भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लिपि घसीट रूप में लिखी जाती है, जिसमें शुद्धता का बहुत कम ध्यान रखा जाता है। कुछ राजकीय दफ़्तरों में अंग्रेज़ी का व्यवहार भी होने लगा है। गांवों में काले और सफ़ेद कंबल तथा मोटी खादी बनाई जाती है। तांबे और पीतल के बर्तन तथा भीलनियों के पहिनने की पीतल की पींजनियां दस्तकारी आदि ज़ेवर भी यहां बहुतायत से बनते हैं। सोने-चांदी के ज़ेवर, लाख, हाथीदांत और नारियल की चूड़ियां, लकड़ी के रंगीन खिलौने, पलंग के शीशम आदि के पाये तथा खिलौने और अन्य सामान यहां अधिकता से बनता है। हरे, लाल और आसमानी रंग के कांच के ऊपर एक प्रकार का सुनहरी काम यहां बहुत ही सुन्दर बनता है, जो भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं बनता। ऐसे काम के बटन, सिगरेट-केस आदि वस्तुएं बनती हैं, जिनपर पौराणिक या शिकार आदि के चित्र अंकित किये जाते हैं और वे सोने में मढ़े जाते हैं। इस काम को करनेवाले यहां चार-पांच परिवार ही हैं, जो दूसरों को यह काम नहीं बतलाते। व्यापार के मुख्य केन्द्र राजधानी के अतिरिक्त अरनोद, कनोरा, कोटड़ी, रायपुर और सालिमगढ़ हैं। राज्य में बाहर से आनेवाली वस्तुएं व्यापार नमक, कपड़ा, शकर, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, तंबाकू, नारियल, मसाला, चावल, गुड़, सूखा मेवा, सोना, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा आदि धातुएं, कांच तथा चीनी का सामान, हाथीदांत, मोटर, साइकिलें आदि हैं। राज्य से बाहर जानेवाली वस्तुओं में रूई, अफ़ीम, अन्न, तिल, अलसी, सुवा, सरसों, गुड़, घी, इमारती लकड़ी, लकड़ी के खिलौने, चमड़ा आदि मुख्य हैं। पहले यहां अफ़ीम का व्यापार बहुत था, परंतु अब अफ़ीम का सारा व्यापार अंग्रेज़-सरकार के नियन्त्रण में होने से उठ गया है। बंबई, इंदौर, रतलाम, मंदसोर, नीमच, वागड़ (डूंगरपुर तथा बांसवाड़ा राज्य) और मेवाड़ आदि से यहां का व्यापारिक संबंध है।