राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल सम्बन्धी वर्णन १७ विक्रमसिंह (बीका) ने मेवाड़ छोड़ने के पीछे इधर आकर मीणों का दमन किया और प्रसिद्ध है कि वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवलिया का क़सबा बसाकर वहां अपनी राजधानी स्थिर की¹। पहले इसके पूर्व-दक्षिण और पश्चिम के कुछ अंशों में दीवार बनी हुई थी, परंतु अब वह गिर गई है। युद्ध के अवसर पर यह स्थान सुरक्षित समझा जाता था, क्योंकि इसके चारों तरफ़ पहाड़ियां आ गई हैं और बीच में एक ऊंची पहाड़ी पर यह बसा हुआ है। यहां पुराने राज-महल हैं। भूत-पूर्व महारावत (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों तथा उनके आधार पर बने हुए राजपूताना के गैजेटियर एवं अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों में महारावत विक्रमसिंह (बीका) का वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवी मीणी के नाम पर देवलिया का क़सबा बसाने का उल्लेख है, परन्तु यह विश्वास-योग्य नहीं है। कर्नल टॉड लिखता है—"महारावत सूरजमल सादड़ी छोड़कर कांठल की तरफ़ बढ़ा, तब मार्ग में उसको कांठल के जंगल में एक स्थान पर यह दृश्य दीख पड़ा कि एक भेड़िया बकरी के बच्चे को उठाकर ले जाना चाहता है, किन्तु उसकी मा बार-बार प्रयत्न कर उसको उसके पंजे से बचाती है। निदान उसने उस स्थान को सब प्रकार से सुरक्षित समझ वहां पर अपना निवास रखना स्थिर किया और आस-पास के मीणों का दमन कर वहां देवलिया का क़सबा बसाया। चारणी की भविष्यवाणी के अनुसार फिर वह आस-पास के गांवों को दबाकर एक हज़ार गांवों का स्वामी हो गया और उसने अपने बाहुबल से अपने वंशजों के लिए स्वतन्त्र राज्य बना लिया, जो देवलिया-प्रतापगढ़ राज्य कहलाता है (जि० १, पृ० ३४७ क्रुक-संपादित) ।" ऊपर आई हुई भेड़िये और बकरी के बच्चे की कथा काल्पनिक है। ऐसी कथाएं ख्यातों आदि में अनेक स्थानों के सम्बन्ध में मिलती हैं, परन्तु वे विश्वास के योग्य नहीं है। उपर्युक्त कथन से इतना स्पष्ट है कि देवलिया का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था। उसका मेवाड़ की सीमा पर के कांठल प्रदेश पर अधिकार होने से चारणी देवी की भविष्यवाणी सत्य हुई, जिससे अनुमान होता है कि उसने देवी की स्मृति में वहां क़सबा आबाद कर उसका नाम देवलिया रक्खा। सूरजमल के पीछे बाघसिंह और रायसिंह, सादड़ी में ही रहे। वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) के लगभग रावत विक्रमसिंह ने सादड़ी की जागीर का परित्याग कर देवलिया को ही अपनी राजधानी नियत किया, जो महारावत दलपतसिंह के समय तक बनी रही। इससे ख्यात-लेखकों ने इस क़सबे का विक्रमसिंह (बीका)-द्वारा आबाद होना मान लिया। वस्तुतः देवलियां का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था और उसकी उन्नति विक्रमसिंह के समय में हुई। ३