राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास खोली। इन सिक्कों के एक तरफ़ 'सिक्कह् मुबारक बादशाह गाज़ी शाह आलम सन् ११६६' और दूसरी तरफ़ 'ज़र्बे..................२५ जुलूस मैमनत मानूस' फ़ारसी में खुदा है, जिसका अर्थ है उक्त सिक्का बादशाह शाह आलम दूसरे के राज्य-समय (भिन्न-भिन्न जुलूसी सनों में) बना। शाह आलम के अपभ्रंश रूप से यह सिक्का पुराना सालिमशाही (शाह आलम शाही) कहलाता है। आम तौर से लोग इसको महारावत सालिम- सिंह के नाम का सिक्का मानते हैं, परन्तु सिक्के पर सालिमसिंह का नाम नहीं है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, झालावाड़ और नींवाहेड़ा के कुछ परगनों तथा मध्यभारत के रतलाम, जावरा, सीतामऊ एवं ग्वालियर के मंदसोर ज़िले के कुछ भागों में भी इस सिक्के का चलन था। ई० सं० १८१८ (वि० सं० १८७५) में ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि होने के पीछे ठप्पे में से शाह आलम का नाम निकलवाकर नीचे लिखा हुआ लेख रखा गया, परन्तु उसमें सन् हिजरी ही रहा- 'सिक्का मुवारिक शाह लंदन, १२३६' (ई० स० १८२०)। यह सिक्का नया सालिमशाही कहलाता है। फिर इस नये सिक्के की अठन्नी, चवन्नी और दुअन्नी भी बनने लगीं, किंतु इस नवीन सिक्के में पुराने सिक्के की अपेक्षा चांदी की मात्रा कम रही। प्रतापगढ़ राज्य के आस-पास के राज्यों में अंग्रेज़ी सिक्के का प्रचार बढ़ने पर सालिमशाही सिक्के का मूल्य घटता गया और वह कलदार अठन्नी के बराबर रह गया। ई० स० १६०४ (वि० सं० १६६१) से इस सिक्के का चलन बन्द होकर अंग्रेज़ सरकार के कलदार रुपयों का चलन आरंभ हुआ और सालिमशाही रुपये चांदी के भाव में दे दिये गये। प्रतापगढ़ में पहले तांबे के सिक्के भी बनते थे, जिनमें एक तरफ़ 'श्री' के नीचे 'रियासत देवलिया सं० १६३५' और दूसरी तरफ़ बिंदियां तथा बिंदियों से बना हुआ एक अस्पष्ट चिह्न है। उसके पीछे के तांबे के सिक्कों में एक तरफ़ रियासत प्रतापगढ़ तथा मध्य में संवत् १६४३ है और दूसरी तरफ़ दो तलवारों के बीच में सूर्य का चिह्न अंकित है।