राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत रघुनाथसिंह ३२७
देना एवं उनके अधिकार के बाहर के मुक़दमों को तय करना भी उक्त सभा के ही कार्य थे इस प्रकार न्याय-विभाग पृथक् हो जाने से महकमा ख़ास के सुपुर्द शासन संबंधी आर्थिक और प्रबंध विभाग के कार्य ही रह गये। उस समय नीचे की अदालतों के न्याय संबंधी अधिकार निश्चित नहीं हुए थे। इसलिए न्याय संबंधी कार्य को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए महारावत ने वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६ ) में अपने कामदार रघुवीरसिंह की सम्मति के अनुसार नीचे की अदालतों के निम्नलिखित अधिकार स्थिर किये— ( १ ) हाकिम अदालत फ़ौजदारी क्रिमिनल जज कहलावेगा और उसको मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल के अधिकार होंगे। वह दो साल क़ैद, एक हज़ार रुपये जुरमाना और एक दर्जन बेंत तक की सज़ा दे सकेगा। ( २ ) हाकिम अदालत दीवानी सिविल जज कहलावेगा। वह नक़द रुपये के दावे एक हज़ार तक के सुन सकेगा। हक़ के मुक़दमों में एक सौ रुपये के मूल्य के दावे सिविल जज के यहां दायर होंगे। फ़ैसला सिविल जज राजसभा की मंज़ूरी से जारी होगा। ( ३ ) हाकिम ज़िला केवल ढाई सौ रुपये के दावे सुन सकेगा और हक़ के मुक़दमे पच्चीस रुपये तक के उसके पास दायर हो सकेंगे। वह अपने यहां के मुक़दमे सिविल जज के द्वारा राजसभा में भेजेगा और उनकी अपील का हक़ न होगा। ( ४ ) हाकिम ज़िला को तीसरे दर्जे के मजिस्ट्रेट का अख्तियार दिया जाता है। वह एक मास तक क़ैद और पचास रुपये तक जुरमाने की सज़ा अपने अधिकार से दे सकेगा। उसी वर्ष वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६००) में अल्प वर्षा होने से राजपूताने में भयङ्कर अकाल पड़ा और प्रतापगढ़ राज्य में केवल ग्या- संवत् १६५६ का भयङ्कर रह इंच ही वर्षा हुई, जिनसे अन्न और घास की अकाल पैदावारी कम हुई। इस अवसर पर महारावत ने अपने राज्य में मदद के कई कार्य जारी किये,