राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लगभग महारावत सामन्तसिंह की आज्ञा से पूरावतों को वहां से निकालकर रायपुर पर पीछा अपना क़ब्ज़ा स्थिर किया। दलसिंह की वि० सं० १८८८ (ई० स० १८३१) में मृत्यु होने पर उसका पुत्र केसरीसिंह रायपुर का स्वामी हुआ, पर उसके कोई संतान नहीं हुई, अतएव उसके लघु भ्राता रघु- नाथसिंह का पुत्र हिंदूंसिंह, केसरीसिंह के दत्तक गया। उस (हिंदूंसिंह)- का पुत्र रत्नसिंह (दूसरा) हुआ, किंतु उसके भी संतति न थी, इसलिए उसने उपर्युक्त गुमानसिंह के भाई (बदनसिंह) के वंशधर दुलहसिंह- (पहाड़सिंह का पुत्र) को वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०६) में गोद लिया, जिसको महारावत ने स्वीकार नहीं किया। वि० सं० १६७२ (ई० स० १६१५) में रत्नसिंह का देहांत होने पर रायपुर ठिकाना राज्याधिकार में ले लिया गया, परन्तु फिर महारावत रघुनाथसिंह ने अपनी विशेष कृपा प्रदर्शित करते हुए इस ठिकाने को बनाये रखना स्थिर किया और दुलहसिंह के पुत्र प्रतापसिंह को रायपुर का ठाकुर बनाकर नज़राने के २५००१ रुपये वसूल होने तथा वार्षिक खिराज में ५०० रुपये की वृद्धि करने की आज्ञा दी। वह ३२७५ रुपये वार्षिक खिराज राज्य को देता है। झांतला झांतला के ठाकुर, महारावत जसवंतसिंह के पुत्र केसरीसिंह के वंशज हैं और उनकी उपाधि "ठाकुर" है। महारावत हरिसिंह ने केसरीसिंह को निर्वाह के लिए झांतला की जागीर दी थी। केसरीसिंह के चतुर्थ वंशधर अमानसिंह का पुत्र चिमनसिंह और पौत्र दलेलसिंह था। दलेलसिंह के पीछे उसका पुत्र अजीतसिंह हुआ। वह निःसंतान था, इसलिए महारावत हरिसिंह के (१) वंशक्रम-- [१] केसरीसिंह [२] कुशालसिंह [३] बख़्तसिंह [४] सूरतसिंह [५] अमानसिंह [६] चिमनसिंह [७] दलेलसिंह [८] अजीतसिंह [६] प्रतापसिंह [१०] बाजसिंह [११] तख़्तसिंह और [१२] उम्मेदसिंह।