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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पड़ता है। ठिकानों का प्रबंध ठीक न हो अथवा महारावत तथा राज्य के विरुद्ध उनका आचरण हो तो उनकी जागीरें ज़ब्त भी हो जाती हैं। जागीरदार बिना महारावत की आज्ञा के दत्तक नहीं ले सकते। जागीरदारों तथा माफ़ीदारों को अपनी भूमि राज्य की आज्ञा के बिना रेहन रखने और बेचने का अधिकार नहीं है। इस राज्य में २४ सवार, १४८ पैदल और १३ गोलंदाज़ सैनिक हैं। इनके अतिरिक्त १७८ पुलिस के सिपाही आदि हैं, जो राजधानी के प्रबंध सेना और पुलिस आदि : के अतिरिक्त थानों आदि पर नौकरी देते हैं। आवश्यकता होने पर जागीरदारों की जमीयतें भी सैनिक-सेवा का कार्य करती हैं। प्रतापगढ़ राज्य की वार्षिक आय लगभग छः लाख रुपये है और उतना ही व्यय है। आय के मुख्य सीगे ज़मीन का हासिल, चुंगी (दाण), आय-व्यय : जागीरदारों का ख़िराज, मादक द्रव्यों की बिक्री (आवकारी), अफ़ीम का मुनाफ़ा, स्टाम्पं, कोर्ट- फ़ीस, जंगल आदि हैं। व्यय के मुख्य सीगे हाथ-खर्च, महलों के ख़र्च, सरकारी कर, राज्य-प्रबन्ध, सेना, पुलिस, पब्लिक वर्क्स, शिक्षा, अस्प- ताल आदि हैं। आधुनिक परिपाटी पर राज्य-प्रबन्ध हो जाने के कारण आय के साधन अधिक विस्तृत होते जाते हैं। आय-व्यय का बजट प्रति- वर्ष बनता है। राज्य का पहले कोई स्वतन्त्र सिक्का नहीं था। वहां मांडू और गुजरात के सुलतानों के सिक्के चलते थे। बादशाह अकबर ने मालवा और सिक्का : गुजरात के राज्य दिल्ली के साम्राज्य में मिला लिये, तब से वहां मुग़लकालीन सिक्कों का प्रचलन हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की अवनति के दिनों में राजपूताने के अन्य राज्यों की भांति प्रतापगढ़ के स्वामी महारावत सालिमसिंह ने भी बादशाह शाह आलम (दूसरा, ई० स० १७५६-८८ = वि० सं० १८१६-४२) के समय उक्त बादशाह के नाम के चांदी के सिक्के बनाने के लिए प्रतापगढ़ में टकसाल