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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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में, जहां पहले घोघेरिया खेड़ा ( डोडेरिया का खेड़ा ) नामक गांव था, प्रताप- गढ़ नामक क़सबा महारावत प्रतापसिंह ने वि० सं० १७५५ (ई० स० १६९८) में आबाद किया, जो इस समय इस राज्य का मुख्य क़सबा और राजधानी है । बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे की मालवा लाइन के मंदसोर स्टेशन से २० मील दूर पश्चिम में स्थित प्रतापगढ़ का क़सबा समुद्र की सतह से १६६० फुट की ऊंचाई पर है। वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने इसके चौतरफ़ कोट बनवाया, जिसके सूरजपोल, भाटपुरा दरवाज़ा, बारी दरवाज़ा, देवलिया दरवाज़ा और धमोतर दरवाज़ा नामक ६ दरवाज़े हैं। इन दरवाज़ों के अतिरिक्त दो छोटे द्वार तालाब बारी और क़िला बारी भी हैं। आबादी के बीच में पश्चिम की तरफ़ महारावत के पुराने महल बने हुए हैं, जिनमें सरकारी दफ़्तर हैं तथा क़सबे के बाहर पश्चिम में क़िला बना हुआ है, जिसमें सामने की तरफ़ महारावत उदयसिंह का बनवाया हुआ 'उदयविलास' महल है। प्रतापगढ़ में हिंदू और जैन सम्प्रदायों के कई मंदिर हैं, परंतु वे अठारहवीं शताब्दी से पुराने नहीं है। यहां अंग्रेज़ी की उच्च शिक्षा के लिए 'पिन्हे हाईस्कूल' है, जिसमें मैट्रिक तक की शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त संस्कृत-पाठशाला, राजकीय प्राइमरी स्कूल, कन्या-पाठशाला, ज़नाना-अस्पताल, रघुनाथ हॉस्पिटल, घासीराम डिस्पेंसरी, देशी दवाख़ाना, पोस्ट ऑफ़िस तथा तारघर, वाचनालय, धर्मशाला, उद्यान आदि लोकोपयोगी संस्थायें विद्यमान हैं। आबादी के बाहर महा- रावत उदयसिंह की बनवाई हुई कंपू (कैंप) कोठी बनी हुई है, जिसकी महारावत रघुनाथसिंह के समय महाराजकुमार मानसिंह ने बहुत कुछ अभि- वृद्धि की थी। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वहां और भी नवीन भवन बनवाकर सुन्दर बगीचा लगवा दिया है, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई है। अपने राज्याभिषेक के पीछे इन्होंने उसी स्थल को अपना निवास- स्थान बना लिया है, जिससे उसकी और भी उन्नति होने की आशा है। जानवरों से प्रेम होने के कारण कंपू-कोठी में इन्होंने जानवरों का छोटासा संग्रहालय बना रक्खा है, जो देखने योग्य है। कंपू कोठी के समीप सरकारी