राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रशस्ति भी यहां से ले जाकर बावड़ी के पास एक चबूतरे में चुनी गई थी। उसको मैंने वहां से निकलवाकर राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित किया है' । 'वरमंडल' गांव के, जो घोटार्सी से दो मील दूर है, शिवालय के स्तम्भ आदि भी यहीं के हैं। उक्त मंदिर के बाहर एक चबूतरे पर सूर्य का एक-चक्र रथ जमा हुआ है, जो घोटार्सी के सूर्य मंदिर का ही रथ होना चाहिये । वहां ( वरमंडल ) के चबूतरे तथा मंदिर की दीवारों में जो बहुत से सुंदर खुदाईवाले पत्थर लगे हुए हैं, वे सब घोटार्सी से गये हैं । घोटार्सी में पहले कुछ जैन मंदिर भी थे । प्रतापगढ़ की संस्कृत पाठशाला के अध्यक्ष पंडित जगन्नाथ शास्त्री के परिश्रम से पार्श्वनाथ के मंदिर की प्रशस्ति का एक टुकड़ा अभी मिला है, जिसमें संवत् का भाग नहीं है, परन्तु दुर्लभराज का नाम² है, जिससे अनुमान होता है कि उक्त मन्दिर उपर्युक्त दुर्लभराज चौहान के समय बना होगा । वीरपुर—प्रतापगढ़ से लगभग दस मील दूर दक्षिण-पश्चिम में सुहांगपुर के समीप वीरपुर नामक गांव है। यहां एक टूटा हुआ जैन-मंदिर है। उसको लोग दो हज़ार वर्ष का प्राचीन बतलाते हैं, जो विश्वास के योग्य नहीं है, क्योंकि उसपर जो खुदाई का काम है, वह बारहवीं शताब्दी के पूर्व का नहीं है । पहले यह अच्छा क़सबा था, परन्तु अब तो भीलों और मीणों की थोड़ी सी बस्ती है। यहां दूर-दूर तक ईंटों के टुकड़े पड़े हुए मिलते हैं और खोदने पर बड़ी-बड़ी ईंटें तथा मिट्टी की नांदें मिलती हैं। यहां एक शिवालय भी है, जो पहले शिखर-सहित पत्थर का ही बना था, परन्तु शिखर तथा सभामंडप दोनों ही गिर गये हैं तथा नंदी के दो टुकड़े सभामंडप में पड़े हुए हैं। द्वार के ऊपर गणपति और उसके ऊपर नवग्रह की मूर्तियां बनी हैं । वि० सं० १६४१ ( ई० स० १५८४ ) में सुहागपुरे में दिगम्बर जैनमन्दिर बनने पर वीरपुर के प्राचीन जैनमंदिर ( १ ) राजपूताना म्यूज़ियम् ( अजमेर ) की ई० स० १९१३-१४ की रिपोर्ट; पृ० २ । ( २ ) मूललेख की छाप से ।