राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
भूगोल सम्बन्धी वर्णन ७ में शेख़, सैयद, मुग़ल, पठान, रंगरेज़, भिश्ती आदि कई भेद हैं। इस राज्य के निवासियों में लगभग आधे से अधिक लोग खेती का पेशा करते हैं। ब्राह्मण पूजा-पाठ और पुरोहिताई करते हैं, किन्तु कोई- कोई खेती, व्यापार तथा नौकरी भी करते हैं। पेशा राजपूत प्रायः सैनिक-वृत्ति अथवा खेती करते हैं। महाजन तथा बोहरे विशेषतः व्यापार करते हैं। शेष लोग खेती, नौकरी, मज़दूरी, पशुपालन आदि से अपनी जीविका उपार्जन करते हैं। प्रतापगढ़ राज्य के निवासियों में पुरुषों की साधारण पोशाक पगड़ी, कुरता, लंबा अंगरखा और धोती है। नागरिकों में कोट और पायजामा पहनने की चाल बढ़ रही है। ग्रामीण पोशाक तथा मीणे, भील आदि पगड़ी के स्थान पर मोटा वस्त्र, जिसे फेंटा कहते हैं, सिर पर लपेट लेते हैं। शहरों में राजकीय पुरुष पगड़ी, अंगरखा या अचकन तथा पायजामा पहनकर अंगरखे पर कमरबंदा बांधते हैं, परंतु आजकल पगड़ी के स्थान पर साफ़ा या टोपी और अंगरखे के स्थान में कोट का प्रचार बढ़ता जा रहा है। कोई-कोई अंग्रेज़ी टोप का भी व्यवहार करने लगे हैं। बोहरे तथा मुसलमान प्रायः पायजामा पहनते हैं। स्त्रियों की पोशाक में लहंगा, साड़ी और कंचुकी (कांचली) मुख्य हैं। कोई-कोई स्त्रियां कुरती, अंगिया या वास्कट भी पहनती हैं। मीणे, भील, किसान तथा अन्य ग्रामीण लोगों की स्त्रियों के लहंगे कुछ ऊंचे होते हैं। मुसलमानों की स्त्रियां बहुधा पायजामे व तिलक पहनती हैं। बोहरों की स्त्रियां बाहर जाते समय प्रायः लहंगा और दुपट्टा काम में लाती हैं। इस राज्य में बोली जानेवाली मुख्य भाषा मालवी है, जिसे रांगड़ी भी कहते हैं। कुछ लोग वागड़ी तथा भीली भाषा बोलते हैं, जिनका गुजराती से बहुत कुछ संबंध है। कोई-कोई शुद्ध गुजराती भाषा भी बोलते हैं। यहां की प्रचलित लिपि नागरी है। राजकीय अदालतों, महाजनों की बहियों, चिट्ठी-पत्री आदि में इसी लिपि का व्यवहार होता है, किंतु यह
८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लिपि घसीट रूप में लिखी जाती है, जिसमें शुद्धता का बहुत कम ध्यान रखा जाता है। कुछ राजकीय दफ़्तरों में अंग्रेज़ी का व्यवहार भी होने लगा है। गांवों में काले और सफ़ेद कंबल तथा मोटी खादी बनाई जाती है। तांबे और पीतल के बर्तन तथा भीलनियों के पहिनने की पीतल की पींजनियां दस्तकारी आदि ज़ेवर भी यहां बहुतायत से बनते हैं। सोने-चांदी के ज़ेवर, लाख, हाथीदांत और नारियल की चूड़ियां, लकड़ी के रंगीन खिलौने, पलंग के शीशम आदि के पाये तथा खिलौने और अन्य सामान यहां अधिकता से बनता है। हरे, लाल और आसमानी रंग के कांच के ऊपर एक प्रकार का सुनहरी काम यहां बहुत ही सुन्दर बनता है, जो भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं बनता। ऐसे काम के बटन, सिगरेट-केस आदि वस्तुएं बनती हैं, जिनपर पौराणिक या शिकार आदि के चित्र अंकित किये जाते हैं और वे सोने में मढ़े जाते हैं। इस काम को करनेवाले यहां चार-पांच परिवार ही हैं, जो दूसरों को यह काम नहीं बतलाते। व्यापार के मुख्य केन्द्र राजधानी के अतिरिक्त अरनोद, कनोरा, कोटड़ी, रायपुर और सालिमगढ़ हैं। राज्य में बाहर से आनेवाली वस्तुएं व्यापार नमक, कपड़ा, शकर, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, तंबाकू, नारियल, मसाला, चावल, गुड़, सूखा मेवा, सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा आदि धातुएं, कांच तथा चीनी का सामान, हाथीदांत, मोटर, साइकिलें आदि हैं। राज्य से बाहर जानेवाली वस्तुओं में रूई, अफ़ीम, अन्न, तिल, अलसी, सुवा, सरसों, गुड़, घी, इमारती लकड़ी, लकड़ी के खिलौने, चमड़ा आदि मुख्य हैं। पहले यहां अफ़ीम का व्यापार बहुत था, परंतु अब अफ़ीम का सारा व्यापार अंग्रेज़-सरकार के नियन्त्रण में होने से उठ गया है। बंबई, इंदौर, रतलाम, मंदसोर, नीमच, वागड़ (डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य) और मेवाड़ आदि से यहां का व्यापारिक संबंध है।
भूगोल सम्बन्धी वर्णन ६ हिंदुओं के त्योहारों में होली, गनगौर, रक्षाबंधन, तीज, दशहरा और दीवाली मुख्य हैं। रक्षाबन्धन विशेषतः ब्राह्मणों और दशहरा राजपूतों का त्योहार है। दशहरे के अवसर पर महारावतजी की त्योहार सवारी धूमधाम से निकलती है। दीवाली व्यवसायी- वर्ग का त्योहार है, परंतु उसे सब हिंदू समानता से मनाते हैं। होली भी सब वर्गों का त्योहार है और सब जातियों के लोग फाग खेलते हैं। भीलों के त्योहारों में होली, दशहरा और दीवाली मुख्य हैं। गनगौर और तीज स्त्रियों के त्योहार हैं। मुसलमानों के त्योहार दोनों ईदें—‘इदउलफ़ितुर’ और ‘इदुलजुहा’—तथा मोहर्रम (ताज़िये) हैं। अरणोद के पास गौतमनाथ महादेव का मेला वैशाख सुदि १५ से दो दिन तक प्रति वर्ष होता है। अंबा माता (प्रतापगढ़ से ४ मील उत्तर) का मेला प्रति वर्ष कार्तिक सुदि २ को होता है, जहां मेले बहुत से यात्री जाते हैं। सीतामाता का मेला प्रत्येक तीसरे वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में होता है। इस राज्य में अंग्रेज़ी डाकखाने प्रतापगढ़, देवलिया, अरणोद, नीनोर और जाजली में हैं। तारघर केवल प्रताप- डाकखाने और तारघर गढ़ में ही है। पहले राज्य की ओर से शिक्षा का कोई प्रबंध न था, जिससे लोग पंडितों, जैन यतियों तथा अन्य घरू पाठशालाओं में अपने बालकों को शिक्षा दिलाते थे। अब राज्य की तरफ़ से प्रतापगढ़ शिक्षा और देवलिया के अतिरिक्त वसाड़, केरोट (खेरोट), धामल्या, गंधेर, पानमोड़ी, दलोठ, कोटड़ी, नीनोर, वरमंडल, पीलू, कुणी, अवलेसर, नौगामा, कुलथाना, चूंLoopना, अमलावद, सरीपीपली तथा पारल्या में राज्य की तरफ़ से प्रारम्भिक पाठशालाएं खोल दी गई हैं। धमोतर, बारेवरदा, अरणोद, सालिमगढ़ और डोराना में सरदारों की तरफ़ से पाठशालाएं हैं, जहां प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है। राजधानी प्रतापगढ़ में एक हाईस्कूल है और संस्कृत की ज्ञानवृद्धि के लिए पृथक् पाठशाला २
१० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भी है, जहां 'आचार्य' कक्षा तक की पढ़ाई होती है। उसका संबंध बनारस के गवर्नमेंट संस्कृत कालेज से है। कन्याओं की शिक्षा के लिए राजधानी में कन्या पाठशाला है। सार्वजनिक हित की दृष्टि से एक पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना भी हो गई है। इस राज्य में पहले रोगियों का इलाज वैद्य, हकीम, जर्राह तथा अन्य अनुभवी लोगों-द्वारा होता था। ग्रामीण जनता अपनी चिकित्सा अपने- अस्पताल अपने अनुभव की औषधियों-द्वारा करती थी। कई वर्षों से राज्य ने जनता के हितार्थ राजधानी प्रतापगढ़ और देवलिया में अस्पताल खोल दिये हैं, जहां चीर-फाड़ एवं बड़े-बड़े रोगों का इलाज होता है। राजधानी प्रतापगढ़ में स्त्रियों की चिकित्सा के लिए पृथक् अस्पताल भी बन गया है एवं देशी दवाखाना भी खोल दिया गया है। इनके अतिरिक्त वहां सेठ घासीलाल पूनमचंद की तरफ़ से भी एक अंग्रेज़ी दवाखाना चल रहा है। प्रतापगढ़ राज्य में शीतला से बालकों आदि को बचाने के लिए सर्वत्र टीका लगाने की व्यवस्था की गई है। गांवों में घूम-घूमकर रोगियों की चिकित्सा करने के लिए राज्य ने एक डाक्टर और वैद्य भी नियत कर दिया है। रायपुर के ठिकाने में एक छोटा अस्पताल है, जो वहां के ठाकुर-द्वारा चलाया जाता है। वर्तमान महा- रावतजी का इस ओर पूरा ध्यान होने से धमोतर और अरनोद में भी दवाखाने खोलने की व्यवस्था की जा रही है। पाठशालाओं के अध्यापकों- द्वारा भी गांवों में बुखार, खांसी आदि की औषधियां राज्य वितीर्ण कराता रहता है, जिससे ग्रामीण जनता का कष्ट बहुत कुछ कम हो गया है। राज्य-प्रबंध की सुविधा के लिए पहले इस राज्य के पांच विभाग किये गये थे, जो प्रतापगढ़, कन्तोरा, बजरंगगढ़, साखथली और मगरा ज़िले कहलाते थे; किन्तु बाद में उनकी संख्या ज़िले घटाकर हथूनिया, साखथली और मगरा नामक तीन ज़िले ही रखे गये। ई० स० १९०५ (वि० सं० १९६२) में मगरा और प्रतापगढ़ दो ही ज़िले रह गये। तत्पश्चात् ई० स० १९०६ (वि० सं० १९६३)
भूगोल सम्बन्धी वर्णन ११ में मगरा ज़िले के लिए एक नायब नियत कर देवलिया में रखा गया और वह ज़िला प्रतापगढ़ के अन्तर्गत कर दिया गया। फिर ख़ालसे की समस्त भूमि का माली प्रबंध एक पृथक् अफ़सर बनाकर उसके अधीन कर दिया गया, जो 'रेवेन्यु अफ़सर' कहलाता है। रेवेन्यु अफ़सर को जुडिशियल मामलों में द्वितीय श्रेणी के मैजिस्ट्रेट के अधिकार प्राप्त हैं। कार्य की सुविधा के लिए गांवों में पटवारो तथा क़ानूनगो मुक़र्रर कर दिये गये हैं। इस राज्य में पहले न्याय प्राचीन प्रणाली से होता था। फिर क्रमशः उसमें वर्तमान शैली के अनुसार परिवर्त्तन किये गये । छोटे-छोटे दीवानी न्याय मामलों के दो सौ रुपये तक के दावे सुनने का अधिकार स्मॉल काज़ कोर्ट बनाकर उसे दे दिया गया है, जिनकी अपील नहीं होती; परन्तु निगरानी हाई कोर्ट में होती है। दो सौ रुपये से ऊपर दस हज़ार अथवा उससे अधिक के दावे अदालत दीवानी में सुने जाते हैं और उनकी अपील सेशन जज के पास होती है। सेशन जज के किये हुए फ़ैसलों की अपील हाई कोर्ट में होती है। फ़ौजदारी मामले में एक हज़ार रुपया जुरमाना और दो वर्ष तक क़ैद की सज़ा देने का अधिकार प्रथम श्रेणी के मैजिस्ट्रेट को है। उसकी अपील सेशन कोर्ट में होती है। प्राण-दंड और देश-निर्वासन तक की सज़ा देने का अधिकार सेशन जज को है। उसकी अपील हाई कोर्ट में होती है और महारावतजी साहब की आज्ञा होने पर ही प्राण दंड और निर्वासन की सज़ा दी जाती है। ई० स० १८४४ (वि० सं० १९५१) के इक़रारनामे के अनुसार धमोतर, राय- पुर, कल्याणपुरा, भांतला, घरडिया, आंबीरामा, अचलावदा, अरनोद और सालिमगढ़ के ठिकानों को दीवानी तथा फ़ौजदारी के नियत अधिकार प्राप्त हैं। वि० सं० १६७७ ( ई० स० १६२० ) में महारावत रघुनाथसिंह ने बोड़ी साखथली के ठाकुर को और वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने जाजली के ठाकुर को भी नियत अधिकार दे दिये हैं, जिससे इस समय न्याय सम्बन्धी अधिकारवाले वहां ११
१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठिकाने हैं। राज्य की भूमि खालसा, शासन और जागीर नामक तीन भागों में बंटी हुई है। खालसा की भूमि की सारी आय राज्य लेता है। देव मंदिरों, [शासन, जागीर और भोम आदि] ब्राह्मणों आदि को पुण्य में दी हुई भूमि और गांव एवं चारणों और भाटों को दिये हुए गांव आदि शासन के अन्तर्गत है। इनका हासिल आदि राज्य वसूल नहीं करता और वे ही लोग लेते हैं, जिनके पूर्वजों आदि को वह भूमि और गांव मिले हुए हों। जागीरदारों को जागीर की भूमि और गांव पूर्वकाल में की हुई उनकी सेवाओं के उपलक्ष्य में अथवा महारावत के निकट के सम्बन्धी होने से दिये गये हैं। जागीरदारों में राजपूत जागीरदार मुख्य हैं। उनके अतिरिक्त राज्य के कुछ कर्मचारी भी हैं, जिनको उनकी अच्छी सेवाओं के पुरस्कार में जागीरें दी गई हैं। उनमें ब्राह्मण, महाजन, धायभाई आदि हैं। जागीरदारों से जागीर के एवज़ में नियत खिराज और सेवा ली जाती है। कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनसे खिराज अथवा नौकरी नहीं ली जाती। राजपूत जागीरदारों की वहां तीन श्रेणियां हैं। प्रथम श्रेणी के जागीरदार, 'उमराव-नगारवन्द' कहलाते हैं, जिनकी संख्या वर्तमान समय में ११ है—धमोतर, कल्याणपुरा, रायपुर, अरगोद, झांतला, वरडिया, सालिमगढ़, अचलावदा, आंधीरामा, बोड़ी साखथली और जाजली। दूसरी श्रेणी के सरदार ताज़ीमी कहलाते हैं, जिनका वर्णन सरदारों के प्रसङ्ग में किया जायगा। तीसरी श्रेणीवाले ग़ैर-ताज़ीमी कहलाते हैं। राजपूत जागीरदारों को प्रतिवर्ष नियमित रूप से खिराज देने के अतिरिक्त नियत अवधि तक स्वयं नौकरी में जमीयत के साथ दशहरे पर उपस्थित होना पड़ता है। इनके अतिरिक्त विशेष अवसरों पर जब राज्य चाहे, उनको जाना पड़ता है। किसी सरदार की मृत्यु पर जब नया सरदार होता है, तो राज्य में उसको तलवारबंदी का नज़राना दाख़िल करना
१. बाप्पा रावल व गुहिल वंश की स्थापना
पड़ता है। ठिकानों का प्रबंध ठीक न हो अथवा महारावत तथा राज्य के विरुद्ध उनका आचरण हो तो उनकी जागीरें ज़ब्त भी हो जाती हैं। जागीरदार बिना महारावत की आज्ञा के दत्तक नहीं ले सकते। जागीरदारों तथा माफ़ीदारों को अपनी भूमि राज्य की आज्ञा के बिना रेहन रखने और बेचने का अधिकार नहीं है। इस राज्य में २४ सवार, १४८ पैदल और १३ गोलंदाज़ सैनिक हैं। इनके अतिरिक्त १७८ पुलिस के सिपाही आदि हैं, जो राजधानी के प्रबंध सेना और पुलिस आदि : के अतिरिक्त थानों आदि पर नौकरी देते हैं। आवश्यकता होने पर जागीरदारों की जमीयतें भी सैनिक-सेवा का कार्य करती हैं। प्रतापगढ़ राज्य की वार्षिक आय लगभग छः लाख रुपये है और उतना ही व्यय है। आय के मुख्य सीगे ज़मीन का हासिल, चुंगी (दाण), आय-व्यय : जागीरदारों का ख़िराज, मादक द्रव्यों की बिक्री (आवकारी), अफ़ीम का मुनाफ़ा, स्टाम्पं, कोर्ट- फ़ीस, जंगल आदि हैं। व्यय के मुख्य सीगे हाथ-खर्च, महलों के ख़र्च, सरकारी कर, राज्य-प्रबन्ध, सेना, पुलिस, पब्लिक वर्क्स, शिक्षा, अस्प- ताल आदि हैं। आधुनिक परिपाटी पर राज्य-प्रबन्ध हो जाने के कारण आय के साधन अधिक विस्तृत होते जाते हैं। आय-व्यय का बजट प्रति- वर्ष बनता है। राज्य का पहले कोई स्वतन्त्र सिक्का नहीं था। वहां मांडू और गुजरात के सुलतानों के सिक्के चलते थे। बादशाह अकबर ने मालवा और सिक्का : गुजरात के राज्य दिल्ली के साम्राज्य में मिला लिये, तब से वहां मुग़लकालीन सिक्कों का प्रचलन हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की अवनति के दिनों में राजपूताने के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ के स्वामी महारावत सालिमसिंह ने भी बादशाह शाह आलम (दूसरा, ई० स० १७५६-८८ = वि० सं० १८१६-४२) के समय उक्त बादशाह के नाम के चांदी के सिक्के बनाने के लिए प्रतापगढ़ में टकसाल
१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास खोली। इन सिक्कों के एक तरफ़ 'सिक्कह् मुबारक बादशाह गाज़ी शाह आलम सन् ११६६' और दूसरी तरफ़ 'ज़र्बे..................२५ जुलूस मैमनत मानूस' फ़ारसी में खुदा है, जिसका अर्थ है उक्त सिक्का बादशाह शाह आलम दूसरे के राज्य-समय (भिन्न-भिन्न जुलूसी सनों में) बना। शाह आलम के अपभ्रंश रूप से यह सिक्का पुराना सालिमशाही (शाह आलम शाही) कहलाता है। आम तौर से लोग इसको महारावत सालिम- सिंह के नाम का सिक्का मानते हैं, परन्तु सिक्के पर सालिमसिंह का नाम नहीं है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, झालावाड़ और नींवाहेड़ा के कुछ परगनों तथा मध्यभारत के रतलाम, जावरा, सीतामऊ एवं ग्वालियर के मंदसोर ज़िले के कुछ भागों में भी इस सिक्के का चलन था। ई० सं० १८१८ (वि० सं० १८७५) में ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि होने के पीछे ठप्पे में से शाह आलम का नाम निकलवाकर नीचे लिखा हुआ लेख रखा गया, परन्तु उसमें सन् हिजरी ही रहा- 'सिक्का मुवारिक शाह लंदन, १२३६' (ई० स० १८२०)। यह सिक्का नया सालिमशाही कहलाता है। फिर इस नये सिक्के की अठन्नी, चवन्नी और दुअन्नी भी बनने लगीं, किंतु इस नवीन सिक्के में पुराने सिक्के की अपेक्षा चांदी की मात्रा कम रही। प्रतापगढ़ राज्य के आस-पास के राज्यों में अंग्रेज़ी सिक्के का प्रचार बढ़ने पर सालिमशाही सिक्के का मूल्य घटता गया और वह कलदार अठन्नी के बराबर रह गया। ई० स० १६०४ (वि० सं० १६६१) से इस सिक्के का चलन बन्द होकर अंग्रेज़ सरकार के कलदार रुपयों का चलन आरंभ हुआ और सालिमशाही रुपये चांदी के भाव में दे दिये गये। प्रतापगढ़ में पहले तांबे के सिक्के भी बनते थे, जिनमें एक तरफ़ 'श्री' के नीचे 'रियासत देवलिया सं० १६३५' और दूसरी तरफ़ बिंदियां तथा बिंदियों से बना हुआ एक अस्पष्ट चिह्न है। उसके पीछे के तांबे के सिक्कों में एक तरफ़ रियासत प्रतापगढ़ तथा मध्य में संवत् १६४३ है और दूसरी तरफ़ दो तलवारों के बीच में सूर्य का चिह्न अंकित है।
भूगोल सम्बन्धी वर्णन १५ इस राज्य को अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से पंद्रह तोपों की सलामी प्राप्त है और वाइसरॉय की मुलाक़ात के अवसर पर वाइसरॉय का वापसी तोपों की सलामी और मुलाक़ात के लिए महारावत के यहां जाने का ख़िराज दस्तूर है। यहां से पहले ७२७०० रुपये सालिम- शाही अंग्रेज़-सरकार को ख़िराज के दिये जाते थे। फिर कलदार का चलन होने पर ३६३५० रुपये कलदार वार्षिक ख़िराज के दिये जाने लगे। वर्तमान समय में २७५०० रुपये कलदार वार्षिक 'कैश कंट्रीब्यूशन' के नाम से अंग्रेज़ सरकार को दिये जाते हैं। प्रतापगढ़ राज्य में कितने ही प्रसिद्ध और प्राचीन स्थान हैं। उनमें प्रसिद्ध और प्राचीन स्थान से मुख्य-मुख्य का यहां पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है— देवलिया—प्रतापगढ़ से पश्चिम ८ मील की दूरी पर पहाड़ी प्रदेश में समुद्र की सतह से १८०६ फुट की ऊंचाई पर देवलिया का क़सबा बसा हुआ है। पहले इस राज्य की राजधानी देवलिया होने से यह 'देवलिया राज्य' कहलाता था। प्रतापगढ़ में राजधानी स्थिर होने से अब यह 'प्रतापगढ़ राज्य' कहलाने लगा है, तो भी आम बोल-चाल में अब तक इस राज्य को 'देवलिया-प्रतापगढ़' कहते हैं। संस्कृत पुस्तकों और शिलालेखों में इसके नाम 'देव दुर्ग', (१) संमत (सम्वत्) १७०७ वर्षे शाके १५७२ प्रवर्तमाने उत्तरा- यणगते श्रीसूर्ये वैशाखमासे शुक्लपक्षे पूर्ण(र्णि)मास्यां तिथौ गुरुवासरे मालवखंडेश्वरमहाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहजीविजयराज्ये देवदुर्गराज- धान्यां......॥ देवलिया के गोवर्द्धननाथ के मन्दिर की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से। श्रीचित्रकूटेश्वरराण ( ? भ्रात ) खेमासुतोऽभवद्रावतसूर्य्यमल्लः । तस्याष्टमः श्रीहरिसिंहदेवो राजेश्वरो राजति देवदुर्गे ॥ ३ ॥ वही।
१६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास 'देवल पत्तन', 'देवगिरि²' और 'देवगढ़³' भी मिलते हैं । महारावत ˙˙˙अत्युग्रधामा जगदेकनामा तस्मादभूच्छ्रीहरिसिंहदेवः । श्रीदेवदुर्गस्य विराजमाने सिंहासने राजति तत्तनुजः ॥ महारावत प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ के पाटण्यां गांव के संस्कृत ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । ( १ ) तस्मिन् देवलपत्तने परिलसत्युच्चैः स्फुरद्गोपुरं नानामङ्गलतूर्यनादनिर्वहैः संलक्षितं सर्वतः ॥˙˙˙५ ॥ यस्मिन् देवलपत्तने परिलसत्यभ्रंलिहोऽट्टालिका नृत्यन्त्यः प्रमदाः परं विदधते तत्राप्सरः संभ्रमम् । ˙˙˙८ ॥ गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्यम्, सर्ग १ । ( २ ) पुराऽऽसकर्णः किल रावलोभूतप्रतापसिंहेन युयोध यत्र । वंशालयाधीश्वरधर्मबन्धुः समागतो देवगिरेर्महीशः ॥ ३ ॥ वही; सर्ग ६ । ( ३ ) ˙˙˙संवत् १७७२ वर्षे माघसुदि १३ श्रीदेवगढ़नगरे महा- रावत श्रीश्रीपृथ्वीसिंहजी विजयराज्ये˙˙˙˙˙˙ ॥ देवलिया के पार्श्वनाथ के मन्दिर की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से । ˙˙˙संवत् १७७४ वर्षे शाके १६३६ प्रवर्तमाने माह(घ) सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढ़नगरे महाराजधान्यां महाराजाधिराजमहारावतश्रीप्रथवीसिंहजी- विजयीराज्ये कुंवरश्रीपहाड़सिंहविराजमाने˙˙˙ । वही । ˙˙˙संवत् १७८८ वर्षे शाके १६५३ प्रवर्तमाने दक्षिणगोले उत्तरायणगते श्रीसूर्ये शिशिरऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे मासे माघ- मांसे शुक्लपक्षे ६ तिथौ शुक्रवा[स]रे कायठलदेशे देवगढ़नगरे महाराजधान्यां सूर्यवंशे महाराजाधिराजमहारावतश्रीगोपालसिंहजीविराज- माने˙˙˙ । देवलिया की ताबूंतों की बावड़ी की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से ।
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देवलिया के राजमहल
भूगोल सम्बन्धी वर्णन १७ विक्रमसिंह (बीका) ने मेवाड़ छोड़ने के पीछे इधर आकर मीणों का दमन किया और प्रसिद्ध है कि वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवलिया का क़सबा बसाकर वहां अपनी राजधानी स्थिर की¹। पहले इसके पूर्व-दक्षिण और पश्चिम के कुछ अंशों में दीवार बनी हुई थी, परंतु अब वह गिर गई है। युद्ध के अवसर पर यह स्थान सुरक्षित समझा जाता था, क्योंकि इसके चारों तरफ़ पहाड़ियां आ गई हैं और बीच में एक ऊंची पहाड़ी पर यह बसा हुआ है। यहां पुराने राज-महल हैं। भूत-पूर्व महारावत (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों तथा उनके आधार पर बने हुए राजपूताना के गैजेटियर एवं अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों में महारावत विक्रमसिंह (बीका) का वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवी मीणी के नाम पर देवलिया का क़सबा बसाने का उल्लेख है, परन्तु यह विश्वास-योग्य नहीं है। कर्नल टॉड लिखता है—"महारावत सूरजमल सादड़ी छोड़कर कांठल की तरफ़ बढ़ा, तब मार्ग में उसको कांठल के जंगल में एक स्थान पर यह दृश्य दीख पड़ा कि एक भेड़िया बकरी के बच्चे को उठाकर ले जाना चाहता है, किन्तु उसकी मा बार-बार प्रयत्न कर उसको उसके पंजे से बचाती है। निदान उसने उस स्थान को सब प्रकार से सुरक्षित समझ वहां पर अपना निवास रखना स्थिर किया और आस-पास के मीणों का दमन कर वहां देवलिया का क़सबा बसाया। चारणी की भविष्यवाणी के अनुसार फिर वह आस-पास के गांवों को दबाकर एक हज़ार गांवों का स्वामी हो गया और उसने अपने बाहुबल से अपने वंशजों के लिए स्वतन्त्र राज्य बना लिया, जो देवलिया-प्रतापगढ़ राज्य कहलाता है (जि० १, पृ० ३४७ क्रुक-संपादित) ।" ऊपर आई हुई भेड़िये और बकरी के बच्चे की कथा काल्पनिक है। ऐसी कथाएं ख्यातों आदि में अनेक स्थानों के सम्बन्ध में मिलती हैं, परन्तु वे विश्वास के योग्य नहीं है। उपर्युक्त कथन से इतना स्पष्ट है कि देवलिया का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था। उसका मेवाड़ की सीमा पर के कांठल प्रदेश पर अधिकार होने से चारणी देवी की भविष्यवाणी सत्य हुई, जिससे अनुमान होता है कि उसने देवी की स्मृति में वहां क़सबा आबाद कर उसका नाम देवलिया रक्खा। सूरजमल के पीछे बाघसिंह और रायसिंह, सादड़ी में ही रहे। वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) के लगभग रावत विक्रमसिंह ने सादड़ी की जागीर का परित्याग कर देवलिया को ही अपनी राजधानी नियत किया, जो महारावत दलपतसिंह के समय तक बनी रही। इससे ख्यात-लेखकों ने इस क़सबे का विक्रमसिंह (बीका)-द्वारा आबाद होना मान लिया। वस्तुतः देवलियां का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था और उसकी उन्नति विक्रमसिंह के समय में हुई। ३
१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
रघुनाथसिंह को प्रतापगढ़ की अपेक्षा यह स्थान अधिक पसंद था, इसलिए उसने यहां कुछ नये मकान बनवाये और पुराने महलों की मरम्मत करवा दी; क्योंकि वह स्वयं भी यहां रहा करता था। यहां कई तालाब हैं, जिनमें 'तेजसागर' (तेजोला) तालाब महारावत तेजसिंह का बनवाया हुआ है। उसके पास ही प्रतापगढ़ के नरेशों की श्मशान-भूमि है, जहां कई स्मारक छत्रियां बनी हुई हैं। तेजसागर के समीप ही एक हम्माम (स्नानागार) बना हुआ है, जिसके लिए ऐसी प्रसिद्धि है कि महारावत सिंहा के समय बादशाह जहांगीर की अप्रसन्नता से उसका सेनापति महावतखां, जब देवलिया में रहा था, उस समय वह बनवाया गया था। वहीं महारावत दलपतसिंह का बनवाया हुआ सोनेला तालाब है, जिसके बीच में उक्त महारावत का बनवाया हुआ छोटासा महल भी है। इस तालाब और महल को बनवाकर उक्त महारावत ने वि० सं० १६०४ (ई० स० १८४७) में उसकी प्रतिष्ठा की और उस अव- सर पर उसने चारण लखमणदान को लाख पसाव भी दिया। देवलिया में कई वैष्णव, शैव और जैन मंदिर हैं, परंतु वे सब इस क़सबे के आबाद होने के पीछे के बने हुए हैं। विष्णु के मंदिरों में गोवर्धननाथ का मंदिर महारा- वत हरिसिंह का बनवाया हुआ है और वहां वि० सं० १७०७ (ई० स० १६५०) की प्रशस्ति लगी है। महारावत सामंतसिंह का बनवाया हुआ यहां रघु- नाथ-द्वारा नामक विष्णु-मंदिर है, जिसके प्रबंध के लिए राज्य की तरफ़ से लगभग पांच हज़ार रुपये वार्षिक आय के गांव हैं और उक्त मंदिर का प्रबंध वहां के महंत के अधिकार में है, जिसकी प्रतिष्ठा इस राज्य में सर्वोपरि है। इस राज्य में इससे बड़ी आय का कोई राजकीय देव-मंदिर नहीं है। जैन मंदिरों में अधिकांश दिगंबर-संप्रदाय के हैं, जिनमें वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के पूर्व का कोई लेख नहीं है। यहां पाठशाला, अस्पताल तथा पोस्ट ऑफ़िस भी हैं और प्रतापगढ़ से देवलिया तक टेली- फोन भी लगा दिया गया है। पहले यहां अच्छी बस्ती थी, परंतु अब कम होती जाती है। प्रतापगढ़-देवलिया का जलवायु आरोग्यप्रद न होने से समथल प्रदेश :
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उदयनिवास महल, प्रतापगढ़
में, जहां पहले घोघेरिया खेड़ा ( डोडेरिया का खेड़ा ) नामक गांव था, प्रताप- गढ़ नामक क़सबा महारावत प्रतापसिंह ने वि० सं० १७५५ (ई० स० १६९८) में आबाद किया, जो इस समय इस राज्य का मुख्य क़सबा और राजधानी है । बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे की मालवा लाइन के मंदसोर स्टेशन से २० मील दूर पश्चिम में स्थित प्रतापगढ़ का क़सबा समुद्र की सतह से १६६० फुट की ऊंचाई पर है। वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने इसके चौतरफ़ कोट बनवाया, जिसके सूरजपोल, भाटपुरा दरवाज़ा, बारी दरवाज़ा, देवलिया दरवाज़ा और धमोतर दरवाज़ा नामक ६ दरवाज़े हैं। इन दरवाज़ों के अतिरिक्त दो छोटे द्वार तालाब बारी और क़िला बारी भी हैं। आबादी के बीच में पश्चिम की तरफ़ महारावत के पुराने महल बने हुए हैं, जिनमें सरकारी दफ़्तर हैं तथा क़सबे के बाहर पश्चिम में क़िला बना हुआ है, जिसमें सामने की तरफ़ महारावत उदयसिंह का बनवाया हुआ 'उदयविलास' महल है। प्रतापगढ़ में हिंदू और जैन सम्प्रदायों के कई मंदिर हैं, परंतु वे अठारहवीं शताब्दी से पुराने नहीं है। यहां अंग्रेज़ी की उच्च शिक्षा के लिए 'पिन्हे हाईस्कूल' है, जिसमें मैट्रिक तक की शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त संस्कृत-पाठशाला, राजकीय प्राइमरी स्कूल, कन्या-पाठशाला, ज़नाना-अस्पताल, रघुनाथ हॉस्पिटल, घासीराम डिस्पेंसरी, देशी दवाख़ाना, पोस्ट ऑफ़िस तथा तारघर, वाचनालय, धर्मशाला, उद्यान आदि लोकोपयोगी संस्थायें विद्यमान हैं। आबादी के बाहर महा- रावत उदयसिंह की बनवाई हुई कंपू (कैंप) कोठी बनी हुई है, जिसकी महारावत रघुनाथसिंह के समय महाराजकुमार मानसिंह ने बहुत कुछ अभि- वृद्धि की थी। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वहां और भी नवीन भवन बनवाकर सुन्दर बगीचा लगवा दिया है, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई है। अपने राज्याभिषेक के पीछे इन्होंने उसी स्थल को अपना निवास- स्थान बना लिया है, जिससे उसकी और भी उन्नति होने की आशा है। जानवरों से प्रेम होने के कारण कंपू-कोठी में इन्होंने जानवरों का छोटासा संग्रहालय बना रक्खा है, जो देखने योग्य है। कंपू कोठी के समीप सरकारी
२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दफ़्तर भी हैं, और उसके सामने मेहमानों के ठहरने के लिए 'अतिथि-गृह' ( Guest House ) बना हुआ है। नगर की स्वच्छता का प्रबन्ध म्यून्सि- सिपैलिटो-द्वारा होता है। यहां छापाखाना, बिजली घर, कॉटन प्रेस तथा जिनिंग फ़ैक्टरी भी हैं। यहां की दस्तकारी में हरे रंग के कांच पर सुनहरी मीनाकारी का काम प्रसिद्ध है। इस राज्य में सागवान की लकड़ी की बहु- तायत होने से मकानों आदि के बनाने में उसका प्रचुरता से इस्तेमाल होता है। प्रतापगढ़ से दक्षिण की तरफ़ पहाड़ी नाले में तालाब के पीछे दीपनाथ महादेव का मन्दिर है, जिसको महारावत सामन्तसिंह के कुंवर दीपसिंह ने बनवाया था। वहां का दृश्य मनोहर है। वहां और भी कई मन्दिर तथा देवकुलिकाएं हैं, जिनपर वृक्षों का सुन्दर झुरमुट है। कार्तिक सुदि १५ को प्रति वर्ष वहां मेला भरता है। उसके पास ही राजकीय श्मशान है, जहां महारावत उदयसिंह तथा महाराजकुमार मानसिंह की स्मारक छत्रियां हैं। ई० स० १६३१ ( वि० सं० १६८७ ) की मनुष्य-गणना के अनुसार प्रतापगढ़ क़सबे की जन संख्या १०८४५ है। जानागढ़—प्रतापगढ़ से लगभग १० मील दूर दक्षिण-पश्चिम के पहाड़ी प्रदेश में जानागढ़ नामक पुराना क़िला है, जिसमें एक मसजिद, हम्माम और अस्तवल बना हुआ है। ऐसी प्रसिद्धि है कि जानआलम नामक कोई मुसलमान शाहज़ादा यहां रहा था और उसने ही यह क़िला तथा अन्य स्थान बनवाये थे। यहां कोई शिलालेख न होने से यह कहना कठिन है कि यह क़िला कब बना और जानआलम कहां का था। इसके आस-पास भीलों और मीणों की थोड़ीसी वस्ती है। गौतमेश्वर के वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून ) के शिलालेख' से अनुमान होता है ( १ ) संवत् १५६२ वासठा विषे (वर्षे) आसा (षा) ढ वदि १४ वा...; ...पातसा (शा) ह श्रीनासीरसा (शा) हविजयराज्ये ...... श्रीषां (खां) नः आजम मकबेलषां (खां) न मुकतकले गयासगीर मुतालिक सा (शा) ह जोइ (जय) चंद दामा देवश्रीगौतमेसर मुगतो कराय्यो जे काइ कर लागतो
प्रतापगढ़ के प्राचीन महल ५.
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