भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वंशीय नृपति खुम्माण (तीसरा) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट्ट, दूसरा) ने पलाशकूपिका (पलाशिया, मेवाड़) नामक गांव का बंवूलिका नामक क्षेत्र, इस मंदिर के भेंट किया था¹। इस मंदिर के समीप 'वटयक्षिणी' गोविन्दराज इति तत्र बभूव भूपो । राकाशशाङ्ककिरणोत्करशुअ्रकीर्तिः । येन प्र[च]ण्डभुजदण्डतरण्डकेन । प्रोत्तारिता समरसागरतो जयश्रीः ॥ ६ ॥ लि(ल)क्ष्म्यालिंगितविग्रहो हरिरिव क्रोधाग्निदग्धाहितः । सर्वे[षां] च शरण्यतामुपगतो भास्वत्प्रतापोदयः ॥ श्रीमद्दुलर्भरा[ज]नामनृपतिस्तस्मादभूदंगजो । वक्रं येन कृतं नचार्थिनि जने वक्त्रं द्विषीवा[य]ति ॥ [८] तस्मादनेकसमरार्जितकीर्तिकोशः । चिंतामणिः प्रणयिनां प्रणतो द्विज[जा]तेः [।] यो योषितां तनुधरोभिनवो मनोभू- र्भूषा भुवः समभव[त्सु]त इन्द[न्द्र]राजः ॥ [६] तेनाकारि हिमाचलेन्द्रश[स]दृशं भासां प्रभोर्भासुरं [।] धामेदं ध्वजकिङ्किणीकलमिलत्कोलाहलांलंकृतं ॥[१०] प्रतापगढ़ से प्राप्त कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल (दूसरा) का शिला- लेख (एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८४-५) । (१) संवत् ९९६ श्रावण सुदि १ समस्तराजावलिपूर्व्वमग्रे- (षे) ह महाराजाधिराजश्रीभर्तृपट्टः श्रीखोम्माणसुतः स्वमातृपित्रो- रात्मनश्च धर्म्माभिवृद्धये घोट्टावर्षीयैन्द्रराजादित्यदेवाय पलासकूपिकाग्रामे वंवूलिकोन्ना(ना)मकन्(च्छः) ......। वही; जि० १४, पृ० १८७ ।

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