राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 427, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस प्रकार महारावत के अन्तःपुर में निरन्तर राजकुमारियां ही उत्पन्न होने से वहां की प्रजा चिंतित थी; किन्तु ईश्वर की कृपा से वि० सं० १९९६ फाल्गुन सुदि ८ (ई० स० १९४० ता० १७ मार्च) को महारावत की ध्रांगधरावाली तृतीय महाराणी के उदर से महाराजकुमार का जन्म हुआ, जिसका समाचार पाते ही राज्य के हितचिन्तकों का चित्त प्रफुल्लित हो गया । महारावत ने इस समाचार के मिलने पर समयोचित उदारताएं प्रकट कीं । प्रतापगढ़ के समस्त ब्राह्मणों को राज्य की तरफ़ से भोजन कराया गया और विजयराघवजी आदि के मन्दिरों में अपनी तरफ़ से भेंट-पूजा कराने के उपरान्त राज्य के समग्र कर्मचारियों को एक मास का वेतन पुरस्कार में प्रदान किया गया । महारावत सर रामसिंहजी उदार-प्रकृति और नये विचारों के नरेश हैं । स्वभाव इनका सरल है। दयालुता के साथ विनय-शीलता की मात्रा भी इनमें विद्यमान है, जिससे सहज में ही ये लोगों .महारावतजी की जीवन- का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं । सम्बन्धी मुख्य-मुख्य बातें भावनाएं इनकी विशुद्ध हैं। प्रजा के स्वास्थ्य की उन्नति और विद्या के प्रसार की ओर इनका पूरा ध्यान है। संगीत और शिल्प तथा चित्रकला से इन्हें अनुराग है । जन्तु-शास्त्र में ये स्वयं बहुत कुछ गति रखते हैं। प्रतापगढ़ के बंगले में, जहां महारावतजी और राजपरिवार का निवास है, इन्होंने एक जन्तुशाला बना रखी है । हिंसक जंतुओं में शेर, चीते एवं सूअर आदि के शिकार की तरफ़ इनकी अधिक रुचि है। कई शेरों को अब तक ये अपनी बंदूक का निशाना बना चुके हैं। हिंदू धर्म तथा संस्कृति पर इनकी पूरी आस्था है और ये तदनुसार आचरण करने का सदा प्रयत्न करते हैं। इनकी प्रजा का इनपर पूरा विश्वास है और उनके प्रति इनका अच्छा व्यवहार होने से उन्हें इनसे भविष्य में बड़ी- बड़ी आशाएं हैं । उपर्युक्त प्रतापगढ़ के बंगले में इन्होंने बहुत कुछ सुधार कराकर उसका विस्तार बढ़ाने के अतिरिक्त वहां एक रमणीय उद्यान लगवा दिया है। उद्योग धन्धों की वृद्धि की ओर भी इनकी अधिक रुचि