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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ठिकाने हैं। राज्य की भूमि खालसा, शासन और जागीर नामक तीन भागों में बंटी हुई है। खालसा की भूमि की सारी आय राज्य लेता है। देव मंदिरों, [शासन, जागीर और भोम आदि] ब्राह्मणों आदि को पुण्य में दी हुई भूमि और गांव एवं चारणों और भाटों को दिये हुए गांव आदि शासन के अन्तर्गत है। इनका हासिल आदि राज्य वसूल नहीं करता और वे ही लोग लेते हैं, जिनके पूर्वजों आदि को वह भूमि और गांव मिले हुए हों। जागीरदारों को जागीर की भूमि और गांव पूर्वकाल में की हुई उनकी सेवाओं के उपलक्ष्य में अथवा महारावत के निकट के सम्बन्धी होने से दिये गये हैं। जागीरदारों में राजपूत जागीरदार मुख्य हैं। उनके अतिरिक्त राज्य के कुछ कर्मचारी भी हैं, जिनको उनकी अच्छी सेवाओं के पुरस्कार में जागीरें दी गई हैं। उनमें ब्राह्मण, महाजन, धायभाई आदि हैं। जागीरदारों से जागीर के एवज़ में नियत खिराज और सेवा ली जाती है। कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनसे खिराज अथवा नौकरी नहीं ली जाती। राजपूत जागीरदारों की वहां तीन श्रेणियां हैं। प्रथम श्रेणी के जागीरदार, 'उमराव-नगारवन्द' कहलाते हैं, जिनकी संख्या वर्तमान समय में ११ है—धमोतर, कल्याणपुरा, रायपुर, अरगोद, झांतला, वरडिया, सालिमगढ़, अचलावदा, आंधीरामा, बोड़ी साखथली और जाजली। दूसरी श्रेणी के सरदार ताज़ीमी कहलाते हैं, जिनका वर्णन सरदारों के प्रसङ्ग में किया जायगा। तीसरी श्रेणीवाले ग़ैर-ताज़ीमी कहलाते हैं। राजपूत जागीरदारों को प्रतिवर्ष नियमित रूप से खिराज देने के अतिरिक्त नियत अवधि तक स्वयं नौकरी में जमीयत के साथ दशहरे पर उपस्थित होना पड़ता है। इनके अतिरिक्त विशेष अवसरों पर जब राज्य चाहे, उनको जाना पड़ता है। किसी सरदार की मृत्यु पर जब नया सरदार होता है, तो राज्य में उसको तलवारबंदी का नज़राना दाख़िल करना