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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 534 में से

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छोटे पुत्र अमरसिंह के वंशधर वैरीशाल बगड़ावदवाले के पुत्र बुधसिंह को उसने अपना दत्तक बनाया, परंतु उसकी मृत्यु के बाद उसकी गर्भवती स्त्री से उसके पुत्र प्रतापसिंह का जन्म हो गया, जिससे बुधसिंह भांतला के ठिकाने से वंचित रहा और प्रतापसिंह का वहां अधिकार हुआ। प्रतापसिंह का पुत्र लालसिंह, रतलाम इलाक़े के अमरेठा के महाराज सामंतसिंह के हाथ की गोली लगने से मारा गया। तब उस (लालसिंह)- का पुत्र तख़्तसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसकी वि० सं० १६६३ (ई० स० १६०६) में मृत्यु होने पर उसका पौत्र उम्मेदसिंह (पर्वतसिंह का पुत्र) भांतला ठिकाने का स्वामी हुआ, जो वहां का वर्तमान सरदार है। उसने मेयो कॉलेज, अजमेर में शिक्षा प्राप्त की है। उसकी उपाधि "ठाकुर" है।

सालिमगढ़

सालिमगढ़ के सरदार महारावत हरिसिंह के छोटे पुत्र मोहकमसिंह के वंशधर हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। मोहकमसिंह को प्रतापगढ़ राज्य की तरफ़ से जागीर मिली, जिसमें उसके पुत्र मोहनसिंह ने अपने नाम से मोहनगढ़ गांव बसाकर वहां अपन ठिकाना नियत किया, जो सालिमगढ़ के पास एक वीरान गांव है। कई वर्ष तक इस ठिकाने का मुख्य स्थान मोहनगढ़ रहा। मोहनसिंह का पुत्र जोरावरसिंह और पौत्र हिम्मतसिंह हुआ, जिसके दो बेटे उदयसिंह और सरदारसिंह थे, परंतु वे पिता की विद्यमानता में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। अतएव मोहकमसिंह के भाई अमरसिंह के वंशधर, बड़ी-साखथली के ठाकुर दलसिंह का पुत्र मोहबतसिंह गोद जाकर सालिमगढ़ का स्वामी हुआ किन्तु उसके भी संतान नहीं हुई, इसलिए उसने अपने चचेरे

(१) वंशक्रम—[१] मोहकमसिंह [२] मोहनसिंह [३] जोरावरसिंह [४] हिम्मतसिंह [५] मोहबतसिंह [६] सरदारसिंह [७] शिवसिंह [८] खुशहालसिंह और [९] हिंदू सिंह। ४७