भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 393

३२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १६५५ मार्गशीर्ष सुदि ५ (ई० स० १८६८ ता० १८ दिसम्बर) को महारावत का अपने जामाता महाराजा सर महारावत का बीकानेर जाना गंगासिंहजी के आग्रहवश बीकानेर जाना हुआ। तथा कामदार पद पर ठाकुर महाराजा साहब के स्नेहपूर्ण व्यवहार और सम्मान रघुवीरसिंह का नियत होना तथा वहां के शासन में जिन सुधारों का आरंभ हुआ था, उनको देखकर महारावत को पूर्ण संतोष हुआ। इन्हीं दिनों उसने शासन-कार्य चलाने के लिए बीकानेर से ठाकुर रघुवीरसिंह को बुलाकर अपने यहां का कामदार नियत किया। उसी वर्ष (वि० सं० १६५५ = ई० स० १८६८ में) महारावत ने अपने राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने का निश्चय कर अजमेर के रायबहादुर ⸴| सेठ सोभागमल ढड्ढा को सेठ सोभागमल ढड्ढा की, जिसकी व्यापारी-जगत् ख़ज़ांची बनाना में अच्छी साख थी और ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों में कई स्थानों पर बड़ी-बड़ी दुकानें थीं, अपने यहां दुकान खुलवाई तथा उसको प्रतापगढ़ राज्य का ख़ज़ांची नियत किया। उन्हीं दिनों महारावत ने न्याय-विभाग को सुचारु रूप से चलाने के लिए महक्मा खास से उसका संबंध तोड़ दिया और न्याय सम्बन्धी न्याय-विभाग को पृथक् कर अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च अदालत "राजसभा" राजसभा की स्थापना नियत की, जिसकी दो शाखाएं-एक इजलास करना कामिल और दूसरी इजलास मामूली-बनाई गईं। इस राजसभा के सदस्य सरदारों और कर्मचारियों में से योग्यता का विचारकर महारावत-द्वारा नियुक्त होते थे। इजलास कामिल में उक्त सभा के सदस्यों के साथ महारावत स्वयं बैठकर मुक़द्दमों को सुनता और उन- पर उनकी सम्मति लेकर अपना हुक्म देता था। इजलास मामूली में पेश होनेवाले मामलों का निर्णय स्वयं उक्त सभा के सदस्य कर मंज़ूरी के लिए उन्हें महारावत के पास भेज देते थे। नीचे की अदालतों के फ़ैसले की अपील सुनना और नीचे की अदालतों के फ़ैसले की निगरानी की मंज़ूरी