई भोजराज महारावत दलपतसिंह के समय वि० सं० १९०७ (ई० स० १८५०) में खासगीवाले जड़ावचंद के साथ प्रधानमंत्री बनाया गया, परंतु व्यापार में बाधा पड़ने से कुछ मास बाद ही उसने इस पद का परित्याग कर दिया। नवलचंद का ज्येष्ठ पुत्र जोधराज था। उसका पुत्र हंसराज प्रतापगढ़ में रहकर उस तरफ़ के इलाक़े का सारा काम-काज करता था। उस (हंसराज) का चाचा जोधकरण (नवलचंद का छोटा पुत्र) महारावत का पूर्ण विश्वासभाजन होने के अतिरिक्त प्रबंध-कुशल व्यक्ति था। सिपाही-विद्रोह के समय उसने भी अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। महारावत दलपतसिंह ने दोनों चाचा-भतीजों की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें नवीन जागीर प्रदान की और जब वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६)
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८६ में मंत्री का पद रिक्त हुआ तो जोधकरण को खासगीवाले निहालचंद के स्थान पर नियत किया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में महारावत दलपतसिंह का स्वर्गवास होने पर उसका कुंवर महाराजकुमार उदयसिंह सोलह वर्ष की आयु में सिंहासनारूढ़ हुआ। अंग्रेज़-सरकार ने जोधकरण की उत्तम कार्यशैली का परिचय पाकर उस समय शासन-कार्य चलाने के लिए वहां रिजेंसी कौंसिल नियत करना उचित न समझा और सारा राज्य-भार जोधकरण को सौंपकर महारावत को संपूर्ण राज्याधिकार दे दिये। वि० सं० १६२३ (ई० स० १८६६) में बांसवाड़ा राज्य ने बोरी-रीछड़ी गांव के सीमा संबंधी झगड़े के कारण प्रतापगढ़ राज्य के थाने पर आक्रमण किया। उस समय जोधकरण ने योग्यतापूर्वक इस मामले को पोलिटिकल-एजेंट के पास उपस्थित किया, जिससे बांसवाड़ा राज्य की ज्यादती सिद्ध होकर यथोचित न्याय हुआ। उसने राज्य के आय-व्यय का हिसाब वर्ष की समाप्ति पर महारावत के सामने पेश कर रसीद लेने का तरीक़ा बनाया। वि० सं० १६२० (ई० स० १८६३) में जब वह राज्यकार्य के लिए उदयपुर गया था, तब वहां के महाराणा शंभुसिंह ने अपने दरबार में उसको बैठने का सम्मान दिया, जैसा कि पहले शिवजी और नवलचंद को प्राप्त था। उसने प्रथम बार वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) और दूसरी बार वि० सं० १६३४ से १६३७ तक मंत्री का कार्य किया था। जोधकरण का पुत्र कानजी कई वर्ष तक सहकारी मंत्री (नायब दीवान) रहा। जब वह वि० सं० १६५२ (ई० स० १८६५) में उदयपुर भेजा गया, तब वहां के महाराणा फ़तहसिंह ने उसको भी अपने दरबार में बैठने का सम्मान प्रदान किया। वि० सं० १६५४ (ई० स० १८६७) में राजकुमारी वल्लभकुंवरी का विवाह बीकानेर के महाराजा सर गंगासिंहजी से हुआ, उस समय उस (कानजी) ने अच्छी कारगुजारी बतलाई, जिससे प्रसन्न होकर उक्त महारावत ने हंसराज और कानजी को नई जागीरें दीं। हंसराज का बड़ा पुत्र पन्नालाल और छोटा मन्नालाल हुआ। पन्नालाल कचहरी खासगी, टकसाल आदि का कई वर्ष तक हाकिम रहा।
३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उसका पौत्र अमृतलाल (पूनमचंद का पुत्र) इस समय हिसाब दफ़्तर का हाकिम है। मन्नालाल वि० सं० १६६१ (ई० स० १६०५) में महाराजकुमार मानसिंह का कामदार नियत हुआ। फिर वह महकमा खास में असिस्टेन्ट सेक्रेटरी बनाया गया। महारावत रघुनाथसिंह और महाराजकुमार मानसिंह का पूरा विश्वासपात्र होने से वह फिर कचहरी खासगी (गृह-विभाग) का अफ़सर बनाया गया। तब से अब तक वह उक्त पद पर कार्य कर रहा है। महारावत रघुनाथसिंह उसकी सलाह को मानता था। उसी प्रकार वर्त- मान महारावत सर रामसिंहजी भी उसकी हितपूर्ण सलाह को मानते हैं। उक्त महारावतजी ने वि० सं० १६८७ (ई० स० १६३०) में जागीर के एवज़ में उससे जो सेवा ली जाती थी, वह माफ़ कर दी है। उसका ज्येष्ठ पुत्र किशनलाल, बी० ए०, एल्-एल्० बी० ध्रांगधरा में फ़र्स्ट क्लास मैजिस्ट्रेट है। उपर्युक्त पाडलिया लसण का एक पुत्र हरचंद था, जिसका पांचवां वंशधर रतनलाल, महारावत उदयसिंह के पिछले राज्यसमय में प्रतापगढ़ [पार्श्व-टिप्पणी: लसण के दूसरे पुत्र हरचंद के वंशधर] राज्य का मंत्री बना। उसने महारावत रघुनाथसिंह की गद्दीनशीनी से लगाकर पिछले समय तक भली प्रकार से सेवा की। मेवाड़ और प्रतापगढ़ राज्य के सीमा सम्बन्धी झगड़े में भी उसने अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई। महारावत उदयसिंह की निःसंतान मृत्यु होने पर अचलावदा के ठाकुर ने उज्र किया, उस समय रतनलाल ने उसको समझाकर झगड़ा आगे न बढ़ने दिया। उसकी इस सेवा को महारावत रघुनाथसिंह भी मानता रहा। उक्त महारावत के समय प्रथम बार वि० सं० १६४६ (ई० स० १८६२) तक दूसरी बार वि० सं० १६५३ से ५५ (ई० स० १८६६ से ६८) तक और तीसरी बार महाराजकुमार मानसिंह के देहावसान के पीछे कुछ वर्षों तक वह मंत्री- पद पर रहा था। उसका पुत्र माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० है। उसने वि० सं० १६७७ (ई० स० १६२०) में सालिमगढ़ गांव के सीमा संबंधी झगड़े में अच्छी कारगुज़ारी दिखलाई थी। वह कई वर्ष तक हिसाब दफ़्तर का हाकिम और राजसभा का सदस्य रहा। वर्तमान
प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३६१ महारावतजी ने उसको नायब दीवान बनाया। फिर शाह चुन्नीलाल शराफ़ के अलग होने पर जब दीवान की जगह खाली हुई तो वह स्थानापन्न दीवान नियत हुआ और वि० सं० १९९६ (ई० स० १९३९) के प्रारंभ तक उक्त पद का कार्य करता रहा और उससे महारावत और वहां के निवासी संतुष्ट रहे। इस समय वह प्रतापगढ़ राज्य का नायब दीवान है और सुचारु रूप से अपना कार्य कर रहा है। खासगीवालों का घराना महारावत के गृह-विभाग (अन्तःपुर) का प्रबंध और निजी कार्य करनेवाले व्यक्ति इस राज्य में खासगीवाले कर्मचारी कहलाते हैं। इस पद का कार्य पूर्ण विश्वासपात्र व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं सौंपा जाता। उनके सुपुर्द राज्य के अन्य उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य भी रक्खे जाते हैं। इस खानदान के व्यक्ति भी हूंबड़ जाति के महाजन हैं और उनका अल्ल तलाटी है। इस वंश के शाह जड़ावचंद को महारावत सामंतसिंह ने वि० सं० १८७० (ई० स० १८१३) में अपना पूरा विश्वासपात्र समझ कर खासगी के महकमे में नियत किया। उसने समय-समय पर उक्त महारावत की अच्छी सेवा कर पूर्ण स्वामीभक्ति दिखलाई। मरहटों के उपद्रवों तथा अन्य कई झमेलों से देश की स्थिति संभलने नहीं पाई थी कि ऐसे समय में वि० सं० १८४० (ई० स० १८३३) में प्रतापगढ़ राज्य में दुर्भिक्ष हो गया। उस समय भी जड़ावचंद ने राज्य की अच्छी सेवा की, जिससे महारावत ने प्रसन्न होकर उसकी जागीर में वृद्धि की। उक्त महारावत के पिछले समय में उसका पौत्र दलपतसिंह डूंगरपुर में भी रहा करता था, जिससे राज्य में अधिक सुधार नहीं हो सकता था। इस- लिए महारावत सामंतसिंह का परलोकवास होने पर दलपतसिंह ने राजगद्दी पर बैठते ही जड़ावचंद को वि० सं० १९०० (ई० स० १८४३) में अपना मंत्री बनाया। उसने अपने स्वामी की इच्छानुसार शासन-कार्य योग्यता- पूर्वक चलाया, जिससे राज्य की आय बढ़ी, कई नये गांव बसे और
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व्यापार में भी उन्नति हुई। वह सिपाही-विद्रोह के समय तक अपने पद पर बना रहा और उसने अंग्रेज़-सरकार के प्रति उस कठिन समय में भी वफ़ादारी में अन्तर न आने दिया। वि० सं० १९१४ (ई० स० १८५७) में जड़ायचंद की मृत्यु होने पर उसका पुत्र शाह निहालचंद मंत्री हुआ, जिसने वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६) तक इस पद का कार्य किया और ग़दर के अवसर पर बागी सरदार क़ासिमखां आदि के मुकाबले के समय उसने सदैव महारावत के साथ रहकर अच्छा कार्य किया। निहालचंद के छोटे भाई कस्तूरचंद और कपूरचंद थे। वे खासगी का काम पूर्ववत् करते रहे। महारावत उदयसिंह के समय वि० सं० १९३३ (ई० स० १८७६) में वहां के काश्तकार इलाक़ा छोड़कर चले गये, तब महारावत ने अपने विश्वासपात्र सेवक कपूरचंद को काश्तकारों को समझा- कर पीछा लाने का हुक्म दिया। इसपर उसने अपने भतीजे नंदलाल- सहित गांवों में जा काश्तकारों को समझाकर पीछा आबाद किया। वि० सं० १९३६ (ई० स० १८७६) में उक्त महारावत के अन्तःपुर की ड्योढ़ी की निगरानी का सारा काम पूरे अख्तियार-सहित कपूरचंद को सौंपा गया और उसकी उत्तम सेवाओं के एवज़ में वि० सं० १९४५ (ई० स० १८८८) में उसकी जागीर का आधा खिराज माफ़ कर दिया गया। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८८६) में महारावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत हो गया। उस समय अरनोद के महाराज रघुनाथसिंह को राजगद्दी पर बिठलाने में शाह कपूरचंद ने पूर्ण यत्न किया। कपूरचंद का पुत्र अमृतलाल भी अन्तःपुर की ड्योढ़ी का प्रबंधकर्ता था और उसके सुपुर्द राज्य के मुहाफ़िज़ख़ाने एवं कारखानें जात की निगरानी का कार्य बहुत वर्षों तक रहा। कपूरचंद का तीसरा पुत्र जोधकरण, बी० ए० था। प्रतापगढ़ राज्य में वही सर्वप्रथम व्यक्ति था, जिसने अंग्रेज़ी में बी० ए० तक की उच्च परीक्षा अपने ही साहस से पास की। फिर वह महारावत रघुनाथसिंह का प्राइवेट सेक्रेटरी नियत हुआ। वि० सं० १९५६ (ई० स० १८६६) के भयंकर अकाल
: प्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३६३ के समय वह “अकाल सहायक समिति” का सेक्रेटरी बनाया गया। महाराजकुमार मानसिंह के अजमेर में विद्याध्ययन करते समय वह उसका शिक्षक और गार्जियन नियत हुआ। फिर वह मैजिस्ट्रेट और दीवानी अदालत का हाकिम बनाया गया और उसके साथ ही राज्य की तरफ़ से पोलि- टिकल एजेंसी के संबंध का महक्माख़ास का अंग्रेज़ी कार्य भी वह करता रहा। वि० सं० १६६१ वैशाख वदि ५ ( ई० स० १६०४ ता० ५ अप्रेल ) को २७ वर्ष की आयु में उसकी प्लेग की बीमारी से मृत्यु हुई। जोधकरण का छोटा भाई मुंशी फ़तहलाल है, जिसने अंग्रेज़ी भाषा में बी० ए० तक की शिक्षा प्राप्त की है। वह प्रारंभ में प्रतापगढ़ के स्कूल का हेड मास्टर बनाया गया। उसके उत्तम प्रबंध से उक्त स्कूल की अच्छी उन्नति हुई और उसके कार्यकाल में ही वहां मैट्रिक तक की शिक्षा दी जाने की व्यवस्था हो गई। वह महाराजकुमार मानसिंह का बाल्यावस्था का साथी और कृपापात्र एवं वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी का शिक्षक भी रहा है। राज्य के भिन्न-भिन्न ऊंचे पदों पर समय-समय पर उसकी नियुक्ति होने से उसका अनुभव अधिकाधिक बढ़ता रहा, जिससे वह कई सीमा संबंधी मुकदमों और कान्फ़्रेंसों में प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया, जहां उसने योग्यतापूर्वक कार्य किया। प्रतापगढ़ राज्य में अफ़ीम की खेती बंद करने से जो हानि होती है, उसने उसका स्पष्ट और सप्रमाण विवरण पेश किया, जो राज्य के लिए हितकर सिद्ध हुआ। वह इस समय सुपरिन्टेन्डेन्ट एग्रीकल्चर और बाग़ तथा ख़ज़ाने का अफ़सर है। भांचावत भांचावत भी हुंबड़ जाति के वैश्य हैं। इस वंश के शाह भूरा ने बोरी-रीछड़ी के सीमा संबंधी मुक़दमे में प्रतापगढ़ राज्य की पूरी सेवा की थी। फिर मन्नालाल भांचावत महारावत रघुनाथसिंह के समय वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०२ ) में प्रतापगढ़ राज्य का मंत्री बनाया गया। उसके मंत्रित्वकाल में कैप्टेन ए० टी० होम ने प्रतापगढ़ राज्य में पैमाइश का कार्य कराया, जिसमें उसकी सेवा अच्छी रही। बांसवाड़ा राज्य के ५०
३६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भील इस राज्य में बड़ा उपद्रव करते थे, जिनका अंग्रेज़ सरकार दमन करना चाहती थी। ई० स० १६०४ (वि० सं० १६६०) में प्रतापगढ़ राज्य से उन भीलों को दबाने के लिए सेना रवाना हुई, उस समय पन्नालाल की कार्यवाही उचित मानी गई और मेवाड़ के तत्कालीन रेज़िडेंट मेजर ए० एफ़० पिन्हे ने उसके कार्य की सराहना की। उसने प्रतापगढ़ राज्य और मेवाड़ तथा बांसवाड़ा राज्यों के बीच होनेवाले सीमा संबंधी झगड़ों में प्रत्येक बार पूरा परिश्रम किया, जिससे महारावत भी उस से संतुष्ट रहा। उसका पुत्र चांदमल भांचावत, बी० ए०, एल-एल० बी० म्युनि- सिपिल कमेटी का सेक्रेटरी है। आपा का वंश प्रतापगढ़ राज्य का मरहटों के साथ संबंध होने पर पत्र-व्यवहार महाराष्ट्र लिपि और भाषा में होता था। इसके लिए महारावत सालिमसिंह के राज्य-काल में महाराष्ट्र जाति का ब्राह्मण सखाराम नियत किया गया, जो होल्कर के दरबार में लिखा-पढ़ी का कार्य करता था। वि० सं० १८४५ (ई० स० १८१८) में जब अंग्रेज़ सरकार तथा प्रतापगढ़ राज्य के बीच संधि हुई, उस समय पंडित रामचंद्र भाऊ (सखाराम का वंशधर) महारावत सामंतसिंह की ओर से प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया। रामचंद्र की अच्छी सेवाओं से प्रसन्न होकर उक्त महारावत ने वि० सं० १८७६ आषाढ़ सुदि ३ (ई० स० १८१६ ता० २५ जून) शुक्रवार को उसे जागीर प्रदान की एवं उक्त महारावत के समय वहां की टकसाल का कार्य भी उसके सुपुर्द किया गया। रामचंद्र का पुत्र नत्थोपंत आपा हुआ। महारावत दलपतसिंह ने, जब वह डूंगरपुर का युवराज था, उसको वहां पर भी जागीर दी और प्रतापगढ़ का स्वामी होने पर उस (दलपतसिंह) ने उसकी जागीर बढ़ाई। वह प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से पोलिटिकल अफ़सरों के पास वकील का कार्य करता रहा। नत्थोपंत आपा का पुत्र जगन्नाथ, टकसाल का अफ़- सर रहा। जगन्नाथ का पुत्र लालजी और लालजी के दो पुत्र रामचंद्र और लक्ष्मण हुए। लक्ष्मण का पुत्र अमृतराव इस समय विद्यमान है।
परिशिष्ट संख्या १ गुहिल से लगाकर प्रतापगढ़ के संस्थापक रावत क्षेमकर्ण तक मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की वंशावली १ गुहिल २ भोज ३ महेन्द्र ४ नाग (नागादित्य) ५ शील (शीलादित्य) — वि० सं० ७०३। ६ अपराजित — वि० सं० ७१८। ७ महेन्द्र (दूसरा) ८ कालभोज (बापा) — वि० सं० ७६१-८१०। ९ खुम्माण — वि० सं० ८१०। १० मत्तट ११ भर्तृभट (भर्तृपट) १२ सिंह १३ खुम्माण (दूसरा) १४ महायक १५ खुम्माण (तीसरा) १६ भर्तृभट (भर्तृभट्ट, दूसरा) — वि० सं० ९६६-१०००। १७ अल्लट — वि० सं० १००८, १०१०। १८ नरवाहन — वि० सं० १०२८। १९ शालिवाहन २० शक्तिकुमार — वि० सं० १०३४। २१ अंबाप्रसाद २२ शुचिवर्मा २३ नरवर्मा २४ कीर्तिवर्मा २५ योगराज २६ बैरट २७ हंसपाल २८ वैरिसिंह २९ विजयसिंह — वि० सं० ११६४, ११७३। ३० अरिसिंह ३१ चौड़सिंह
३६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ३२ विक्रमसिंह ३३ रणसिंह ( कर्णसिंह )। | मेवाड़ की रावल शाखा सीसोदे की राणा शाखा ३४ क्षेमसिंह १ माहप २ राहप ३५ सामंतसिंह ३६ कुमारसिंह ३ नरपति [नोट: पहले मेवाड़ का स्वामी हुआ फिर वागड़ की तरफ जाकर डूंगरपुर-बांसवाड़ा राज्य की स्थापना की।] ३७ मथनसिंह ४ दिनकरण ३८ पद्मसिंह ५ जसकरण ३९ जैत्रसिंह वि० सं० १२७०-१३०६ ६ नागपाल ४० तेजसिंह वि० सं० १३१७-२४ ७ पूर्णपाल ४१ समरसिंह वि० सं० १३३०-५८ ८ पृथ्वीमल्ल ४२ रत्नसिंह वि० सं० १३५६-६० ९ भुवनसिंह अलाउद्दीन ख़िलजी का चित्तोड़ पर आक्रमण १० भीमासिंह होने पर वि० सं० १३६० में परलोक ११ जयसिंह सिधारा और चित्तोड़ पर मुसलमानों का अधिकार हुआ। १२ लखमणसीसिंह | वि. सं. १३६० अरिसिंह १३ अजयसिंह [नोट: इसके वंशजों ने मेवाड़ से बाहर जाकर दक्षिण में राज्य-स्थापना की।] ४३ हमीरसह वि० सं० १३८२ (?)-१४२१ (?) | मुसलमानों से चित्तोड़ लिया ४४ क्षेत्रसिंह ( खेता ) वि० सं० १४२१ (?)-१४३६ ४५ लक्षसिंह ( लाखा ) वि० सं० १४३६-१४७८ (?) ४६ मोकल वि० सं० १४७८ (?)-१४९० ४७ कुंभकर्ण ( कुंभा ) वि० सं० १४९०-१५२५ मेवाड़ का स्वामी क्षेमकर्ण ( खींवा ) प्रतापगढ़वालों का पूर्वज
परिशिष्ट संख्या २ महारावत क्षेमकर्ण से वर्तमान समय तक प्रतापगढ़ के राजाओं की वंशावली नाम | ख्यातों में उल्लिखित राज्याभिषेक का संवत् (बड़वा की ख्यात से) | ख्यातों में उल्लिखित राज्याभिषेक का संवत् (अन्य ख्यातों आदि से) | शिलालेखों आदि से ज्ञात संवत् | ग्रंथकर्ता के मतानुसार राज्याभिषेक का संवत् महारावत क्षेमकर्ण | ... | ... | ... | ... ,, सूरजमल | १५३० | १५३० | ... | १५३० के आसपास ,, बाघसिंह | १५८७ | १५८४ | ... | १५८७ ,, रायसिंह | १५९२ | १५९१ | ... | १५९२ ,, विक्रमसिंह (बीका) | १६०६ | १६०६ | ... | १६०६ ,, तेजसिंह | १६२० | १६३३ | १६२१, १६३५ | १६२० ,, भानुसिंह (भाना) | १६४८ | १६५० | १६५१, १६५२ | १६५० ,, सिंहा | १६६० | १६६० | १६७६, १६८४ | १६५४ ,, जसवन्तसिंह | १६८५ | १६८५ | ... | १६८५ ,, हरिसिंह | १६९० | १६९० | १६९६-१७२४ | १६८५ ,, प्रतापसिंह | १७३० | १७३० | १७३१-१७६४ | १७३० ,, पृथ्वीसिंह | १७६४ | १७६४ | १७६५-१७७५ | १७६५ ,, संग्रामसिंह | १७७६ | १७७५ | १७७६ | १७७५ ,, उम्मेदसिंह | १७७७ | १७७६ | १७७७ | १७७६ ,, गोपालसिंह | १७७६ | १७७६ | १७७८-१८११ | १७७८ ,, सालिमसिंह | १८१४ | १८१४ | १८१३-१८६६ | १८१३ ,, सामन्तसिंह | १८३१ | १८३१ | १८३८-१८४२ | १८३१ ,, दलपतसिंह | १६०० | १६०० | ... | १६०० ,, उदयसिंह | १६२० | १६२० | ... | १६२० ,, रघुनाथसिंह | १६४६ | १६४६ | ... | १६४६ ,, रामसिंहजी (विद्यमान) | ... | ... | ... | १६८५
परिशिष्ट संख्या ३ प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास का कालक्रम ++++++++ महारावत क्षेमकर्ण वि० सं० ई० स० ( १४६४ )¹ ( १४३७ ) क्षेमकर्ण का सादड़ी पर अधिकार करना । ( १५३० ) ( १४७३ ) क्षेमकर्ण की मृत्यु । महारावत सूरजमल ( १५३० ) ( १४७३ ) सूरजमल की गद्दीनशीनी । १५६१ १५०४ सूरजमल के संबंध में चारणी की भविष्यवाणी । ( १५६३ ) ( १५०६ ) मालवा के सुलतान नासिरशाह के पास सहायतार्थ जाना । ( १५६४ ) ( १५०७ ) सूरजमल और सारंगदेव का मालवा की सेना के साथ जाकर महाराणा रायमल से युद्ध करना । ( १५६५ ) ( १५०८ ) सूरजमल का मेवाड़ छोड़ कांठल में आबाद होना । ( १५८७ ) ( १५३० ) सूरजमल की मृत्यु । महारावत वाघसिंह ( १५८७ ) ( १५३० ) वाघसिंह की गद्दीनशीनी । १५६२ १५३५ बहादुरशाह की चित्तोड़ की चढ़ाई के अवसर पर वाघसिंह का मारा जाना । ( १ ) ऊपर कोष्ठकों में दिये हुए संवत् अनुमानिक हैं, निश्चित नहीं ।
परिशिष्ट ३६६ महारावत रायसिंह वि० सं० ई० स० १५६२ १५३५ रायसिंह की गद्दीनशीनी । ( १५६३ ) ( १५३६ ) उदयसिंह को लेकर धाय पन्ना का देवलिया जाना । ( १६०६ ) ( १५५२ ) रायसिंह का देहांत । महारावत विक्रमसिंह (वीका) ( १६०६ ) ( १५५२ ) विक्रमसिंह की गद्दीनशीनी । ( १६१० ) ( १५५३ ) विक्रमसिंह का मेवाड़ का परित्याग करना । १६१३ १५५७ विक्रमसिंह का कुंवर तेजसिंह को महाराणा उदयसिंह के साथ हाजीखां की सहायतार्थ भेजना । ( १६१७ ) ( १५६० ) विक्रमसिंह का देवलिया को राजधानी बनाना । ( १६१९ ) ( १५६२ ) विक्रमसिंह का बांसवाड़ा के स्वामी प्रतापसिंह की सहायतार्थ महारावल आसकर्ण (डूंगरपुर) से लड़ना । ( १६२० ) ( १५६३ ) विक्रमसिंह का देहांत । महारावत तेजसिंह १६२० ( १५६३ ) तेजसिंह की गद्दीनशीनी । १६२१ १५६४ दमाखेड़ी गांव का दानपत्र । १६३३ १५७६ हल्दीघाटी के युद्ध में महारावत का कांधल को महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) की सहायतार्थ भेजना । १६५० १५९३ तेजसिंह का देहांत ।
४०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महारावत भानुसिंह (भाना) वि० सं० ई० स० १६५० १५९३ भानुसिंह की गद्दीनशीनी । १६५१ १५९४ सेमली गांव का ताम्रपत्र । १६५२ १५९५ अमलावद गांव का ताम्रपत्र । १६५४ १५९७ भानुसिंह का चीताखेड़े के पास शक्तावत जोधसिंह से लड़कर मारा जाना । महारावत सिंहा १६५४ १५९७ सिंहा की गद्दीनशीनी । १६७२ १६१५ जहांगीर का महाराणा अमरसिंह (प्रथम) के कुंवर कर्णसिंह को वसाड़ और अरगोद का फ़रमान देना । (१६८३) (१६२६) महावतखां का देवलिया में जाकर रहना । १६८४ १६२७ गयासपुर की बावड़ी की प्रशस्ति । (१६८५) (१६२८) सिंहा का देहांत । महारावत जसवन्तसिंह (१६८५) (१६२८) जसवन्तसिंह की गद्दीनशीनी । १६८५ १६२८ महाराणा से छेड़-छाड़ न करने के लिए शाहजहां का जांनिसारखां के नाम फ़रमान भेजना । (१६८५) (१६२८) महारावत का कुंवर महासिंह-सहित महाराणा जगतसिंह (प्रथम) की सेना से लड़कर मारा जाना।
परिशिष्ट ४०१ महारावत हरिसिंह वि० सं० ई० स० (१६८५) (१६२८) हरिसिंह की गद्दीनशीनी । (१६८५) (१६२८) जोधसिंह (धमोतर) का हरिसिंह को दिल्ली ले जाना । (१६८५) (१६२८) महाराणा जगतसिंह (प्रथम) का सेना भेज देवलिया बरबाद कर वहां अधिकार करना । (१६६०) (१६३३) बादशाह का फ़ौज भेज देवलिया पर महारावत का अधिकार कराना । (१६६०) (१६३३) महाराणा का धरियावद का परगना खालसा करना । १६६६ १६४२ मचलाना गांव का ताम्रपत्र । १७०१ १६४४ महारावत का टिकरा गांव दान करना । १७०५ १६४८ देवलिया के गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति और कीटखेड़ी गांव का ताम्रपत्र । १७०५ १६४८ महारावत की माता का गोवर्द्धननाथ के मन्दिर की प्रतिष्ठा के समय तुलादान करना । १७०५ १६४८ शाहजहां का महारावत को खिलअत आदि देना । १७०६ १६५२ शाहजहां का महारावत को बुलाना । १७०६ १६५३ महारावत को कोटड़ी का परगना मिलना । १७१० १६५४ हरिसिंह की शाहज़ादे मुराद के साथ नियुक्ति । १७११ १६५४ शाहज़ादे मुरादबख़्श के पास उपस्थित होना । १७११ १६५४ शाहज़ादे मुराद का महारावत को उज्जैन से हटाकर अहमदाबाद में नियत करना । १७१४ १६५७ शाहज़ादे दाराशिकोह का निशान भेजना । १७१४ १६५७ शाहज़ादे मुरादबख़्श का निशान भेजना । १७१५ १६५८ शाहज़ादे दाराशिकोह का मुरादबख़्श को बंदी करने के लिए निशान भेजना । ५१
: ४०२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वि० सं० ई० स० १७१५ १६५८ मुरादबख्श का महारावत को परगना सुखेरी देने का निशान और खिलअत भेजना । १७१५ १६५८ बादशाह औरंगज़ेब का महाराणा राजसिंह (प्रथम) के नाम बसाड़, गयासपुर आदि का फ़रमान करना । १७१५ १६५६ दाराशिकोह का हरिसिंह को अपने पास उपस्थित होने के लिए निशान भेजना । १७१६ १६५६ महाराणा राजसिंह (प्रथम) का देवलिया पर सेना भेजना । १७१६ १६५६ महारावत का बादशाह औरंगज़ेब के पास जाना । १७१६ १६५६ महारावत की माता का अपने पौत्र प्रतापसिंह को महाराणा के पास भेजना । १७१६ १६५६ बसाड़ के दौरे के समय हरिसिंह का महाराणा राजसिंह (प्रथम) की सेवा में उपस्थित होना । (१७१८) (१६६१) महारावत का बादशाह के पास जाकर गयासपुर तथा बसाड़ के परगने पुनः प्राप्त करना । १७१६ १६६२ कुंवर प्रतापसिंह तथा अमरसिंह को शाही सेवा में भिजवाने के संबंध में अर्ज़ी भेजना । १७२१ १६६४ बादशाह का महारावत को मालवे में रहने की आज्ञा देना । १७३० १६७३ महारावत का देहांत । महारावत प्रतापसिंह १७३० १६७३ महारावत की गद्दीनशीनी । १७३१ १६७४ बादशाह औरंगज़ेब का महारावत को मनसब देना ।
परिशिष्ट ४०३ वि० सं० ई० स० १७३१ १६७५ भोगीदास की बावड़ी का शिलालेख । ( १७३२) ( १६७५ ) महाराणा और महारावत की तक़रार की जांच के लिए शेख़ इनायतुल्ला का भेजा जाना । १७३३ १६७७ पाटण्ये गांव का संस्कृत दानपत्र । १७३६ १६७६ बादशाह का मेवाड़ की चढ़ाई के समय महारावत को मंदसोर में हाज़िर होने के लिए फ़रमान भेजना। १७३७ १६८० शाहज़ादे मुअज्जम का महारावत को देवारी के मुक़ाम पर बुलवाना । १७३८ १६८१ शाहज़ादे आज़म का महारावत को अपने पास उपस्थित होने के लिए लिखना । १७५३ १६६६ महाराजा अजीतसिंह का प्रतापगढ़ में विवाह होना। १७५५ १६६६ महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्बा बसाना । ( १७५६) ( १६६६) महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) का महारावत से छेड़छाड़ करना । १७६४ १७०८ बादशाह बहादुरशाह का महारावत को बुलाना । १७६५ १७०८ महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह का उदयपुर जाते समय देवलिया में ठहरना । ( १७६५) ( १७०८ ) महारावत का देहान्त । महारावत पृथ्वीसिंह ( १७६५ ) ( १७०८ ) महारावत की गद्दीनशीनी । १७६६ १७०६ महाराजा अजीतसिंह का महारावत की पुत्री से विवाह होना । १७६६ १७०६ बादशाह बहादुरशाह के पास से बसाइ परगने का फ़रमान आनां ।
४०४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
वि० सं० ई० स०
१७६८ १७११ महारावत के मनसब में वृद्धि होना ।
१७६६ १७१२ वज़ीर आसफ़ुद्दौला का वसाड़ के परगने की आय
महारावत को देने के लिए आज्ञापत्र भेजना ।
१७७१ १७१४ बादशाह होने पर फ़र्रुख़सियर का महारावत के
नाम फ़रमान भेजना ।
( १७७१ ) ( १७१४ ) महारावत को 'रावत राव' का खिताब मिलना ।
१७७१ १७१४ महारावत का शाही इलाक़े में उत्पात करना ।
१७७३ १७१६ महारावत का कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर के
महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) की सेवा में भेजना ।
१७७३ १७१६ सवाई जयसिंह और राव बुधसिंह (बूंदी) का
महारावत के विरुद्ध शिकायत करना ।
१७७३ १७१६ महारावत पर लगाये गये अभियोगों की जांच के
लिए बादशाह का कुतुबुलमुल्क को आज्ञा देना ।
१७७४ १७१७ महाराणा संग्रामसिंह के मंत्री बिहारीदास का
रामपुरा से लौटते समय देवलिया में ठहरना ।
१७७४ १७१८ महारावत का वर्ष भर में ४४ दिन तेल निकालने का
निषेध करना ।
१७७४ १७१८ देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति ।
१७७४ १७१८ महारावत का पर्यूषणों, अष्टमी, चतुर्दशी और
रविवार को शराब की भट्टी बंद रखने की आज्ञा
देना ।
( १७७५ ) ( १७१८ ) कुंवर पहाड़सिंह की मृत्यु ।
( १७७५ ) ( १७१८ ) महारावत का देहांत