राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरायपुर ३६७
रायपुर रायपुर के सरदार महारावत विक्रमसिंह के पुत्र सुर्जनदास के बेटे रामदास के वंशधर हैं¹ और उनकी उपाधि “ठाकुर” है। वहां के सरदार को महारावत के दरबार में बांई ओर की प्रथम बैठक तथा ताज़ीम आदि का सम्मान प्राप्त है। रामदास² ने वि० सं० १६६५ (ई० स० १६०८) के लगभग महा- रावत सिंह के राज्यकाल में नीनोर-बोरदिया के निवासी जलखेड़िया राठोड़ों को परास्तकर रायपुर बसाया। रामदास का पुत्र द्वारिकादास वि० सं० १६६२ (ई० स० १६३५) में अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ। उसके छोटे भाई मानसिंह ने मानपुरा और कानसिंह ने कानगढ़ बसाया, जो अब तक उनके वंशजों के अधिकार में है। द्वारिकादास का पुत्र दलपतसिंह³ और इस(दलपतसिंह) का पौत्र गोपालसिंह था, जिसने बोरी-राँछड़ी पर अधिकार किया। उसका पुत्र गुमानसिंह रायपुर का ठाकुर बना, जिसको देवलिया के राज-महलों में पूरावत अक्षयसिंह और हरिसिंह ने मारकर रायपुर पर वि० सं० १८४५ (ई० स० १७८८) के लगभग अपना अधिकार कर लिया। फिर गुमानसिंह के पुत्र दलसिंह ने वि० सं० १८४१ (ई० स० १७८४) के (१) वंशक्रम—[ १ ] सुर्जनदास [ २ ] रामदास [ ३ ] द्वारिकादास [ ४ ] दलपतसिंह [ ५ ] नगसिंह [ ६ ] गोपालसिंह [ ७ ] रत्नसिंह [ ८ ] गुमानसिंह [ ६ ] दलसिंह [ १० ] केसरीसिंह [ ११ ] हिंदू सिंह [ १२ ] रत्नसिंह (दूसरा) और [ १३ ] प्रतापसिंह। (२) रामदास के समय का एक ताम्रपत्र वि० सं० १६८५ माघ सुदि ५ (ई० स० १६२६ ता० १६ जनवरी) सोमवार का मिला है, जिसमें उसकी उपाधि “महाराज” लिखी है एवं उसके पुत्र का नाम कुंवर द्वारिकादास देकर देराश्री जगन्नाथ -शुक्ल को पचास बीघा ज़मीन रायपुर में पुण्य देने का उल्लेख है। (३) "प्रतापप्रशस्ति" खंडित काव्य में कवि कल्याण ने दलपतसिंह का भी उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट है कि वह महारावत प्रतापसिंह का समकालीन था।