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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास भी है, जहां 'आचार्य' कक्षा तक की पढ़ाई होती है। उसका संबंध बनारस के गवर्नमेंट संस्कृत कालेज से है। कन्याओं की शिक्षा के लिए राजधानी में कन्या पाठशाला है। सार्वजनिक हित की दृष्टि से एक पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना भी हो गई है। इस राज्य में पहले रोगियों का इलाज वैद्य, हकीम, जर्राह तथा अन्य अनुभवी लोगों-द्वारा होता था। ग्रामीण जनता अपनी चिकित्सा अपने- अस्पताल अपने अनुभव की औषधियों-द्वारा करती थी। कई वर्षों से राज्य ने जनता के हितार्थ राजधानी प्रतापगढ़ और देवलिया में अस्पताल खोल दिये हैं, जहां चीर-फाड़ एवं बड़े-बड़े रोगों का इलाज होता है। राजधानी प्रतापगढ़ में स्त्रियों की चिकित्सा के लिए पृथक् अस्पताल भी बन गया है एवं देशी दवाखाना भी खोल दिया गया है। इनके अतिरिक्त वहां सेठ घासीलाल पूनमचंद की तरफ़ से भी एक अंग्रेज़ी दवाखाना चल रहा है। प्रतापगढ़ राज्य में शीतला से बालकों आदि को बचाने के लिए सर्वत्र टीका लगाने की व्यवस्था की गई है। गांवों में घूम-घूमकर रोगियों की चिकित्सा करने के लिए राज्य ने एक डाक्टर और वैद्य भी नियत कर दिया है। रायपुर के ठिकाने में एक छोटा अस्पताल है, जो वहां के ठाकुर-द्वारा चलाया जाता है। वर्तमान महा- रावतजी का इस ओर पूरा ध्यान होने से धमोतर और अरनोद में भी दवाखाने खोलने की व्यवस्था की जा रही है। पाठशालाओं के अध्यापकों- द्वारा भी गांवों में बुखार, खांसी आदि की औषधियां राज्य वितीर्ण कराता रहता है, जिससे ग्रामीण जनता का कष्ट बहुत कुछ कम हो गया है। राज्य-प्रबंध की सुविधा के लिए पहले इस राज्य के पांच विभाग किये गये थे, जो प्रतापगढ़, कन्तोरा, बजरंगगढ़, साखथली और मगरा ज़िले कहलाते थे; किन्तु बाद में उनकी संख्या ज़िले घटाकर हथूनिया, साखथली और मगरा नामक तीन ज़िले ही रखे गये। ई० स० १९०५ (वि० सं० १९६२) में मगरा और प्रतापगढ़ दो ही ज़िले रह गये। तत्पश्चात् ई० स० १९०६ (वि० सं० १९६३)