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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 534 में से

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भूगोल सम्बन्धी वर्णन ७ में शेख़, सैयद, मुग़ल, पठान, रंगरेज़, भिश्ती आदि कई भेद हैं। इस राज्य के निवासियों में लगभग आधे से अधिक लोग खेती का पेशा करते हैं। ब्राह्मण पूजा-पाठ और पुरोहिताई करते हैं, किन्तु कोई- कोई खेती, व्यापार तथा नौकरी भी करते हैं। पेशा राजपूत प्रायः सैनिक-वृत्ति अथवा खेती करते हैं। महाजन तथा बोहरे विशेषतः व्यापार करते हैं। शेष लोग खेती, नौकरी, मज़दूरी, पशुपालन आदि से अपनी जीविका उपार्जन करते हैं। प्रतापगढ़ राज्य के निवासियों में पुरुषों की साधारण पोशाक पगड़ी, कुरता, लंबा अंगरखा और धोती है। नागरिकों में कोट और पायजामा पहनने की चाल बढ़ रही है। ग्रामीण पोशाक तथा मीणे, भील आदि पगड़ी के स्थान पर मोटा वस्त्र, जिसे फेंटा कहते हैं, सिर पर लपेट लेते हैं। शहरों में राजकीय पुरुष पगड़ी, अंगरखा या अचकन तथा पायजामा पहनकर अंगरखे पर कमरबंदा बांधते हैं, परंतु आजकल पगड़ी के स्थान पर साफ़ा या टोपी और अंगरखे के स्थान में कोट का प्रचार बढ़ता जा रहा है। कोई-कोई अंग्रेज़ी टोप का भी व्यवहार करने लगे हैं। बोहरे तथा मुसलमान प्रायः पायजामा पहनते हैं। स्त्रियों की पोशाक में लहंगा, साड़ी और कंचुकी (कांचली) मुख्य हैं। कोई-कोई स्त्रियां कुरती, अंगिया या वास्कट भी पहनती हैं। मीणे, भील, किसान तथा अन्य ग्रामीण लोगों की स्त्रियों के लहंगे कुछ ऊंचे होते हैं। मुसलमानों की स्त्रियां बहुधा पायजामे व तिलक पहनती हैं। बोहरों की स्त्रियां बाहर जाते समय प्रायः लहंगा और दुपट्टा काम में लाती हैं। इस राज्य में बोली जानेवाली मुख्य भाषा मालवी है, जिसे रांगड़ी भी कहते हैं। कुछ लोग वागड़ी तथा भीली भाषा बोलते हैं, जिनका गुजराती से बहुत कुछ संबंध है। कोई-कोई शुद्ध गुजराती भाषा भी बोलते हैं। यहां की प्रचलित लिपि नागरी है। राजकीय अदालतों, महाजनों की बहियों, चिट्ठी-पत्री आदि में इसी लिपि का व्यवहार होता है, किंतु यह