राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसिद्ध और प्राचीन घराने ३८३ वर्षावत हूंबड़ों की वर्षावंत शाखा का मूल पुरुष वर्षाशाह, महारावत हरिसिंह के समय उसका मन्त्री था, ऐसा उस समय के शिलालेखों, दान- शाह वर्षा और उसके वंशज पत्रों एवं पुस्तकों से पाया जाता है। प्रसिद्ध है कि वर्षा ने उक्त महारावत की आज्ञानुसार बागड़ के सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) क़स्बे से लगभग एक सहस्र हूंबड़-कुटुम्बों को लाकर कांठल में आबाद किया था। धार्मिक भावना से प्रेरित होकर उस (वर्षाशाह) ने देवलिया में दिगम्बर सम्प्रदाय का जैन मंदिर बनवाना आरम्भ किया था, जो पीछे से पूर्ण हुआ और बड़ा मन्दिर कहलाता है। उपर्युक्त मन्दिर की प्रतिष्ठा वर्षा के पुत्र वर्द्धमान और पौत्र दयाल ने वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) को की। वर्द्धमान और उसका लघु भ्राता उदयभान महारावत प्रतापसिंह के समय में भी मंत्री का काम करते थे, जिनका उल्लेख उक्त महारावत के वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ (ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी) के पाटणया गांव के दानपत्र और उसके समय बने हुए "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य में भी है। उदयभान थोड़े ही समय तक मंत्री रहा, परंतु वर्द्धमान महारावत पृथ्वीसिंह के राज्य समय तक प्रधान मंत्री के पद पर विद्यमान था। पाडलियों का घराना यह घराना भी हूंबड़ जाति का है। इस वंश का पाडलिया जीवराज सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) का निवासी था। वह भी अन्य हूंबड़ों के साथ बागड़ से जाकर देवलिया में आबाद पाडलिया चंद्रभाण और सुंदर हुआ। उनमें प्रमुख होने से आगे जाकर प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से उसके वंशधर 'नगरसेठ' की पदवी से सम्मानित हुए। पाडलिया चंद्रभाण महारावत गोपालसिंह के समय मंत्री रहा था। उसने दस सहस्र रुपये व्यय कर देवलिया