राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वंशीय नृपति खुम्माण (तीसरा) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट्ट, दूसरा) ने पलाशकूपिका (पलाशिया, मेवाड़) नामक गांव का बंवूलिका नामक क्षेत्र, इस मंदिर के भेंट किया था¹। इस मंदिर के समीप 'वटयक्षिणी' गोविन्दराज इति तत्र बभूव भूपो । राकाशशाङ्ककिरणोत्करशुअ्रकीर्तिः । येन प्र[च]ण्डभुजदण्डतरण्डकेन । प्रोत्तारिता समरसागरतो जयश्रीः ॥ ६ ॥ लि(ल)क्ष्म्यालिंगितविग्रहो हरिरिव क्रोधाग्निदग्धाहितः । सर्वे[षां] च शरण्यतामुपगतो भास्वत्प्रतापोदयः ॥ श्रीमद्दुलर्भरा[ज]नामनृपतिस्तस्मादभूदंगजो । वक्रं येन कृतं नचार्थिनि जने वक्त्रं द्विषीवा[य]ति ॥ [८] तस्मादनेकसमरार्जितकीर्तिकोशः । चिंतामणिः प्रणयिनां प्रणतो द्विज[जा]तेः [।] यो योषितां तनुधरोभिनवो मनोभू- र्भूषा भुवः समभव[त्सु]त इन्द[न्द्र]राजः ॥ [६] तेनाकारि हिमाचलेन्द्रश[स]दृशं भासां प्रभोर्भासुरं [।] धामेदं ध्वजकिङ्किणीकलमिलत्कोलाहलांलंकृतं ॥[१०] प्रतापगढ़ से प्राप्त कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल (दूसरा) का शिला- लेख (एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८४-५) । (१) संवत् ९९६ श्रावण सुदि १ समस्तराजावलिपूर्व्वमग्रे- (षे) ह महाराजाधिराजश्रीभर्तृपट्टः श्रीखोम्माणसुतः स्वमातृपित्रो- रात्मनश्च धर्म्माभिवृद्धये घोट्टावर्षीयैन्द्रराजादित्यदेवाय पलासकूपिकाग्रामे वंवूलिकोन्ना(ना)मकन्(च्छः) ......। वही; जि० १४, पृ० १८७ ।