राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल सम्बन्धी वर्णन १५ इस राज्य को अंग्रेज़ सरकार की तरफ़ से पंद्रह तोपों की सलामी प्राप्त है और वाइसरॉय की मुलाक़ात के अवसर पर वाइसरॉय का वापसी तोपों की सलामी और मुलाक़ात के लिए महारावत के यहां जाने का ख़िराज दस्तूर है। यहां से पहले ७२७०० रुपये सालिम- शाही अंग्रेज़-सरकार को ख़िराज के दिये जाते थे। फिर कलदार का चलन होने पर ३६३५० रुपये कलदार वार्षिक ख़िराज के दिये जाने लगे। वर्तमान समय में २७५०० रुपये कलदार वार्षिक 'कैश कंट्रीब्यूशन' के नाम से अंग्रेज़ सरकार को दिये जाते हैं। प्रतापगढ़ राज्य में कितने ही प्रसिद्ध और प्राचीन स्थान हैं। उनमें प्रसिद्ध और प्राचीन स्थान से मुख्य-मुख्य का यहां पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है— देवलिया—प्रतापगढ़ से पश्चिम ८ मील की दूरी पर पहाड़ी प्रदेश में समुद्र की सतह से १८०६ फुट की ऊंचाई पर देवलिया का क़सबा बसा हुआ है। पहले इस राज्य की राजधानी देवलिया होने से यह 'देवलिया राज्य' कहलाता था। प्रतापगढ़ में राजधानी स्थिर होने से अब यह 'प्रतापगढ़ राज्य' कहलाने लगा है, तो भी आम बोल-चाल में अब तक इस राज्य को 'देवलिया-प्रतापगढ़' कहते हैं। संस्कृत पुस्तकों और शिलालेखों में इसके नाम 'देव दुर्ग', (१) संमत (सम्वत्) १७०७ वर्षे शाके १५७२ प्रवर्तमाने उत्तरा- यणगते श्रीसूर्ये वैशाखमासे शुक्लपक्षे पूर्ण(र्णि)मास्यां तिथौ गुरुवासरे मालवखंडेश्वरमहाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहजीविजयराज्ये देवदुर्गराज- धान्यां......॥ देवलिया के गोवर्द्धननाथ के मन्दिर की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से। श्रीचित्रकूटेश्वरराण ( ? भ्रात ) खेमासुतोऽभवद्रावतसूर्य्यमल्लः । तस्याष्टमः श्रीहरिसिंहदेवो राजेश्वरो राजति देवदुर्गे ॥ ३ ॥ वही।