राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
रघुनाथसिंह को प्रतापगढ़ की अपेक्षा यह स्थान अधिक पसंद था, इसलिए उसने यहां कुछ नये मकान बनवाये और पुराने महलों की मरम्मत करवा दी; क्योंकि वह स्वयं भी यहां रहा करता था। यहां कई तालाब हैं, जिनमें 'तेजसागर' (तेजोला) तालाब महारावत तेजसिंह का बनवाया हुआ है। उसके पास ही प्रतापगढ़ के नरेशों की श्मशान-भूमि है, जहां कई स्मारक छत्रियां बनी हुई हैं। तेजसागर के समीप ही एक हम्माम (स्नानागार) बना हुआ है, जिसके लिए ऐसी प्रसिद्धि है कि महारावत सिंहा के समय बादशाह जहांगीर की अप्रसन्नता से उसका सेनापति महावतखां, जब देवलिया में रहा था, उस समय वह बनवाया गया था। वहीं महारावत दलपतसिंह का बनवाया हुआ सोनेला तालाब है, जिसके बीच में उक्त महारावत का बनवाया हुआ छोटासा महल भी है। इस तालाब और महल को बनवाकर उक्त महारावत ने वि० सं० १६०४ (ई० स० १८४७) में उसकी प्रतिष्ठा की और उस अव- सर पर उसने चारण लखमणदान को लाख पसाव भी दिया। देवलिया में कई वैष्णव, शैव और जैन मंदिर हैं, परंतु वे सब इस क़सबे के आबाद होने के पीछे के बने हुए हैं। विष्णु के मंदिरों में गोवर्धननाथ का मंदिर महारा- वत हरिसिंह का बनवाया हुआ है और वहां वि० सं० १७०७ (ई० स० १६५०) की प्रशस्ति लगी है। महारावत सामंतसिंह का बनवाया हुआ यहां रघु- नाथ-द्वारा नामक विष्णु-मंदिर है, जिसके प्रबंध के लिए राज्य की तरफ़ से लगभग पांच हज़ार रुपये वार्षिक आय के गांव हैं और उक्त मंदिर का प्रबंध वहां के महंत के अधिकार में है, जिसकी प्रतिष्ठा इस राज्य में सर्वोपरि है। इस राज्य में इससे बड़ी आय का कोई राजकीय देव-मंदिर नहीं है। जैन मंदिरों में अधिकांश दिगंबर-संप्रदाय के हैं, जिनमें वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के पूर्व का कोई लेख नहीं है। यहां पाठशाला, अस्पताल तथा पोस्ट ऑफ़िस भी हैं और प्रतापगढ़ से देवलिया तक टेली- फोन भी लगा दिया गया है। पहले यहां अच्छी बस्ती थी, परंतु अब कम होती जाती है। प्रतापगढ़-देवलिया का जलवायु आरोग्यप्रद न होने से समथल प्रदेश :