राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रामसिंहजी ३५७ है। साथ ही समयानुसार शासन-व्यवस्था को उन्नत बनाकर प्रजा का हित- साधन करने की भी इनकी अभिलाषा रहती है । भारत के कई बड़े-बड़े नरेशों और अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ इनका मित्रता का व्यवहार है । विद्वानों और गुणज्ञों से ये प्रसन्नतापूर्वक मिलते हैं और उनका उचित सम्मान भी करते हैं । ये बड़े मातृ-भक्त हैं और सदा अपनी माता शेखावत के सत्परामर्श को ग्रहण करते हैं। राज्य में डाकेज़नी अब बहुत कुछ बन्द हो गई है और राज्य ऋणग्रस्त नहीं है । ये चेम्बर ऑव् प्रिंसेज़ ( नरेन्द्र मण्डल ) के सदस्य हैं और प्रायः वहां के अधिवेशनों में भी सम्मिलित होकर भाग लेते हैं। इसके अतिरिक्त ये मेयोकॉलेज अजमेर की प्रबन्धकारिणी समिति के मेम्बर और बाहर की कई अन्य संस्थाओं के सहायक हैं। वर्तमान यूरोप के युद्ध के आरं- भिक समय में इन्होंने अंग्रेज़ सरकार के प्रति राज-भक्ति प्रकट करते हुए दस सहस्र रुपये और बाद में ५०० पाउण्ड दिये हैं। अपने सामन्तवर्ग, राज-कर्मचारियों आदि के साथ इनका अच्छा व्यवहार है । पारसी सेठ फ़ीरोज़शाह को उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर इन्होंने बरखेड़ा गांव जागीर में दिया है और इसी प्रकार अन्य कई व्यक्तियों को भी समय-समय पर गांव, भूमि, मकान आदि जागीर तथा पुण्य में दिये हैं। महारावतजी की माता शेखावत चांदकुंवरी ने अपने पति स्वर्गीय महाराजकुमार मानसिंह की स्मृति स्थाई रखने के लिए उसके नाम पर “युवराज मानसिंह अनाथालय” का शिलान्यास बीकानेर के महाराजकुमार शार्दूलसिंह-द्वारा ता० १५ दिसम्बर ई० सन् १६४० को करवाया है। इनका क़द मझला, वर्ण गेहुंआ और शरीर की गठन सुडौल है ! हिंसक-जंतुओं के शिकार के समय ये कठिन से कठिन परिश्रम करते हुए भी नहीं थकते हैं।