राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
नाम से २७५०० रुपये कलदार प्रतिवर्ष ई० स० १६३७ से लेना स्थिर किया है। वि० सं० १६६१ (ई० स० १६३४) में चमोतर में समस्त भारत- वर्षीय जैन दिगम्बर समुदाय का एक वृहत् सम्मेलन हुआ, जिसमें लग- [पार्श्व-टिप्पणी: दिगंबर जैन सम्मेलन की ओर से महारावत को अभिनंदन पत्र मिलना] भग बीस सहस्र आदमी एकत्र हुए। उस समय महारावतजी ने उक्त सम्मेलन में भाग लेकर अहिंसा के कार्यों को प्रोत्साहन दिया। इनके उत्तम व्यवहार और उदार विचारों से प्रेरित होकर उक्त सम्मेलन में इनका दिग- म्बर समुदाय की तरफ़ से बड़ा स्वागत किया गया और उन्होंने स्वर्ण के चौखटे में जड़ा हुआ अभिनंदन पत्र भेंट कर इनकी प्रजा-प्रियता पर हर्ष प्रकट करते हुए राजभक्ति प्रकट की। इसपर महारावत ने अपनी प्रजा की इच्छा को ध्यान में रखते हुए फाल्गुन सुदि ८ और १४ को अपने राज्य में जीव-हिंसा बंद रखने की आज्ञा निकाल दी है। इनके मित्रतापूर्ण व्यवहार और अंग्रेज़-सरकार के प्रति उत्तम आचरण की पोलिटिकल अफ़सरों ने समय-समय पर प्रशंसा की है। [पार्श्व-टिप्पणी: सम्राट् जॉर्ज की ओर से महारावत को ख़िताब मिलना] सम्राट् जॉर्ज षष्ठ ने वि०सं० १६६४ (ई०स० १६३८) में नवीन वर्ष के उपाधिवितरणोत्सव पर इनको के० सी० एस० आई० (नाइट कमांडर ऑव् दि स्टार ऑव् इंडिया) का उच्च ख़िताब दिया। इसकी सूचना प्राप्त होने पर वि० सं० १६६५ (ई० स० १६३८) में ये दिल्ली गये, जहां भारत के वाइसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इनको उक्त ख़िताब के तमग़े से विभूषित किया। प्रधान मंत्री एफ़० सी० केवेन्टरी के पद-त्याग करने पर इन्होंने राव साहब शाह चुन्नीलाल एम० शराफ़ को वि० सं० १६६० (ई० स० [पार्श्व-टिप्पणी: मंत्री पद पर महारावत का राजा त्रिभुवनदास को नियत करना] १६३३) में दीवान के पद पर नियत किया था। उसके पृथक् होने पर इन्होंने अपने पुश्तैनी कर्मचारी शाह माणकलाल पाडलिया, बी० ए०, एल-एल० बी० से अस्थायी रूप से लगभग दो वर्ष तक यह कार्य लिया।