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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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३६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भील इस राज्य में बड़ा उपद्रव करते थे, जिनका अंग्रेज़ सरकार दमन करना चाहती थी। ई० स० १६०४ (वि० सं० १६६०) में प्रतापगढ़ राज्य से उन भीलों को दबाने के लिए सेना रवाना हुई, उस समय पन्नालाल की कार्यवाही उचित मानी गई और मेवाड़ के तत्कालीन रेज़िडेंट मेजर ए० एफ़० पिन्हे ने उसके कार्य की सराहना की। उसने प्रतापगढ़ राज्य और मेवाड़ तथा बांसवाड़ा राज्यों के बीच होनेवाले सीमा संबंधी झगड़ों में प्रत्येक बार पूरा परिश्रम किया, जिससे महारावत भी उस से संतुष्ट रहा। उसका पुत्र चांदमल भांचावत, बी० ए०, एल-एल० बी० म्युनि- सिपिल कमेटी का सेक्रेटरी है। आपा का वंश प्रतापगढ़ राज्य का मरहटों के साथ संबंध होने पर पत्र-व्यवहार महाराष्ट्र लिपि और भाषा में होता था। इसके लिए महारावत सालिमसिंह के राज्य-काल में महाराष्ट्र जाति का ब्राह्मण सखाराम नियत किया गया, जो होल्कर के दरबार में लिखा-पढ़ी का कार्य करता था। वि० सं० १८४५ (ई० स० १८१८) में जब अंग्रेज़ सरकार तथा प्रतापगढ़ राज्य के बीच संधि हुई, उस समय पंडित रामचंद्र भाऊ (सखाराम का वंशधर) महारावत सामंतसिंह की ओर से प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया। रामचंद्र की अच्छी सेवाओं से प्रसन्न होकर उक्त महारावत ने वि० सं० १८७६ आषाढ़ सुदि ३ (ई० स० १८१६ ता० २५ जून) शुक्रवार को उसे जागीर प्रदान की एवं उक्त महारावत के समय वहां की टकसाल का कार्य भी उसके सुपुर्द किया गया। रामचंद्र का पुत्र नत्थोपंत आपा हुआ। महारावत दलपतसिंह ने, जब वह डूंगरपुर का युवराज था, उसको वहां पर भी जागीर दी और प्रतापगढ़ का स्वामी होने पर उस (दलपतसिंह) ने उसकी जागीर बढ़ाई। वह प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से पोलिटिकल अफ़सरों के पास वकील का कार्य करता रहा। नत्थोपंत आपा का पुत्र जगन्नाथ, टकसाल का अफ़- सर रहा। जगन्नाथ का पुत्र लालजी और लालजी के दो पुत्र रामचंद्र और लक्ष्मण हुए। लक्ष्मण का पुत्र अमृतराव इस समय विद्यमान है।