राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बहिन चंद्रकुंवरी के साथ संपन्न हुआ। वि० सं० १९६१ माघ वदि ३० (ई० स० १६०५ ता० ४ फ़रवरी) को कुंवरराणी शेखावत के उदर से पुत्र भी उत्पन्न हुआ; किन्तु वह थोड़े ही समय पीछे कालकवलित हो गया। फिर महा- रावत ने महाराजकुमार की शिक्षा समाप्त होने के पीछे उससे शासन-कार्य में योग लेना आरंभ किया और प्रारम्भ में शिक्षा, म्युनिसिपैलिटी, माफ़ी तथा भीतरी सीमा सम्बन्धी निर्णय के कार्य उसको सौंपे गये, जिनका उसने योग्यतापूर्वक सम्पादन किया। शासन संबंधी उपर्युक्त अधिकार पाकर महाराजकुमार ने मनोयोग- पूर्वक उत्तरदायित्व का पालन किया और प्रत्येक कार्य में तत्परता दिख- लाई, जिससे महारावत को उसकी योग्यता का विश्वास हो गया। इसपर महारावत ने अपना पिछला समय ईश्वर भक्ति में लगाने का विचार कर राज्य के कुछ मुख्य अधिकार अपने हाथ में रखकर बाक़ी सारा राज्य- कार्य वि० सं० १९६२ (ई० स० १९०५) में महाराजकुमार को सौंप दिया। उस समय राज्य ऋण-ग्रस्त था। महारावत के पुराने विचार का प्रेमी होने से राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरने न पाई, इस- लिए महाराजकुमार ने शासनाधिकार मिलते ही राज्य को ऋण-मुक्त करने और सालिमशाही सिक्के के परिवर्त्तन से आर्थिक स्थिति गिर रही थी, उसको सुधारने का दृढ़ संकल्प किया। खालसा के गांवों की पैमाइश का कार्य पूरा हो जाने पर लगान निश्चित कर दिया गया। इस ठेकेबंदी की योजना में शिक्षा-वृद्धि की भी पूरी गुंजाइश रखी गई थी, इस- उसका भी असमय देहांत हो गया। उसका अमर स्मारक "सूर्यकुमारी ग्रंथमाला" है, जो काशी की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित होती है। अजीतसिंह की दूसरी राजकुमारी चांदकुंवरी विदुषी, कुशाग्रबुद्धि, सुशील, विनम्र और धर्मपरायण महिला हैं। प्रतापगढ़ राज्य की प्रजा उसके वात्सल्य प्रेम की सराहना करती है। उसकी कोख से वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी बहादुर का जन्म हुआ है, जो अपनी पूजनीय माता के पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए शासन-कार्य चलाते हैं और गंभीर विषयों में सदा राजमाता से परामर्श लेते हैं।