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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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· ३८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

और खास सेवाओं को दृष्टि में रखकर किया जाता था । यद्यपि समय के परिवर्त्तन से अब देशी राज्यों में यह प्रथा मिटती जाती है और प्रतापगढ़ में स्वर्गीय महारावत रघुनाथसिंह के राज्यकाल से ही मंत्री-वर्ग में बाहरी आदमियों को स्थान मिलने लगा है तथापि किसी न किसी अंश में दायित्वपूर्ण पदों पर वंशपरंपरा के अनुसार वहां के निवासियों की ही नियुक्ति होती है । इस राज्य के पहले के प्रायः सब मंत्री दिगंबर सम्प्रदाय के हूंबड़ जाति के व्यक्ति हुए हैं । बागड़ के पूर्व-निवासी होने से साधारण बोलचाल में वे भी बागड़िया हूंबड़ कहलाते हैं । व्यवसाय-प्रधान जाति होने से हूंबड़ों की गणना वणिकों में होती है । पहले उनका बागड़ ( डूंगरपुर और बांसवाड़ा ) राज्य में निवास था और वे बहुत सम्पन्न थे । महारावत विक्रमसिंह के कांठल जाकर वहां अपना स्थायी निवास बनाने के बाद देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की आबादी बढ़ने लगी । फिर उक्त महारावत के क्रमानुयायियों ने बागड़िया वैश्यों को कई प्रकार की रियायतें देकर कांठल बुलवाकर वहां आबाद किया । धीरे-धीरे उन्होंने वहां व्यापार बढ़ाकर बहुत कुछ उन्नति की । उनमें से कुछ ने अपनी कारगुज़ारी और सदा- चरण से राज्य के विश्वसनीय पदों को प्राप्त किया । अमात्य-पद और नरेश के अन्तःपुर के प्रबंध के अतिरिक्त राज्य का प्राचीन दफ़्तर भी हूंबड़ जाति के व्यक्तियों के अधिकार में ही रहा । वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी में, जब कि कई पुराने राज्य बिगड़े, प्रतापगढ़ राज्य का अक्षुण्ण रहना वहां के मंत्री और राजकर्मचारियों की योग्यता का ही परिणाम है । यही नहीं उन्होंने इस राज्य को सुसमृद्ध बनाने का भी समय-समय पर प्रयत्न किया और लोकोपकार की भावनाओं से प्रेरित होकर देवालय, बाग, बावड़ियां आदि भी बनवाईं ।