राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
श्री भुवनेश्वरी देवी जनाना हास्पिटल, प्रतापगढ़
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महारावत रामसिंहजी ३५३ की गई है। कई वर्षों से किसानों पर माल हासिल का ऋण चढ़ा हुआ था, जिसे चुकाने में वे असमर्थ थे। वि० सं० १६६४ (ई०स० १६३७) में इन्होंने सब पुराना बक़ाया माफ़ कर दिया। लोगों को नागरिकता के अधिकार देने के लिए प्रतापगढ़ की म्युनिसिपेलिटी में चुने हुए मेंबर लेने की भी महा- रावत के राज्य-काल में व्यवस्था हो गई है। बेगार लेना इन्होंने अपने राज्य में बंद कर दिया है। गमनागमन की कठिनाइयों को मिटाने के लिए महा- रावतजी ने अपने राज्य में मोटरें चलने लायक़ मार्ग बनवा दिये हैं, जिससे ग्रामीण जनता को अकाल के समय खाद्य पदार्थ सुगमतापूर्वक मिलने का साधन हो गया है। व्यापार की वृद्धि के लिए इन्होंने अपने राज्य से वागड़ में जानेवाले माल का दाण (चुंगी, कर) लौटाने की आज्ञा दे दी है। महा- रावत को उद्योग और धंधों की वृद्धि करने का चाव है। प्रतापगढ़ में जिनिंग फ़ैक्टरी स्थापित हो गई है और बिजली की रोशनी पहुंचाने का भी आयोजन हो गया है। न्याय-विभाग में राजसभा के अतिरिक्त हाई कोर्ट और बना दिया गया है, जिसमें सेशन जज के ऊपर के तमाम मुक़दमे सुने जाते हैं और नीचे की अदालतों की अपील भी वहीं होती है। राज्य के पुराने मुलाज़िमों को पेंशन देने का नियम न था, परंतु महारावतजी ने उनकी सेवाओं आदि को देख योग्यता के अनुसार पेंशन देने का भी सिलसिला जारी किया है। शिक्षा-विभाग में शिक्षकों के लिए प्रॉविडेन्ड फंड क़ायम कर दिया गया है। इन्होंने नवरात्रि पर होनेवाली जीव-हिंसा और होली के अवसर पर होनेवाले अहेड़े के शिकार को रोककर अहिंसा-प्रेम का परिचय दिया है। हिंदी भाषा के प्रति प्रेम होने से महारावत ने राज-भाषा हिंदी ही रक्खी है। अंग्रेज़ सरकार के साथ महारावत का अच्छा व्यवहार है। इस राज्य की ओर से अंग्रेज़-सरकार को खिराज की जो रक़म दी जाती थी, वह खिराज में कमी होना अधिक होने से उक्त सरकार ने उसमें पांच प्रति- शत कमी कर दी है और कैश कंट्रीब्यूशन के ४५
३५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
नाम से २७५०० रुपये कलदार प्रतिवर्ष ई० स० १६३७ से लेना स्थिर किया है। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में चमोतर में समस्त भारत- वर्षीय जैन दिगम्बर समुदाय का एक वृहत् सम्मेलन हुआ, जिसमें लग- [पार्श्व-टिप्पणी: दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदन पत्र मिलना] भग बीस सहस्र आदमी एकत्र हुए। उस समय महारावतजी ने उक्त सम्मेलन में भाग लेकर अहिंसा के कार्यों को प्रोत्साहन दिया। इनके उत्तम व्यवहार और उदार विचारों से प्रेरित होकर उक्त सम्मेलन में इनका दिग- म्बर समुदाय की तरफ़ से बड़ा स्वागत किया गया और उन्होंने स्वर्ण के चौखटे में जड़ा हुआ अभिनंदन पत्र भेंट कर इनकी प्रजा-प्रियता पर हर्ष प्रकट करते हुए राजभक्ति प्रकट की। इसपर महारावत ने अपनी प्रजा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए फाल्गुन सुदि ८ और १४ को अपने राज्य में जीव-हिंसा बंद रखने की आज्ञा निकाल दी है। इनके मित्रतापूर्ण व्यवहार और अंग्रेज़-सरकार के प्रति उत्तम आचरण की पोलिटिकल अफ़सरों ने समय-समय पर प्रशंसा की है। [पार्श्व-टिप्पणी: सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को ख़िताब मिलना] सम्राट् जॉर्ज षष्ठ ने वि०सं० १६६४ (ई०स० १६३८) में नवीन वर्ष के उपाधिवितरणोत्सव पर इनको के० सी० एस० आई० (नाइट कमांडर ऑव् दि स्टार ऑव् इंडिया) का उच्च ख़िताब दिया। इसकी सूचना प्राप्त होने पर वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में ये दिल्ली गये, जहां भारत के वाइसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इनको उक्त ख़िताब के तमग़े से विभूषित किया। प्रधान मंत्री एफ़० सी० केवेन्टरी के पद-त्याग करने पर इन्होंने राव साहब शाह चुन्नीलाल एम० शराफ़ को वि० सं० १६६० (ई० स० [पार्श्व-टिप्पणी: मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना] १६३३) में दीवान के पद पर नियत किया था। उसके पृथक् होने पर इन्होंने अपने पुश्तैनी कर्मचारी शाह माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० से अस्थायी रूप से लगभग दो वर्ष तक यह कार्य लिया।
महारावत रामसिंहजी - ३५५
उसकी कार्यशैली और सरलता से वहां के निवासी संतुष्ट रहे । वि० सं० १६६६ ( ई० स० १६४० ) से इस पद पर राजा त्रिभुवनदास, एम० ए० नियत किया गया है, जो अनुभवी, कार्यकुशल तथा कर्तव्यपरायण व्यक्ति है और गुजरात की तरफ़ की देशी रियासतों में ऐसे दायित्वपूर्ण पदों पर काम कर चुका है । महारावत सर रामसिंहजी के तीन विवाह हुए हैं। उनमें से ज्येष्ठ शेखावत महाराणी सीकर के रावराजा माधवसिंह की पुत्री थी । उक्त विवाह और संतति महाराणी के उदर से महाराजकुमारी देवेन्द्रकुंवरी का वि० सं० १६८१ फाल्गुन वदि ८ ( ई० स० १६२५ ता० १६ फ़रवरी ) को जन्म हुआ और उसके पश्चात् क्रमशः उसके तीन कुंवरियां और उत्पन्न हुईं; किन्तु वे तीनों ही कालकवलित हो गईं तथा उक्त महाराणी का भी वि० सं० १६८७ पौष सुदि १४ ( ई० स० १६३० ता० १६ दिसम्बर) को देहांत हो गया । इसपर महारावतजी का द्वितीय विवाह डुमरांव ( बिहार ) के महाराजा सर केशवप्रसादसिंह, सी० वी० ई० की राजकुमारी मेघराजकुंवरी से वि० सं० १६८६ चैत्र सुदि १५ ( ई० स० १६३२ ता० २० अप्रेल ) को हुआ, जिसके उदर से महाराजकुमारी इंद्र- कुंवरी का वि० सं० १६६० वैशाख वदि ७ (ई० स० १६३३ ता० १६ अप्रेल), उर्मिलाकुंवरी का वि० सं० १६६४ श्रावण वदि १३ ( ई० स० १६३७ ता० ४ अगस्त ) और कुसुमकुंवरी एवं कुमुदकुंवरी दोनों का वि० सं० १६६६ प्रथम श्रावण सुदि १ ( ई० स० १६३६ ता० १७ जुलाई ) सोमवार को जन्म हुआ है । उपर्युक्त दोनों विवाहों से एक भी राजकुमार का जन्म न होने के कारण महारावतजी ने अपना तीसरा विवाह काठियावाड़ के अन्तर्गत ध्रांगधरा के मेजर महाराजा सर घनश्यामसिंहजी, जी० सी० आई० ई०, के० सी० एस० आई० की पुत्री महेंद्रकुंवरी से वि० सं० १६६१ द्वितीय वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६३४ ता० १६ मई) को किया, जिससे भी प्रथम एक राजकुमारी यशवंतकुंवरी का वि० सं० १६६४ फाल्गुन वदि १० (ई० स० १६३८ ता० २४ फ़रवरी ) को जन्म हुआ ।
३५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस प्रकार महारावत के अन्तःपुर में निरन्तर राजकुमारियां ही उत्पन्न होने से वहां की प्रजा चिंतित थी; किन्तु ईश्वर की कृपा से वि० सं० १९९६ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १९४० ता० १७ मार्च) को महारावत की ध्रांगधरावाली तृतीय महाराणी के उदर से महाराजकुमार का जन्म हुआ, जिसका समाचार पाते ही राज्य के हितचिन्तकों का चित्त प्रफुल्लित हो गया । महारावत ने इस समाचार के मिलने पर समयोचित उदारताएं प्रकट कीं । प्रतापगढ़ के समस्त ब्राह्मणों को राज्य की तरफ़ से भोजन कराया गया और विजयराघवजी आदि के मन्दिरों में अपनी तरफ़ से भेंट-पूजा कराने के उपरान्त राज्य के समग्र कर्मचारियों को एक मास का वेतन पुरस्कार में प्रदान किया गया । महारावत सर रामसिंहजी उदार-प्रकृति और नये विचारों के नरेश हैं । स्वभाव इनका सरल है। दयालुता के साथ विनय-शीलता की मात्रा भी इनमें विद्यमान है, जिससे सहज में ही ये लोगों .महारावतजी की जीवन- का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं । सम्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें भावनाएं इनकी विशुद्ध हैं। प्रजा के स्वास्थ्य की उन्नति और विद्या के प्रसार की ओर इनका पूरा ध्यान है। संगीत और शिल्प तथा चित्रकला से इन्हें अनुराग है । जन्तु-शास्त्र में ये स्वयं बहुत कुछ गति रखते हैं। प्रतापगढ़ के बंगले में, जहां महारावतजी और राजपरिवार का निवास है, इन्होंने एक जन्तुशाला बना रखी है । हिंसक जंतुओं में शेर, चीते एवं सूअर आदि के शिकार की तरफ़ इनकी अधिक रुचि है। कई शेरों को अब तक ये अपनी बंदूक का निशाना बना चुके हैं। हिंदू धर्म तथा संस्कृति पर इनकी पूरी आस्था है और ये तदनुसार आचरण करने का सदा प्रयत्न करते हैं। इनकी प्रजा का इनपर पूरा विश्वास है और उनके प्रति इनका अच्छा व्यवहार होने से उन्हें इनसे भविष्य में बड़ी- बड़ी आशाएं हैं । उपर्युक्त प्रतापगढ़ के बंगले में इन्होंने बहुत कुछ सुधार कराकर उसका विस्तार बढ़ाने के अतिरिक्त वहां एक रमणीय उद्यान लगवा दिया है। उद्योग धन्धों की वृद्धि की ओर भी इनकी अधिक रुचि
महारावत रामसिंहजी ३५७ है। साथ ही समयानुसार शासन-व्यवस्था को उन्नत बनाकर प्रजा का हित- साधन करने की भी इनकी अभिलाषा रहती है । भारत के कई बड़े-बड़े नरेशों और अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ इनका मित्रता का व्यवहार है । विद्वानों और गुणज्ञों से ये प्रसन्नतापूर्वक मिलते हैं और उनका उचित सम्मान भी करते हैं । ये बड़े मातृ-भक्त हैं और सदा अपनी माता शेखावत के सत्परामर्श को ग्रहण करते हैं। राज्य में डाकेज़नी अब बहुत कुछ बन्द हो गई है और राज्य ऋणग्रस्त नहीं है । ये चेम्बर ऑव् प्रिंसेज़ ( नरेन्द्र मण्डल ) के सदस्य हैं और प्रायः वहां के अधिवेशनों में भी सम्मिलित होकर भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त ये मेयोकॉलेज अजमेर की प्रबन्धकारिणी समिति के मेम्बर और बाहर की कई अन्य संस्थाओं के सहायक हैं। वर्तमान यूरोप के युद्ध के आरं- भिक समय में इन्होंने अंग्रेज़ सरकार के प्रति राज-भक्ति प्रकट करते हुए दस सहस्र रुपये और बाद में ५०० पाउण्ड दिये हैं। अपने सामन्तवर्ग, राज-कर्मचारियों आदि के साथ इनका अच्छा व्यवहार है । पारसी सेठ फ़ीरोज़शाह को उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर इन्होंने बरखेड़ा गांव जागीर में दिया है और इसी प्रकार अन्य कई व्यक्तियों को भी समय-समय पर गांव, भूमि, मकान आदि जागीर तथा पुण्य में दिये हैं। महारावतजी की माता शेखावत चांदकुंवरी ने अपने पति स्वर्गीय महाराजकुमार मानसिंह की स्मृति स्थाई रखने के लिए उसके नाम पर “युवराज मानसिंह अनाथालय” का शिलान्यास बीकानेर के महाराजकुमार शार्दूलसिंह-द्वारा ता० १५ दिसम्बर ई० सन् १६४० को करवाया है। इनका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ और शरीर की गठन सुडौल है ! हिंसक-जंतुओं के शिकार के समय ये कठिन से कठिन परिश्रम करते हुए भी नहीं थकते हैं।
सातवां अध्याय प्रतापगढ़ राज्य के सरदार और प्रतिष्ठित कर्मचारी सरदार राजपूताना के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ राज्य की अधिकांश भूमि भी सरदारों में बंटी हुई है । उनके अतिरिक्त कुछ कर्मचारियों को भी राज्य की तरफ़ से जागीरें दी गई हैं । देवमंदिरों, ब्राह्मणों, चारणों और रावों को भी कई गांव और भूमि नरेशों की ओर से दी गई है, जिसकी गणना माफ़ी में होती है । राजपूत-सरदारों को जागीर के एवज़ में खुद और सवार तथा पैदलों से राज्य की सेवा करनी पड़ती है एवं उनसे कुछ रक़म "टांका" अर्थात् खिराज के नाम से ली जाती है । सरदारों की नौकरी का कोई समय और सवार-सिपाहियों की संख्या का यहां पर कोई क्रम नहीं है । जितने सवार-सिपाही राज्य से मांगे जावें, उनके साथ हाज़िर होकर जब तक उनको रुख़सत न दी जावे तब तक नौकरी देने के लिए वे प्रत्येक समय तैयार रहते हैं । राजपूत जागीरदारों के वहां तीन दर्जे हैं । पहले दर्जे के जागीरदार नगारबंद अर्थात् उमराव कहलाते हैं, दूसरे दर्जे के जागीरदार ताज़ीमी और तीसरे दर्जे के जागीरदार ग़ैरताज़ीमी कहलाते हैं । इस राज्य में जागीरदारों को जो जागीरें आदि दी गई हैं, वे वंश- परंपरागत उनके उत्तराधिकारियों के अधिकार में रहती है । राजपूत जागीरदारों में से अधिकांश को भाईबंट में एवं कितनेक को उनकी अच्छी सेवाओं के उपलक्ष में तथा बाहर से आकर रहने पर निर्वाह के लिए
जागीरें दी गई हैं। वहां के अधिकांश सरदार महारावत के सगोत्री सीसोदिया राजपूत हैं और दूसरे थोड़े। प्रथम वर्ग के सरदारों को ताज़ीम के अतिरिक्त नक़ारा, निशान और पैर में स्वर्ण-भूषण पहिनने आदि का सम्मान प्राप्त है। उनकी संख्या इस समय ११ है। उनमें महारावत के निकट संबंधियों में अरगोद का ठिकाना भी है। दूसरे दर्जे के जागीरदारों में कई पुराने और कुछ नये ठिकाने हैं। महारावत दलपतसिंह से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी तक उनमें बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। ठिकानेदार अपनी जागीर किसी को रेहन अथवा बै नहीं कर सकते और न अपनी जागीर का कोई भाग दूसरों को दान में दे सकते हैं। उत्तराधिकारी के अभाव में वे बिना राज्य की आज्ञा के दत्तक पुत्र नहीं रख सकते हैं। प्रथम वर्ग के सब सरदार सीसोदिया हैं। उनकी प्रतिष्ठा भाइयों के समान है एवं, उनको दीवानी तथा फ़ौजदारी मुक़दमों के सुनने का भी अधिकार दिया गया है। जब नवीन सरदार ठिकाने पर नियत होता है, तब राज्य में उससे तलवारबंदी का नज़राना लिया जाता है। इसके अतिरिक्त महारावत की गद्दीनशीनी, विवाह आदि के अवसरों पर भी सरदारों के नज़राना वग़ैरा दाख़िल करने का प्राचीन रिवाज है।
महारावत के निकट सम्बन्धी
अरगोद
अरगोद के स्वामी महारावत सालिमसिंह के छोटे पुत्र लालसिंह के वंशधर हैं¹। उनकी उपाधि “महाराज” है। लालसिंह का वि० सं० १८२४ ( ई० स० १७६७) में जन्म हुआ था। फिर महारावत सामन्तसिंह ने उस(लालसिंह)को अपने छोटे भाई के तरीक़े
( १ ) वंशक्रम—[ १ ] लालसिंह [ २ ] अर्जुनसिंह [ ३ ] खुशहालसिंह [ ४ ] रघुनाथसिंह और [ ५ ] गोवर्धनसिंह ।
३६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अरणोद की जागीर दी। उसने अरणोद के पट्टे में अपने नाम पर लाल- पुरा गांव बसाकर वहां गढ़ बनवाया, जो लालगढ़ कहलाता है। वि० सं० १८८६ (ई० स० १८२६) में लालसिंह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र अर्जुन- सिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसका जन्म वि० सं० १८७६ (ई० स० १८१६) में हुआ था। अर्जुनसिंह का वि० सं० १९११ (ई० स० १८५४) में देहांत हुआ। तब उसका पुत्र खुशहालसिंह वहां का महाराज हुआ, परंतु वह कुछ वर्ष ही जीवित रहा और वि० सं० १९१४ चैत्र वदि ११ (ई० स० १८५८ ता० ११ मार्च) को परलोक सिधारा। तदनंतर उसके स्थान पर उसका बालक पुत्र रघुनाथसिंह अरणोद का स्वामी बना। वि० सं० १९४६ (ई० स० १८६०) में प्रतापगढ़ के स्वामी महा- रावत उदयसिंह का निःसंतान देहांत होने पर अरणोद से महाराज रघु- नाथसिंह गोद जाकर प्रतापगढ़ की गद्दी पर बैठा। उस समय उसके दो कुंवर प्रतापसिंह और मानसिंह विद्यमान थे। रघुनाथसिंह के गद्दी बैठने पर प्रतापसिंह पाटवी राजकुमार माना गया और अरणोद की जागीर मानसिंह के नाम पर रखी गई। इसके थोड़े ही समय बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई। तब मानसिंह युवराज बनाया गया। वि० सं० १९५७ भाद्रपद वदि द्वितीय १४ (ई० स० १९०० ता० २४ अगस्त) को महारावत रघुनाथसिंह के छोटे कुंवर गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर महारावत ने वि० सं० १९५८ भाद्रपद वदि ७ (ई० स० १९०१ ता० ४ सितंबर) को गोवर्धनसिंह को अरणोद की जागीर प्रदान की और उस (गोवर्धनसिंह) की उपाधि "महाराज" हुई। महाराज गोवर्धनसिंह ने अजमेर के मेयो कॉलेज में डिप्लोमा तक अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा प्राप्त की है। वह व्यवहार-कुशल व्यक्ति है। महारावत रघुनाथसिंह के समय उसको चंवर रखने का सम्मान प्राप्त हुआ। उस (गोवर्धनसिंह) के दो पुत्र—गोपालसिंह और भीमसिंह— हैं, जो शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
धमोतर ३६१ प्रथम वर्ग के सरदार धमोतर धमोतर के सरदार महारावत सूरजमल के छोटे पुत्र सैंसमल- (सहसमल) के वंशधर हैं१ और वे सिंहावत (सहसावत) कहलाते हैं। उनकी उपाधि "ठाकुर" है। इस राज्य में इस ठिकाने की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है और आय में भी इस ठिकाने के बराबर दूसरा कोई ठिकाना नहीं है। ख्यातों में लिखा है कि सैंसमल उदयपुर के महाराणाओं की सेवा में रहता था, इसलिए वहां से उसको नींबाहेड़ा और खोडीप की जागीर मिली और वह महाराणा की तरफ़ से युद्ध करता हुआ काम आया। तदनंतर उसका पुत्र कांधल वहां का स्वामी हुआ, जो मेवाड़ छोड़- कर महारावत विक्रमसिंह (बीका) के साथ कांठल में गया और वहां उसका प्रभुत्व स्थिर करने में सदा उस (विक्रमसिंह) का साथी रहा। इसपर उसको वहां से धमोतर का पट्टा जागीर में मिला। बादशाह अकबर के समय आंबेर (जयपुर राज्य) के कछुवाहा कुंवर मानसिंह ने उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) पर चढ़ाई की, उस समय देव- लिया से महाराणा की सहायतार्थ जो सेना गई, उसमें ठाकुर कांधल भी था और वह हल्दीघाटी के युद्ध-क्षेत्र में शाही सेना से वीरतापूर्वक लड़कर काम आया। कांधल का पुत्र गोपालदास था, जो बांसवाड़ा के महारावल की सहायतार्थ किसी युद्ध में लड़कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। गोपालदास के ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] सैंसमल. [ २ ] कांधल [ ३ ] गोपालदास [ ४ ] जोधसिंह [ ५ ] जोगीदास [ ६ ] जसकरण [ ७ ] पृथ्वीराज (पृथ्वीसिंह) [ ८ ] फ़तहसिंह [ ६ ] कुबेरसिंह [ १० ] कल्याणसिंह [ ११ ] नाथूराम (नाथूसिंह) [ १२ ] हरीसिंह [ १३ ] मोहकमसिंह [ १४ ] रोड़सिंह [ १५ ] हमीरसिंह [ १६ ] केसरीसिंह [ १७ ] हिंदू सिंह और [ १८ ] दयालसिंह। ४६
३६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पुत्र जोधसिंह और पूरा¹ हुए । उदयपुर के महाराणा जगतसिंह (प्रथम) के समय देवलिया के महारावत जसवन्तसिंह को कुंवर महासिंह-सहित उक्त महाराणा ने अपनी सेना भेज चंपा बाग में मरवा डाला और देवलिया पर भी सेना भेज अधिकार कर लिया। उस समय जोधसिंह महारावत जसवंतसिंह के दूसरे पुत्र हरिसिंह को लेकर बादशाह शाहजहां के दरबार में गया और महारावत का देवलिया आदि पर अधिकार कराने में प्रयत्न- शील रहा । फिर बादशाह ने सेना भेजकर महारावत हरिसिंह का देवलिया पर अधिकार करा दिया। जोधसिंह की वि० सं० १७०३ (ई० स० १६४६) में मृत्यु हुई² । तदनंतर उसका पुत्र जोगीदास धमोतर का स्वामी हुआ। उसने धमोतर में लक्ष्मीनारायण का मंदिर और गढ़ में महल आदि बनवाये । उसका छोटा भाई भोगीदास था, जिसने देवलिया में एक बावड़ी बनवाई, जो भोगीदास की बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध है³ । जोगीदास का पुत्र जसकरण⁴ और पौत्र पृथ्वीराज हुआ । पृथ्वी- (१) पूरा के नाम से पूरावत शाखा चली। प्रतापगढ़ राज्य में इस समय पूरावतों का जाजली का ठिकाना प्रथम वर्ग में और बरखेड़ी द्वितीय वर्ग में है, जिनका उल्लेख आगे किया जायगा । (२) धमोतर में तालाब के किनारे ठाकुर जोधसिंह का स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर वि० सं० १७०३ शाके १५६८ मार्गशीर्ष सुदि २ (ई० स० १६४६ ता० २६ नवम्बर) को उसका देहान्त होने और उसके साथ उसकी राठोड़ पत्नी के सती होने का उल्लेख है । (३) कल्याण कवि-रचित "प्रताप-प्रशस्ति" नामक खंडित काव्य से ठाकुर जोगीदास का महारावत हरिसिंह का समकालीन होना प्रकट है। उक्त प्रशस्ति में उस- (जोगीदास) के छोटे भाई भोगीदास की धार्मिकता आदि का वर्णन है। देवलिया में भोगीदास की बनवाई हुई बावड़ी के समीप उसका स्मारक चबूतरा बना हुआ है, जिसपर उस (भोगीदास) की वि० सं० १७३६ आषाढ वदि ३ (ई० स० १६७९ ता० १६ जून) को मृत्यु होने का उल्लेख है । (४) ठाकुर जसकरण का भी उपर्युक्त "प्रताप-प्रशस्ति" में वर्णन है और उसमें उसको महारावत प्रतापसिंह का सामन्त बतलाते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है।
धमोतर ३६३
राज़ की वि० सं० १७७७ (ई० स० १७२०) में मृत्यु हुई । उसने वहां तालाब की पाल बनवाई । उसके पीछे फ़तहसिंह' और फिर उसका पुत्रं
धमोतर के ठाकुरों के दग्ध-स्थान में ठाकुर जसकरण की स्मारक छत्री बनी हुई है, जिसमें उसका वि० सं० १७७१ भाद्रपद सुदि १५ (ई० स० १७१४ ता० १२ सितम्बर) को देहान्त होने, उसके साथ उसकी पत्नी राठोड़ आसकुंवरी के सती होने और उस (जस- करण) के पुत्र पृथ्वीराज द्वारा ६२४१ रुपये लगाकर उस छत्री के बनवाये जाने का उल्लेख है ।
(१) ख्यातों में लिखा है कि कल्याणपुरा के ठाकुर फ़तहसिंह का ज्येष्ठ पुत्र भगवतसिंह महारावत गोपालसिंह का बड़ा कृपापात्र था । उस (भगवतसिंह) ने धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह के विरुद्ध महारावत को बहकाया, जिससे धमोतरवालों से महारावत अप्रसन्न रहने लगा । इस बात का पता पाकर धमोतर के ठाकुर फ़तहसिंह ने भगवंतसिंह को मरवा डाला, जिससे महारावत की उसपर अधिक नाराज़गी हो गई । वि० सं० १७७६ (ई० स० १७२२) में धमोतर का ठाकुर फ़तहसिंह मर गया और उसके पीछे उसका पुत्र कुबेरसिंह वहां का स्वामी बना, जिससे उसके चाचा कल्याणसिंह ने धमोतर छीन लिया। परस्पर के द्वेष का यह अच्छा अवसर देख महारावत ने धमोतर के ठिकाने को राज्याधिकार में कर लिया । इसपर वहां के हक़दार होलकर की सेना को मददगार बनाकर चढ़ा लाये । महारावत की तरफ़ से भी मुक़ाबला हुआ और यह बखेड़ा चलता रहा। उन्हीं दिनों महारावत गोपालसिंह का देहान्त हो गया और उसका कुंवर सालिमसिंह सिंहासनारूढ़ हुआ। उस समय उपर्युक्त भगवतसिंह के छोटे भाई दौलतसिंह ने उस (सालिमसिंह) से निवेदन किया कि इस पारस्परिक संघर्ष में व्यर्थ ही शक्ति का ह्रास होगा, इसलिए होलकर की सेना को धमोतर से व्यय दिलाकर विदा कर दिया जावे और धमोतर पीछा वहांवालों को दे दिया जाय । महारावत द्वारा स्वीकृति मिलने पर दौलतसिंह दूसरे पक्ष और होलकर के सेनापति से मिला तथा बात तय हो जाने पर तीन लाख रुपये दिलवाकर उसने उक्त सेना को लौटा दिया । उस समय एक लाख रुपये तो धमोतरवालों ने नक़द दे दिये और दो लाख का रुक़ा लिखने पर राज्य ने दिये, जिसकी वसूली तक धमोतर पर महारावत का अधिकार रहा और जब सब रुपये वसूल हो गये तो उक्त ठिकाना वहांवालों को महारावत ने दे दिया। दौलतसिंह की इस सेवा के बदले में महारावत ने प्रसन्न होकर देवद की जागीर उसे प्रदान की, परन्तु भगवतसिंह को मरवा डालने का धमोतर और कल्याणपुरावालों के बीच वैर बना ही रहा, जिसकी सफ़ाई धमोतर के ठाकुर केसरीसिंह ने कल्याणपुरा के ठाकुर तख़्तसिंह से कर पुराना वैमनस्य मिटा दिया।
३६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कुवेरसिंह वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७३२ ) में धमोतर का स्वामी हुआ; किंतु कुवेरसिंह के हाथ से धमोतर निकल गया और वहां उसका पितृव्य कल्याणसिंह (फ़तहसिंह का छोटा भाई ) अधिकार कर बैठा, जिसकी वि० सं० १८०० ( ई० स० १७४३ ) में मृत्यु हुई। तदनंतर नाथूराम, हरिसिंह, मोहकमसिंह और रोड़सिंह क्रमशः धमोतर के ठाकुर हुए। रोड़सिंह का वि० सं० १६०५ ( ई० स० १८४८) में देहांत हुआ। उसके तीन पुत्र हमीरसिंह, गंभीरसिंह, और भवानीसिंह हुए। ठाकुर हमीरसिंह की बहिन गुलाबकुंवरी का विवाह अहमदनगर- ( ईडर राज्य ) के स्वामी महाराज तख्तसिंह के साथ हुआ था, जिसके उदर से जसवंतसिंह का जन्म हुआ। इस वैवाहिक सम्बन्ध के कारण तख्तसिंह ने महाराजा मानसिंह की मृत्यु हो जाने पर ( वि० सं० १६०० = ई० स० १८४३ में ) जोधपुर की गद्दी पर बैठने के बाद हमीरसिंह के छोटे भाई गंभीरसिंह को बुला लिया और जागीर में झालामंड का ठिकाना दिया । जोधपुर का स्वामी होने के पीछे भी वि० सं० १६०३ (ई० स० १८४६) में तख्तसिंह का एक विवाह ठाकुर हमीरसिंह के कुटुंबी लक्ष्मणसिंह१ की पुत्री उदयकुंवरी के साथ हुआ था। फिर तख्तसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके कुंवर जसवन्तसिंह ने जोधपुर राज्य का स्वामी होने पर अपने मामा हमीरसिंह को जोधपुर बुलाकर ताज़ीम, बांहपसाव, एक चंवर और पालकी- ( पीनस ) में बैठने की प्रतिष्ठा देकर अपने दाहिने पार्श्व में बैठने का सम्मान दिया । हमीरसिंह निःसंतान था, इसलिए उसके छोटे भाई गंभीरसिंह का पुत्र केसरीसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ । केसरीसिंह के दो पुत्र हिंदूसिंह और पृथ्वीसिंह हुए, जिनमें से हिंदूसिंह वि० सं० १६५० ( १ ) लक्ष्मणसिंह धमोतर के ठाकुर हरिसिंह के छोटे पुत्र वीरमदेव का बेटा था। उस (लक्ष्मणसिंह) की पौत्री और दलेलसिंह की पुत्री प्रतापकुंवरी का विवाह जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह के पुत्र बहादुरसिंह के साथ वि० सं० १६२४ (ई० स० १८६७) में हुआ था। इस प्रसङ्ग से महाराजा जसवन्तसिंह ने वि० सं० १६३३ (ई० स० १८७६) में उसको भी पैर में स्वर्णाभूषण पहिनने की प्रतिष्ठा दी थी।
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३६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हुआ, जो महारावत प्रतापसिंह का समकालीन था । उसका पुत्र केसरीसिंह पिता की विद्यमानता में ही मर गया, इसलिए केसरीसिंह का पुत्र फ़तहसिंह अपने दादा (रणछोड़दास) का उत्तराधिकारी हुआ । फिर उसका पौत्र हरिसिंह (भगवंतसिंह का पुत्र) कल्याणपुरा का ठाकुर हुआ । हरिसिंह के चिमनसिंह तथा पहाड़सिंह नामक दो पुत्र थे, जो क्रमशः कल्याणपुरा के स्वामी हुए । पहाड़सिंह का पुत्र लालसिंह और उस- (लालसिंह) का तख़्तसिंह हुआ । तत्पश्चात् देवीसिंह वहां का स्वामी हुआ, जिसकी वि० सं० १६८१ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १६२५ ता० १८ अप्रेल) को मृत्यु होने पर उसका पुत्र संग्रामसिंह कल्याणपुरा का स्वामी हुआ, जो वहां का वर्तमान ठाकुर है । आंवीरामा आंवीरामा के ठाकुर, महारावत बाघसिंह के छोटे पुत्र ख़ान के वंशधर हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है । ख़ान का पुत्र दुर्गादास और उस (दुर्गादास) का सबलसिंह हुआ, जिसको महारावत सिंहा के समय आंवीरामा जागीर में दिया गया । सबलसिंह का पुत्र गोपीनाथ हुआ, जिसके पीछे चंद्रसिंह, पृथ्वीसिंह, खुम्माणसिंह एवं अखैराज क्रमशः आंवीरामा के स्वामी हुए । अखैराज का पुत्र कुशलसिंह हुआ, जिसका पुत्र केसरीसिंह पिता की विद्यमानता में महारावत उदयसिंह के समय बोरी-राँछड़ी के सीमा-संबंधी झगड़े में बांसवाड़ा राज्य की तरफ़ से आक्रमण होने पर लड़कर मारा गया । तब उस (केसरीसिंह) का पुत्र विभूतिसिंह अपने दादा का उत्तराधिकारी हुआ । विभूतिसिंह का पुत्र शंभुसिंह आंवीरामा का वर्तमान सरदार है । ( १ ) वंशक्रम—[ १ ] ख़ान [ २ ] दुर्गादास [ ३ ] सबलसिंह [ ४ ] गोपी- नाथ [ ५ ] चन्द्रसिंह [ ६ ] पृथ्वीसिंह [ ७ ] खुम्माणसिंह [ ८ ] अखैराज [ ६ ] कुशलसिंह [ १० ] विभूतिसिंह और [ ११ ] शंभुसिंह ।
रायपुर ३६७
रायपुर रायपुर के सरदार महारावत विक्रमसिंह के पुत्र सुर्जनदास के बेटे रामदास के वंशधर हैं¹ और उनकी उपाधि “ठाकुर” है। वहां के सरदार को महारावत के दरबार में बांई ओर की प्रथम बैठक तथा ताज़ीम आदि का सम्मान प्राप्त है। रामदास² ने वि० सं० १६६५ (ई० स० १६०८) के लगभग महा- रावत सिंह के राज्यकाल में नीनोर-बोरदिया के निवासी जलखेड़िया राठोड़ों को परास्तकर रायपुर बसाया। रामदास का पुत्र द्वारिकादास वि० सं० १६६२ (ई० स० १६३५) में अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। उसके छोटे भाई मानसिंह ने मानपुरा और कानसिंह ने कानगढ़ बसाया, जो अब तक उनके वंशजों के अधिकार में है। द्वारिकादास का पुत्र दलपतसिंह³ और इस(दलपतसिंह) का पौत्र गोपालसिंह था, जिसने बोरी-राँछड़ी पर अधिकार किया। उसका पुत्र गुमानसिंह रायपुर का ठाकुर बना, जिसको देवलिया के राज-महलों में पूरावत अक्षयसिंह और हरिसिंह ने मारकर रायपुर पर वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) के लगभग अपना अधिकार कर लिया। फिर गुमानसिंह के पुत्र दलसिंह ने वि० सं० १८४१ (ई० स० १७८४) के (१) वंशक्रम—[ १ ] सुर्जनदास [ २ ] रामदास [ ३ ] द्वारिकादास [ ४ ] दलपतसिंह [ ५ ] नगसिंह [ ६ ] गोपालसिंह [ ७ ] रत्नसिंह [ ८ ] गुमानसिंह [ ६ ] दलसिंह [ १० ] केसरीसिंह [ ११ ] हिंदू सिंह [ १२ ] रत्नसिंह (दूसरा) और [ १३ ] प्रतापसिंह। (२) रामदास के समय का एक ताम्रपत्र वि० सं० १६८५ माघ सुदि ५ (ई० स० १६२६ ता० १६ जनवरी) सोमवार का मिला है, जिसमें उसकी उपाधि “महाराज” लिखी है एवं उसके पुत्र का नाम कुंवर द्वारिकादास देकर देराश्री जगन्नाथ -शुक्ल को पचास बीघा ज़मीन रायपुर में पुण्य देने का उल्लेख है। (३) "प्रतापप्रशस्ति" खंडित काव्य में कवि कल्याण ने दलपतसिंह का भी उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट है कि वह महारावत प्रतापसिंह का समकालीन था।
३६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लगभग महारावत सामन्तसिंह की आज्ञा से पूरावतों को वहां से निकालकर रायपुर पर पीछा अपना क़ब्ज़ा स्थिर किया। दलसिंह की वि० सं० १८८८ (ई० स० १८३१) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र केसरीसिंह रायपुर का स्वामी हुआ, पर उसके कोई संतान नहीं हुई, अतएव उसके लघु भ्राता रघु- नाथसिंह का पुत्र हिंदूंसिंह, केसरीसिंह के दत्तक गया। उस (हिंदूंसिंह)- का पुत्र रत्नसिंह (दूसरा) हुआ, किंतु उसके भी संतति न थी, इसलिए उसने उपर्युक्त गुमानसिंह के भाई (बदनसिंह) के वंशधर दुलहसिंह- (पहाड़सिंह का पुत्र) को वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०६) में गोद लिया, जिसको महारावत ने स्वीकार नहीं किया। वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में रत्नसिंह का देहांत होने पर रायपुर ठिकाना राज्याधिकार में ले लिया गया, परन्तु फिर महारावत रघुनाथसिंह ने अपनी विशेष कृपा प्रदर्शित करते हुए इस ठिकाने को बनाये रखना स्थिर किया और दुलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को रायपुर का ठाकुर बनाकर नज़राने के २५००१ रुपये वसूल होने तथा वार्षिक खिराज में ५०० रुपये की वृद्धि करने की आज्ञा दी। वह ३२७५ रुपये वार्षिक खिराज राज्य को देता है। झांतला झांतला के ठाकुर, महारावत जसवंतसिंह के पुत्र केसरीसिंह के वंशज हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। महारावत हरिसिंह ने केसरीसिंह को निर्वाह के लिए झांतला की जागीर दी थी। केसरीसिंह के चतुर्थ वंशधर अमानसिंह का पुत्र चिमनसिंह और पौत्र दलेलसिंह था। दलेलसिंह के पीछे उसका पुत्र अजीतसिंह हुआ। वह निःसंतान था, इसलिए महारावत हरिसिंह के (१) वंशक्रम-- [१] केसरीसिंह [२] कुशालसिंह [३] बख़्तसिंह [४] सूरतसिंह [५] अमानसिंह [६] चिमनसिंह [७] दलेलसिंह [८] अजीतसिंह [६] प्रतापसिंह [१०] बाजसिंह [११] तख़्तसिंह और [१२] उम्मेदसिंह।
छोटे पुत्र अमरसिंह के वंशधर वैरीशाल बगड़ावदवाले के पुत्र बुधसिंह को उसने अपना दत्तक बनाया, परंतु उसकी मृत्यु के बाद उसकी गर्भवती स्त्री से उसके पुत्र प्रतापसिंह का जन्म हो गया, जिससे बुधसिंह भांतला के ठिकाने से वंचित रहा और प्रतापसिंह का वहां अधिकार हुआ। प्रतापसिंह का पुत्र लालसिंह, रतलाम इलाक़े के अमरेठा के महाराज सामंतसिंह के हाथ की गोली लगने से मारा गया। तब उस (लालसिंह)- का पुत्र तख़्तसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसकी वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०६) में मृत्यु होने पर उसका पौत्र उम्मेदसिंह (पर्वतसिंह का पुत्र) भांतला ठिकाने का स्वामी हुआ, जो वहां का वर्तमान सरदार है। उसने मेयो कॉलेज, अजमेर में शिक्षा प्राप्त की है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है।
सालिमगढ़
सालिमगढ़ के सरदार महारावत हरिसिंह के छोटे पुत्र मोहकमसिंह के वंशधर हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। मोहकमसिंह को प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से जागीर मिली, जिसमें उसके पुत्र मोहनसिंह ने अपने नाम से मोहनगढ़ गांव बसाकर वहां अपन ठिकाना नियत किया, जो सालिमगढ़ के पास एक वीरान गांव है। कई वर्ष तक इस ठिकाने का मुख्य स्थान मोहनगढ़ रहा। मोहनसिंह का पुत्र जोरावरसिंह और पौत्र हिम्मतसिंह हुआ, जिसके दो बेटे उदयसिंह और सरदारसिंह थे, परंतु वे पिता की विद्यमानता में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। अतएव मोहकमसिंह के भाई अमरसिंह के वंशधर, बड़ी-साखथली के ठाकुर दलसिंह का पुत्र मोहबतसिंह गोद जाकर सालिमगढ़ का स्वामी हुआ किन्तु उसके भी संतान नहीं हुई, इसलिए उसने अपने चचेरे
(१) वंशक्रम—[१] मोहकमसिंह [२] मोहनसिंह [३] जोरावरसिंह [४] हिम्मतसिंह [५] मोहबतसिंह [६] सरदारसिंह [७] शिवसिंह [८] खुशहालसिंह और [९] हिंदू सिंह। ४७
३७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
भाई सरदारसिंह ( बगड़ावद के ठाकुर वैरीशाल के पुत्र ) को अपना
उत्तराधिकारी बनाया । सरदारसिंह का पुत्र शिवसिंह और, उसका
खुशहालसिंह हुआ । खुशहालसिंह भी निःसंतान था, इसलिए अमरसिंह
के चतुर्थ वंशधर दुलहसिंह के प्रपौत्र कीर्तिसिंह का पुत्र। हिन्दू सिंह गोद
जाकर सालिमगढ़ का अधिकारी हुआ, जो वहां का वर्तमान सरदार है।
अचलावदा
महारावत हरिसिंह के छोटे पुत्र माधवसिंह को प्रतापगढ़ राज्य
की तरफ़ से अचलावदा की जागीर मिली । उस ( माधवसिंह ) के वंशज१
अचलावदा के स्वामी हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है।
माधवसिंह के बेटे जगतसिंह के तीन पुत्र जोधसिंह, ज़ालिमसिंह
और दौलतसिंह हुए । जोधसिंह और ज़ालिमसिंह का वंश न चला और
वे पिता की जीवितावस्था में मर गये, इसलिए उनका छोटा भाई दौलत-
'सिंह अपने पिता का क्रमानुयायी हुआ । तदनंतर चिमनसिंह, लक्ष्मणसिंह,
भीमसिंह, रत्नसिंह और माधवसिंह (दूसरा) क्रमशः वहां के स्वामी
हुए। माधवसिंह के दो पुत्र - भवानीसिंह और गोपालसिंह हुए- जिनमें
से भवानीसिंह अपने पिता का अधिकारी हुआ और वहां का वर्तमान
सरदार है।
वरडिया
वरडिया के सरदार मेवाड़ के सुप्रसिद्ध रावत चूंडा के वंशधर हैं²।
उनकी उपाधि "ठाकुर" है।
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( १ ) वंशक्रम - [ १ ] माधवसिंह [ २ ] जगतसिंह [ ३ ] दौलतसिंह [ ४ ]
चिमनसिंह [ ५ ] लक्ष्मणसिंह [ ६ ] भीमसिंह [ ७ ] रत्नसिंह [ ८ ] माधवसिंह
(दूसरा) और [ ६ ] भवानीसिंह ।
( २ ) वंशक्रम - [ १ ] मनोहरदास [ २ ] लालसिंह [ ३ ] अजबसिंह [ ४ ]
कुशालसिंह [ ५ ] सामंतसिंह [ ६ ] जगतसिंह [ ७ ] मोहकमसिंह [ ८ ] चिमनसिंह