राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास हैं, जिससे गाड़ियों आदि का चलना वन्द रहता है । इस राज्य में अब तक छः बार मनुष्य गणना हुई है । यहां की जन- संख्या ई० स० १८८१ ( वि० सं० १६३७ ) में ७६५६८; ई० स० १८६१ जन-संख्या ( वि० सं० १६४७ ) में ८७६७५; ई० स० १६०१ ( वि० सं० १६५७ ) में ५२०२५; ई० स० १६११ ( वि० सं० १६६७) में ६२७०४; ई० स० १६२१ (वि० सं० १६७७) में ६७११० और ई० स० १६३१ (वि० सं० १६८७) में ७६५३६ थी। ई० स० १६०१ (वि० सं० १६५७) में मनुष्य-संख्या में अधिक कमी होने का कारण वि० सं० १६५६ ( ई० स० १८६६-१६०० ) का भीषण अकाल और उसके बाद दूसरे वर्ष फैलनेवाली हैज़ा आदि बिमारियां थीं । इस राज्य के निवासियों के मुख्य-धर्म वैदिक, जैन और इसलाम हैं । हिंदू (वैदिक) धर्म के माननेवालों में वैष्णव, शैव, शाक्त आदि कई भेद हैं, धर्म जिनमें वैष्णव मतावलंबियों की संख्या अधिक है । जैन धर्म में दिगंबर तथा श्वेतांबर, नामक दो फ़िर्के हैं। श्वेतांबरों में एक फ़िर्का ढूंढ़ियों का है, जो स्थानकवासी कहलाते हैं । प्रतापगढ़ राज्य में दिगंबरों की संख्या अधिक है । भील और मीणे हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं तथा देवी, महादेव, भैरव आदि देवताओं को पूजते हैं। उनका विवाह-संस्कार हिंदू-धर्म की प्रणाली के अनुसार होता है । मुसल- मानों में सुन्नी और शिया नामक दो भेद हैं, जिनमें सुन्नियों की संख्या विशेष है । शिया मत के माननेवाले दाऊदी बोहरे हैं । ईसाइयों की संख्या नाम मात्र की है। हिंदुओं में ब्राह्मण, राजपूत, महाजन, चारण, सुनार, दर्ज़ी, लुहार, सुथार, कुम्हार, माली, गूजर, कुनवी, गाडरी, धाकड़, दरोगा, नाई, धोबी, कोली, मीणे, जातियां भील, बलाई, भांची, ढोली, मेहतर आदि अनेक जातियां हैं । ब्राह्मणों और महाजनों आदि में कई उपजातियां हो गई हैं, जिनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता । ब्राह्मणों की उपजातियों में तो परस्पर खान-पान का संबंध भी नहीं है । मुसलमानों