राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- भूगोल सम्बन्धी वर्णन - २३
देवी' का मन्दिर और मठ भी था । उक्त देवी के मंदिर को वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० ६४६ ता० २ नवम्बर ) को कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरा ) ने, जिसके अधिकार में यह देश भी था, घोटासीं के निकट का 'खर्परपद्रक' ( खैरोट ) गांव भेंट किया था¹ । ये सूर्य और देवी के मंदिर तथा मठ कहां थे, इसका अब तक निश्चय नहीं हो सका । संभव है, जिसको आज-कल भैरूंजी का मंदिर कहते हैं, वही प्राचीन सूर्य का मंदिरों हो । यहां के मंदिर आदि के पत्थर दूर-दूर तक पहुंचे हैं । मोहकमपुरा की छत्रियों और चबूतरों में यहां के पत्थर ही लगे हुए हैं । नंदवाणा बोहरा नाथू ने वसाड़ के पास पोह की बावड़ी बनवाई, जिसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं। इसी प्रकार प्रतापगढ़ के दरवाज़े के बाहर अग्रवाल चैनराम ने जो बावड़ी बनवाई, उसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं । उनके साथ वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० २ नवंबर) की उपर्युक्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल ( दूसरा ) के समय की
( १ ) ॰॰॰परममाहेश्वरो महाराजश्रीमहेन्द्रपालदेवः श्रीदशपुरपश्चिम- पथके तलवर्गिंगकहरिषडभुज्यमानखर्प्परपद्रकग्रामे घोट्टावर्षिकाप्रत्यासन्ने समुपगतान् सर्व्वांन्ने(नेव)यथास्थाननियुक्तान्प्रतिवासिनश्च समाज्ञापयत्यस्तु वः उपरलिखितग्रामः स्वसीमातृणप्रति[पूति]गोचरपर्यन्तो(न्तः)सर्व्वादाय- समेत आचन्द्रार्कक्षितिकालं पूर्व्वदत्तदेवब्रह्मदेयवर्ज्जितो 'मया पित्रोः पुन्या(ण्या)भिवृद्धये का[ह्नि]क्यां गंगायां स्नात्वा पुन्थे(ण्ये)हनि [ध]नशूर- प्रार्थनया श्रीदशपुरचातुर्वैद्यहरिर्षेश्वर(हर्षीश्वर)मठसंव(ब)ध्यमानश्रीवट- यक्षिणीदेव्यै शासनत्वेन प्रतिपादितः ( त इति) मत्वा भवद्भिः सा(स)- मनुमन्तव्यो(व्यः) प्रतिवासिजनपदैरप्याज्ञास्र(श्र)वणविधेयैर्भूत्वा यथा- दीयमानभागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिकमस्योपनेतव्यमिति । श्रीजज्जनाग- प्रदत्तादेशात् । संवत्सो ( संवत्सरे ) १००३ मार्ग वदि ५ । पुरोहित- त्रिविक्रमात्ताच्च(नाथ) लिखितमिदम् । स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य ।
वही; जि० १४, पृ० १८३-४ ।